Srishti Khanda Extracted Page 534

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-534

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Sanskrit Original

पद्दंनाभ्युद्धवं चैकं समुत्पादितवांस्ततः । सहस्त्रवर्ण विरजं भास्कराभं हिरण्मयम् ॥१५३॥ हुताशनज्वलितशिखोज्ज्वलप्रभं समुत्थितं शरदमलार्कतेजसम् । विराजते कमलमुदारवर्चसं महात्मनस्तनुरुहचारुशैवलम् ॥१५४॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे पद्मप्रादुर्भावो नामैकोनचत्वारिशोऽध्यायः ॥३९॥ —— Se चालीसवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच अथ योगवतां श्ररेष्ठमसृजद्धूरिवर्चसम् । ्रष्टारं सर्वलोकानां ब्रह्माणं सर्वतोमुखम् ॥१॥ तस्मिन्हिरण्मये पड़े बहुयोजनविस्तृते । सर्वतेजोगुणमये पार्थिवैर्लक्षणैर्वृते ॥२॥ तच्च पद्य पुराभूतं पृथिवीरूपमुत्तमम्। नारायणसमुद्धूतं प्रवदंति महर्षयः ॥३॥ यत्पदं सा रसा देवी पृथिवी परिकथ्यते । ये पद्मकेसरा मुख्यास्तान्दिव्यान्पर्वतान्विदुः ॥४॥ हिमवंतं च नीलं च मेरुं निषधमेव च। कैलासं श्ृंगवंतं च तथाद्रिं गंधमादनम्॥५॥ पुण्यं त्रिशिखरं चैव कांतं मदंरमेव च । उदारं पिंजरं चैव विंध्यमस्तं च पर्वतम् ॥६॥ एत एव गणनां च सिद्धानां च महात्मनाम् । आश्रयाः पुण्यशीलानां सर्वकामफलप्रदाः ॥७॥ था।१५३॥ वह देदीप्यमान अग्नि की ज्वाला से युक्त शरत् कालीन स्वच्छ सूर्य के समान तेज से युक्त उत्पन्न हुआ। मनोहर कान्ति सम्पन्न वह कमल श्रीभगवान् के रोम रूपी सेवार से सुशोभित हुआ ॥१५४॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पद्मप्रादुर्भाव नामक उनतालिसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।३९।। — Oe कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति का वर्णन, कमल के प्रथिवी रूप से वर्णन पूर्वक कमल के केसरों का सुमेरु आदि रूप से वर्णन, कमल दल के अनुसार देशों का वर्णन, मधु कैटभ की कथा, ब्रह्माजी से प्रजापतियों की उत्पत्ति का वर्णन, तारकामय संग्राम का वर्णन पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- उसके पश्चात् श्रीभगवान् ने योगियों में श्रेष्ठ, विपुल तेज: सम्पन्न, सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि करने वाले तथा जिनका मुख चारो ओर था ऐसे ब्रह्माजी की सृष्टि की ॥१॥ उस सुवर्णमय, अनेक योजनो में विस्तृत सम्पूर्ण तेजोगुण से युक्त तथा पृथिवी के लक्षणों वाले कमल पर ब्रह्माजी की सृष्टि हुयी ॥२॥ वह उत्तम कमल पहले पृथिवी रूप था, उसको महर्षिण भगवान् नारायण से उत्पन्न हुआ बतलाते हैं ॥३॥ वह पृथिवी देवी ही कमल कहलाती हैं और उस कमल के जो मुख्य केसर थे उनको दिव्य पर्वत रूप से ऋषियों ने कहा है ॥४॥ वे पर्वत हिमवान् (हिमालय), नील, सुमेरु, निषध, कैलास, शिखरों वाला गन्धमादन ॥५॥ पवित्र त्रिकूट पर्वत तथा देदीप्यमान मन्दराचल पर्वत थे । उदार पिञ्जर पर्वत, विन्ध्याचल तथा अस्ताचल पर्वत है ॥६॥ ये पर्वत ही सिद्धों तथा पुण्यवान् महात्माओं के आश्रय तथा समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं ॥७॥ इन सबों के भीतर जम्बू

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