Srishti Khanda Extracted Page 533

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-533

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Sanskrit Original

छादयित्वात्मनो देहं पयसांबुजसंभवः । ततो महात्मातिबलो मर्त्यलोकविसर्जने ॥१ ३ ९॥ महतां चैव भूतानां विश्वो विश्वमचितयत् । तस्यचिंतयमानस्य नियते संस्थितेर्णवे ॥१४०॥ निराकाशे तोयमये सूक्ष्मे जगति संक्षये। ईश: संक्षोभयामास सोर्णवं सलिलं गतः ॥९४९॥ अथांतरादपांसूक्ष्ममथच्छिद्रमभूत्पुरा । शब्दं प्रति ततो भूतो मारुतश्छिद्रसंभवः ॥१४२॥ संलब्ध्वांतर संक्षोभं व्यवर्धतसमीरणः । नभस्वता बलवता वेगाद्विक्षोभितोर्णवः ॥१४३॥ तस्यार्णवस्य क्षुब्धस्य तस्मिन्नभसि मध्यतः। कृष्णवर्त्मा समभवत्प्रभुर्वैश्चानरो महान् ॥९४४॥ ततः संशोषयामास पावकः सलिलं बहु । समस्तजलधिश््छिद्रमभवद्विसृतं नभः ॥९४५॥ आत्मतेजो भवा: पुण्या आपोमृतरसोपमाः । आकाशंछिद्रसंभूतं वायुराकाशसंभवः ॥१४६॥ अथ संघर्षसम्भूतं पावकं चास्य संभवम् । दृष्टा पितामहोदेवो महाभूतविभावनः ॥९४७॥ दृष्ट्वा भूतानि भगवान् लोकसृष्ट्यर्थमुत्तमम् । ब्रह्मणोजन्मसहितं बहुरूपोह्यचिंतयत् ॥९४८॥ चतुर्युगानां संख्यातं सहस्त्रं युगपर्यये। यत्पृथिव्यां द्विजेद्राणां तपसाभावितात्मनाम्॥१४९॥ बहुजन्मविशुद्धात्मा ब्रह्मणो हरिरूच्यते । ज्ञां दृष्टवा तु विश्वात्मा योगिनां याति योग्यताम्॥९१५०॥ तं योगवंतं विज्ञाय संपूर्णैश्वर्यमुत्तमम्। पदेब्रह्मणि विश्वस्य न्ययोजयत योगवित् ॥१५९॥ ततस्तस्मिन्महातोये महेशो हरिरच्युतः । जलक्रीडां च विधिवत्सचक्रे सर्वलोककृत् ॥९५२॥ चन्द्रमा तथा सूर्य से रहित महार्णव परमात्मा में ॥१३७॥ धीरे-धीरे संचरण करते हुए जगत् प्रभु हंस की सृष्टि काल के आने पर जगत् की सृष्टि करते हैं । इसके पश्चात् पवित्र होकर कमल से उत्पन्न होने वाले ब्रह्माजी ने अपने शरीर को छिपाकर तपस्या का वरण किया । उसके बाद अत्यन्त बल सम्पन्न वे महात्मा मर्त्यलोक की सृष्टि करने के लिए महाभूतों तथा सम्पूर्ण विश्व का चिन्तन किये । उनके चिन्तन करते ही आकाश रहित महार्णव में जलमय महार्णव से सूक्ष्म जगत् का संरक्षण हो जाने पर जल में विद्यमान परमात्मा ने क्षोभ उत्पन्न किया ॥१३८-१४१॥ उस जल के बीच में छोटा सा छिद्र हो गया । उससे शब्द उत्पन्न हुआ, उससे वायु की उत्पत्ति हुयी ॥१४२॥ अपने में क्षोभ को प्राप्त करके वायु की वृद्धि हो गयी । उस बलवान् वायु के वेग से समुद्र में क्षोभ उत्पन्न हुआ ॥१४३॥ उस क्षुब्ध हुए महार्णव के आकाश के बीच से महान् कृष्णवर्त्मा अग्नि की उत्पत्ति हुयी ॥१४४।॥ उसके बाद अग्नि ने बहुत अधिक जल को सोख लिया । और सम्पूर्ण छिद्र बन गया उसमें आकाश फैल गया ।।१४५।। आत्मा के तेज से उत्पन्न जल अमृत रस के समान था । छिद्र से आकाश उत्पन्न हुआ और आकाश से वायु की उत्पत्ति हुयी ॥१४६॥ उसके बाद वायु के टकराने से उत्पन्न अग्नि को देख्कर महाभूतों का चिन्तन करने वाले पितामह श्रीभगवान्। १४७॥ लोक की सृष्टि के लिए सर्वोत्तम भूतों को देखकर, अनेक रूपों को धारण करने वाले ब्रह्माजी के जन्म का चिन्तन किए ।।१४८॥ एक हजार चतुर्युगों के बीत जाने पर भूलोक में तपस्या के द्वारा प्रभाव सम्पन्न ब्राह्मणों में ॥१४९॥ अनेक जन्मों से जो ब्राह्मण विशुद्धात्मा होते हैं, उन्हीं को श्रीहरि, ब्रह्मा कहते हैं । योगियों के ज्ञान को देखकर सम्पूर्ण जगत् की आत्मा स्वरूप परमात्मा की योग्यता को प्राप्त करते हैं ॥१५०॥ उनको योग सम्पन्न तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य से युक्त जानकर श्रीभगवान् जगत् के ब्रह्मा के पद पर प्रतिष्ठित किए ॥१५१॥ उसके पश्चात् उस महार्णव में श्रीभगवान् सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि करने वाले, विधिपूर्वक जल क्रीडा किए ॥१५२॥ उसके बाद उन्होंने अपनी नाभि में एक कमल को उत्पन्न किया । वह कमल अनेक वर्णो का निर्मल तथा सूर्य के समान कान्ति वाला तथा सुवर्णमय

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