Srishti Khanda Extracted Page 530
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-530
Sanskrit Original
तथैव च मुनिः कुक्षिं पुनरेवप्रवेशितः । सप्रविष्टः पुनः कुक्षि मार्कडेय: सविस्मयम् ॥९७॥ तथैव च पुनर्भूयो विजानन्स्वप्रदर्शनम्। स तथैव यथा पूर्व पृथिवीमटते वनम् ॥९८॥ पुण्यतीर्थजलोपेतं विविधान्याश्रमाणि च । क्रतुभिर्यजमानांश्च समाप्तगुरुदक्षिणैः ॥९९॥ अपश्यद्देवकुक्षिस्थान् यज्ञस्थान् शतशो द्विजान् । सद्दत्तमाश्रिताः सर्वे वर्णा ब्राह्मणपूर्वकाः ॥१० ०॥ चत्वार आश्रमाः सम्यग्यथापूर्व विलोकिता । एवं वर्षशतं साग्रं मार्कडेयेन धीमता ॥१०९॥ चरता पृथिवीं सर्वा तत्कुक्षौ हि समीक्ष्यते । ततः कदाचिदथवै पुनः कुक्षेर्विनिर्गतः ॥१०२॥ सुप्तं न्यग्रोघशाखायां बालमेकं निरीक्ष्य च । तथैवैकार्णवजले नीहारेणावृतांतरे ॥१०३॥ अव्यक्तक्रीडिते लोके सर्वभूतविवर्जिते । समुनिर्विस्मयाविष्टः कौतूहलसमन्वितः ॥९०४॥ बालमदित्यसंकाशं नशक्रोत्यभिवीक्षितुम्। सोप्यचिंतयदेकांते स्थित्वा सलिलसन्निधौ ॥१०५॥ पूर्वदृष्टमिदं मेने शंकितो देवमायया । अगाधे सलिले शेते मार्कडेयः सविस्मयः ॥१०६॥ पूर्ववत्तमथो द्रष्टुमव्रजत्त्रस्तलोचनः । स तस्मै भगवानाह स्वागतो बाल भो इति॥१०७॥ बभाषे मेघतुल्येन स्वरेण पुरुषोत्तमः । मार्कडेय न भेतव्यमागच्छस्व ममांतिकम् ॥१०८॥ मार्कडेय उवाच को नाम्ना कीर्तयति मां कुर्वन् परिभवं मम । दिव्यवर्षसहस्त्राख्यं घर्षयं श्वैव मे वयः॥१०९॥ नहोष च सदाचारो देवेष्वपि ममोचितः। मां ब्रह्मापि हि सस्नेहो दीर्घायुरिति भाषते॥११०॥ होता तथा ब्रह्माजी की उन्होंने अपने सम्पूर्ण शरीर से सृष्टि की । उन्होंने अपने मेढ (अण्डकोश) से प्रतिष्ठाता सूर्य एवं चन्द्रमा से भिन्न है ॥९५॥ इसका सागर के समान गाम्भीर्य हें, जैसे यह अपने ओज के द्वारा प्रकाशित हो रहा है । श्रीभगवान् का दर्शन करने के लिए यहाँ आये हुए आप कौन हैं ? इसतरह से विस्मय के कारण वे ॥९६॥ मुनि श्रीभगवान् के उदर में फिर प्रवेश कर गये । श्रीभगवान् की कुक्षि में प्रवष्टि वे मार्कण्डेय महर्षि विस्मय पूर्वक।।९७॥। उसीतरह पुनः स्वप्न समझते हुए पहले के ही समान पृथिवी पर वन में घूमने लगे ॥९८॥ उन्होंने पुण्य तीर्थो तथा जलों से युक्त अनेक आश्रमों को, क्रतुओं के द्वार यजन करने वाले तथा बहुत अधिक दक्षिणा देकर जो यज्ञ पूरे हो चुके थे ऐसे क्रतुओं को देखा ॥९८॥ उन्होंने श्रीभगवान् के शरीर में विद्यमान् सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देखा । वहाँ सभी ब्राह्मण आदि वर्णो के लोग सदाचार का पालन करने वाले थे ॥९९-१०१॥ उस उदर में ही उन्होंने सम्पूर्ण पृथिवी को देखा । फिर वे कभी श्रीभगवान् के उदर में निकल गये ॥१०२॥ वहाँ उन्होंने वट वृक्ष की शाखा पर सोए हुए एक बालक को देखकर पहले के ही समान एकार्णव के जल में तुषार से आवृत तथा जिसमें अव्यक्त के द्वारा क्रीडा किया गया था ऐसे लोक में जहाँ पर कोई भी नहीं था ऐसे वट पर विद्यमान बालक को देखा। वे मुनि कौतूहल पूर्वक तथा आश्चर्य से ॥१०३-१०४।। आदित्य के समान देदीप्यमान उस बालक को देख नहीं सके। उसके सन्निकट में जल में ही एकान्त में खड़ा होकर सोचे कि ॥१०५॥ इस बालक को मैने कहीं देखा है वे श्रीभगवान् की माया से मोहित थे मार्कण्डेय महर्षि ने विस्मय पूर्वक उस अगाध जल में सोते हुए उस बालक को देखा ॥१०६॥ वे भयभीत से हो गये थे अतएव उस बालक के सन्निकट नहीं जा रहे थे । महर्षि से बालक पुरुषोत्तम ने मेघ के समान गम्भीर स्वर से कहा-- तुम्हारा स्वागत है । मार्कण्डेय ! डरो मत; मेरे सन्निकट आओ ॥१०७-१०८॥ मार्कण्डेय ने कहा-- यह कौन है ? जो मेरा तिरस्कार करते हुए मेरा नाम लेकर मुझे बुला रहा है । देवताओं के सैकड़ों वर्ष की आयु वाले मुझको अभिभूत करते हुए ॥१०९॥ इसतरह से मेरे लिए सदाचार तो देवता भी नहीं कर
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