Srishti Khanda Extracted Page 531

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-531

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Sanskrit Original

कस्तपो घोरमासाद्य ममाद्यत्यक्तजीवित: । मार्कडेयेति मामुक्त्वा मृत्युमीक्षितुमर्हसि ॥९९९॥ एवं प्रक्षुभितः क्रोधान्मार्कडेयो महामुनिः । तदैनं भगवान्भूयो बभाषे मधुसूदनः ॥१९२॥ श्रीभगवानुवाच अहं ते जनको वत्स हृषीकेशः पिता गुरुः । आयुः प्रदाता पौराणः किं मां त्वं नोपसर्पसि॥९ १ ३॥ मां पुत्रकामः प्रथमं त्वत्पितांगिरसोमुनिः। पूर्वमाराधयामास तपस्तीव्रं समाश्रितः ॥११४॥ तं दृष्ट्वा घोरतपसं त्रिदशोत्तमतेजसम्। दत्तवांस्त्वामहं पुत्रं महर्षिममितौजसम् ॥११५॥ कस्समुत्सहते चान्यो योगिभूतात्मगात्मकम् । द्रष्टुमेकार्णवगतं क्रीडंतं योगमायया ॥११६॥ ततः प्रह्ृष्टहृदयो विस्मयोत्फुल्ललोचनः । मूर्ध्नि बद्धाललिपुटो मार्कंडेयो महातपाः ॥११७॥ नामगोत्रे तु संप्रोच्य दीर्घायुर्लोकपूजितः । तस्मै भगवते भक्तया नमस्कारमथाकरोत्॥१९८॥ मार्कडेय उवाच इच्छामि तत्वतो ज्ञातुमिमां मायां तवानघ । यदेकार्णवमध्यस्थः शेषे त्वं बालरूपवान्॥९९९॥ कि संज्ञश्चैव भगवान्लोके विज्ञायसे प्रभो । तर्कयेऽहं महात्मानं को हान्यः स्थातुमर्हसि ॥९२०॥ श्रीभगवानुवाच अहं नारायणो ब्रह्मान्सर्वभूतविनाशनः । अहं सहस्रशीर्षास्यः सहस्रपदसंयुतः ॥९२९॥ आदित्यवर्णः पुरुषो मुखेब्रह्ममयोह्यहम्। अहमभ्निर्हव्यवहः सप्तसप्तिभिरन्वितः ॥१२२॥ अहमिंद्रपदः शक्र ऋतूनां परिवत्सरः । अहं योगिषु सांख्याख्यो युगांतावर्त एव च ॥१२३॥ अहं सर्वाणि सत्वानि दैवतान्यखिलानि च । भुजगानामहं शेष स्ताक्ष्योऽहं सर्वपक्षिणाम् ॥१२४॥ सकते हैं । मुझको तो ब्रह्माजी स्नेह पूर्वक दीर्घायु कहते हैं ॥११०॥ कौन मरा हुआ है, जो घोर तपस्या करके मुझको आज मार्कण्डेय कहकर पुकारता है ॥१११॥ इसतरह से वे क्षुब्ध हो गये थे महर्षि मार्कण्डेय । उनसे फिर भगवान् मधुसूदन ने कहा ॥११२॥ श्रीभगवान् ने कहा-- हे वत्स ! मैं तुम्हारा पिता हूँ, हृषीकेश हूँ, मैं तुम्हारे पिता का भी गुरु हूँ । मैने तुम्हें पुरानी आयु प्रदान किया है, तुम मेरे पास क्यों नहीं आ रहे हो ॥११३॥ प्राचीन काल में तुम्हारे पिता आंगिरस मुनि ने मेरी आराधना की थी, उन्होंने पुत्रप्राप्ति की कामना से घोर तपस्या की थी ॥११४॥ देवताओं के समान तेज वाले घोर तपस्वी उनको देखकर मैंने निःसीम तेज:सम्पन्न तुम जैसे महर्षि पुत्र को प्रदान किया॥ ११५॥ दूसरा कौन है जो सबों की आत्मा में व्यापक एकार्णव में विद्यमान तथा योगमाया के साथ क्रीडा करने वाले मेरा साक्षात्कार कर सके ॥११६॥ उसके पश्चात् प्रसन्न हृदय वाले तथा जिनके नेत्र आश्चर्य चकित थे ऐसे लोक पूजित, दीर्घायु महातपस्वी महर्षि मार्कण्डेय हाथ जोड़कर तथा उसे शिर से लगाकर ॥११६-११७॥ अपने नाम तथा गोत्र का उच्चारण करके उन श्रीभगवान् को भक्तिपूर्वक नमस्कार किए ।॥ ११८ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-- हे अनघ ! में आपकी इस माया को तत्त्वत: जानना चाहता हूँ । आप जो इस एकार्णव में बाल रूप धारण करके शयन करते हैं ॥११९॥ हे भगवन् ! आपका यह रूप लोक में किस नाम से जाना जाता है ? में आपको परमात्मा ही समझ रहा हूँ, परमात्मा को छोड़कर दूसरा कौन हो सकता है ? ॥१२०॥ श्रीभगवान् ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! में सभी भूतों का विनाश करने वाला नारायण हूँ । में ही सहस्रशीर्षा (असंख्य शिरों वाला) असंख्य मुखों वाला तथा असंख्य पैरों से युक्त हूँ ॥१२१॥ मैं ही आदित्य वर्ण पुरुष हूँ, तथा मेरे मुख में ब्रह्म (वेद) है मैं ही हविष्य का वहन करने वाला अग्नि हूँ तथा सूर्य हूँ ॥१२२॥ मैं ही इन्द्र शब्द से कहा जाने वाला शक्र हूँ, ऋतुओं में परिवत्सर हूँ । मैं

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