Srishti Khanda Extracted Page 529
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-529
Sanskrit Original
अच्छावाकमथोरुभ्यां सुब्रह्मण्यं च सामगम् । एवमेव सभगवान्घोडशैतान् जगत्पतिः ॥८ २॥ _ स्वयंभूः सर्वयज्ञानामृत्विजोऽ सृजदुत्तमान् । तदा चैष महायोगी पुरुषो यज्ञ॒ संज्ञितः ॥८३॥ वेदाश्चैव तथा सर्वे सहांगोपनिषत्क्रियाः । स्वपित्येकार्णवे चैव यदाश्चर्यमभूत्पुरा ॥८४॥ श्रूयतां तु तदा विप्रो मार्कडेयः कुतूहलात् । गीणों भगवता तेन कुक्षावासीन्महामुनिः ॥८५॥ बहुवर्ष सहस््रायुस्तस्यैव वरतेजसः। अटंस्तीर्थप्रसंगेन पृथिवीतीर्थगोचरः ॥८६॥ आश्रमाणि च पुण्यानि देवतायतनानि च । देशाद्राष्टाण चित्राणि पुराणि विविधानि च ॥८७॥ जपहोमपराः शांतास्तपोभिरमलाः स्मृताः। मार्कडेयस्ततस्तस्य शनैर्वक्त्राद्विनिर्गतः ॥८८॥ निष्क्रामन्तं नचात्मानं जानीते देवमायया । निष्क्रम्य तस्य उदरादेकार्णवमथो जगत् ॥८९॥ सर्वतस्तमसाछन्न मार्कडेयोन्ववैक्षत । तस्योत्पन्नं भयं तीव्रं व्यत्ययं चात्मजीवितम् ॥९०॥ देवदर्शनसंहृष्टो विस्मयं परमं गतः । सोचिंतयदमोघात्मा मार्कडेयोऽ थशंकितः ॥९१॥ किंनु स्याच्चित्तसंमोहः किंनु स्वप्रोनुभूयते । व्यक्तमन्यतरो भाव एतयोर्भविता मम ॥९२॥ नहि स्वप्रो ह्ययं सत्यं युक्तं यत्सत्यमर्हति। नष्टचंद्रार्कपवनो नष्टपर्वतभूतलः ॥९ ३॥ कतमः स्यादयं लोक इति शोकमुपागतः। ददर्श चापि पुरुषं स्वपंतं पर्वतोपमम् ॥९४॥ सलिलेऽर्धमथोमग्नं जीमूतमिव सागरे । तपंतमिव तेजोभिरामुक्तशशिभास्करम् ॥९५॥ गांभीर्यात्सागरमिव भासमानमिवौजसा । देवं द्रष्टुमिहायातः को भवानिति विस्मयात् ॥९६॥ मैत्रावरुण (वसिष्ठ) की सृष्टि की ॥८०॥ हे राजन् ! ब्रह्माजी ने अपने उदर से प्रतिहर्ता तथा पोता की सृष्टि की । अपने दोनों हाथों से उन्होंने आग्नीघ्र तथा यजुर्वेदीय उन्नेता की सृष्टि की ॥८ १॥ अपनी दोनों ऊरुओं से उन्होंने समागन करने वाले सुब्रह्मण्य की सृष्टि की । इसीतरह से जगत्पति स्वयम्भू (ब्रह्माजी) ने सभी यज्ञां के सोलह उत्तम ऋत्विजों की सृष्टि की । उसी समय वे महायोगी यज्ञ पुरुष हो गये ॥८२-८३॥ उसी तरह अङ्गों (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द तथा ज्योतिष इन वेदाङ्गो) उपनिषत् (रहस्यों) तथा क्रियायें भी हुयीं । परम पुरुष जो एकार्णव में शयन करते हैं यही आश्चर्यमयी घटना हुयी उसके विषय में आप सुनें । कौतूहलवशात् मार्कण्डेय नामक विप्र को श्रीभगवान् ने निगल लिया उसके कारण मार्कण्डेय महर्षि श्रीभगवान् के उदर में निवास किए ॥८४-८५॥ परम तेजस्वी मार्कण्डेय महर्षि की आयु तो हजारों वर्षों की थी । वे तीर्थ यात्रा के प्रसङ्ग में पृथिवी के तीर्थो की यात्रा करने लगे ॥८६॥ उन्होंने श्रीभगवान् के उदर में ही अत्यन्त पवित्र आश्रमों, देव मन्दिरों, देशों विचित्र राष्ट्रों तथा अनेक नगरों को ॥८७॥ जप होम करने वाले निर्मल शान्त तपस्वियों को उन्होंने देखा । उसके बाद वे धीरे से श्रीभगव। 7 के मुख से बाहर निकल गये ॥८८॥ श्रीभगवान् की माया से मोहित होने के कारण वे यह नहीं जान सके कि मैं भगवान् के मुख से निकल गया हूँ । श्रीभगवान् के उदर से निकलकर उन्होंने एकार्णव जगत् को देखा।८९॥ उन्होंने देखा कि जगत् घोर अन्धकार से आवृत है । उनको अत्यन्त भय उत्पन्न हो गया है उन्हें लगता था कि प्राण निकल जायेंगे॥९०॥ किन्तु जब उन्होंने श्रीभगवान् का दर्शन किया तो उन्हें अत्यन्त प्रसन्नता हुयी । अमोघात्मा मार्कण्डेय महर्षि ने सोचा ॥९१॥ क्या मैं स्वप्न देख रहा हूँ ? अथवा मुझे भ्रम हा रहा हैं ? स्पष्ट रूप से यह कोई मुझसे भिन्न व्यक्ति हैं ॥९२॥ यह स्वप्न नहीं हैं, अपितु सत्य ही है । चन्द्रमा, सूर्य, वायु, पर्वत और पृथिवी नष्ट हो गये हैं ॥९३॥ किन्तु यह कौन सा लोक है ? यह सोचकर वे चिन्तित हो गये । उन्होंने पर्वत के समान सोते हुए पुरुष को देखा ॥९४॥ वह आधे समुद्र के जल में डुबे हुए मेघ के समान है । वह अपने तेज से प्रकाशित हो रहा है,
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