Srishti Khanda Extracted Page 532

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-532

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

कृतांतः सर्वभूतानां विज्ञेयः कालसंज्ञितः । अहं धर्मस्तपश्चाहं सर्वाश्रमनिवासिनाम् ॥१२५॥ अहं दया परो धर्मः क्षीरोदोहंमहार्णवः। यत्सत्यं तत्परंत्वेक अहमेव प्रजापतिः ॥१२६॥ अहं सांख्यमहं योगो ह्वाहंतत्परमं पदम् । अहमिज्या क्रिया चाहमहं विद्याधिपः स्मृतः ॥१२७॥ अहंज्योतिरहं वायुरहं भूमिरहं जलम् । आकाशोहं समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशो दश ॥१२८॥ अहं वर्षमहं सोमः पर्जन्योहमहं रविः । अहं पुराणं परमं तथैवाहं परायणम् ॥१२९॥ भविष्ये चापि सर्वत्र भविष्यत्सर्वसंग्रहः । यत्किचित्पश्यसे विप्र यच्छुणोषि चकिंचन ॥१३०॥ यच्चानुभवसे लोके तत्सर्व मामनुस्मर। विश्वं सृष्टं मया पूर्वं सृजेऽद्यापि च पश्य माम्॥१३१॥ युगे युगे च रक्षामि मार्कण्डेयाखिलं जगत् । तदेतत्कथितं सर्व॑ मार्कडेयावधारय ॥१३२॥ शुश्रूषुरपि धर्मेषु कुक्षौ चर सुखं मम । मम ब्रह्माशरीरस्थो देवाश्च ऋषिभिःसह ॥१३३॥ व्यक्तमव्यक्तयोगं मामवगच्छमुरद्विषम् । अहमेकाक्षरो मंत्रख्यक्षरश्च पितामहः ॥९३४॥ परस्त्रिवर्गओंकारः परमात्मप्रदर्शनः । एवमादिपुराणं च वदते मां महामते॥१३५॥ वक्त्रं यातो भगवतो मार्कडेयो महामुनिः | ततो भगवतः कुक्षिं प्रविष्टो मुनिसत्तमः ॥१३६॥ तस्यसम्मुखमे कान्ते शुश्रूषुर्हं समव्ययम् । यदक्षय विविधमुपाश्रितं तु तन् महार्णवे व्यपगतचंद्रभास्करे ॥१३७॥ शनैश्चरन्प्रभुर थहंससंज्ञितः सृजन् जगद्विहरति कालपर्यये । अथ चैवंशुचिर्भूत्वा वरयामास वै तपः ॥९१३८॥ योगियों में कपिल तथा युगान्त रूप आवर्त हूँ ॥१२३॥ मैं ही सम्पूर्ण जीव स्वरूप हूँ तथा सम्पूर्ण देव स्वरूप हूँ । मैं सर्पो में शेष हँ, सभी पक्षियों में में गरुड हूँ ॥१२४॥ सभी जीवों में में यमराज हुँ, में काल नाम से जानने योग्य हूँ, मैं ही सभी आश्रमों में रहने वालों का धर्म तथा तप हँ ।।१२५॥ में दया करने वाला धर्म हूँ तथा महार्णवों में में क्षीरसागर हूँ । जो परं सत्य है वह अकेला मैं ही हूँ । में प्रजापति हूँ ॥१२६॥ मैं ही सांख्य हूँ, योग हूँ तथा में ही परंप्राप्य हूँ । मैं ही यज्ञ हूँ, क्रिया हुँ तथा मैं ही विद्याधिप कहा जाता हूँ ॥१२७॥ मैं ही तेज हूँ, मैं ही वायु हूँ, में ही पृथिवी हूँ तथा मैं ही जल हूँ । में ही आकाश हूँ तथा मैं ही समुद्र हूँ, मैं ही नक्षत्र तथा दशो दिशाएँ हूँ ॥१२८॥ मैं ही वर्षा हूँ, मैं सोम हूँ, में मेघ हूँ तथा मैं सूर्य हूँ । में ही सबसे पुराण पुरुष हूँ तथा में ही सबों का आश्रय हुँ॥१२९॥ भविष्यत् काल में होने वाली समस्त वस्तु स्वरूप हूँ । हे विप्र ! तुम जो कुछ देखते हो तथा सुनते हो॥१३०॥ लोक में तुम जो कुछ भी अनुभव करते हो, वह सब कुछ मुझे जानो । सृष्टि के प्रारम्भ में मैने सृष्टि की तथा आज भी सृष्टि करता हूँ, मुझे देखो ॥१३१॥ हे मार्कण्डेय प्रत्येक युग में मैं सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करता हूँ । हे मार्कण्डेय मैंने जो कहा है उसे तुम धारण करो ॥१३२॥। धर्म का श्रवण करने के इच्छुक तुम मेरी कुक्षि में सुख पूर्वक विचरण करो । मेरे शरीर में ऋषियों तथा देवताओं के साथ ब्रह्माजी विद्यमान हैं ॥१३३॥ मुझे, व्यक्त तथा अव्यक्त योग वाला मुरद्विष (मुर नामक दैत्य को मारने वाला) विष्णु जानो । मैं ही एकाक्षर (ओम्) तथा तीन अक्षरों वाला (अ+उ+म्) मन्त्र हूँ । में ही सबों का पितामह हूँ ।। १३४॥ मैं परमात्मा की प्राप्ति कराने वाला, सर्वश्रेष्ठ त्रिवर्ग ओंकार हुँ । हे महामते ! इस तरह से ज्ञानी पुरुष मुझे आदिपुरुष बतलाते हैं ॥१३५॥ इसके बाद महामुनि मार्कण्डेय श्रीभगवान् के मुख में प्रवेश कर गये । फिर वे श्रीभगवान् की कुक्षि में प्रवेश कर गये ॥१३६॥ श्रीभगवान् की कुक्षि में प्रवेश किए, हुए महर्षि मार्कण्डेय एकान्त में धर्म का श्रवण करने के इच्छुक अक्षय, अनेक प्रकार से अपनाये गये

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know