Srishti Khanda Extracted Page 528
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-528
Sanskrit Original
नष्टार्कपवनाकाशे सूक्ष्मे जगति संवृते । संशोषमात्मना कृत्वा समुद्राणां च देहिनः ॥६७॥ दग्ध्वा संकोच्य च तथा स्वपित्येकः सनातनः। पौराणं रूपमास्थाय स्वपित्यमितविक्रमः ॥६८॥ एकार्णवजलेशायी योगीयोगमुपासितः । अनेकानि सहस्राणि युगान्येकार्णवांभसि ॥६९॥ न चैव कश्चिदव्यक्तं व्यक्तो वेदितुमर्हति। कश्चैष पुरुषो नाम किं योग कश्च योगवान् ॥७०॥ न पृष्ठे नैवमभितो नैव पार्श्वे नचाग्रतः। कश्चिद्विज्ञायते तस्य दृश्यते देवसत्तम: ॥७१॥ नभः क्षितिं पवनमपः प्रकाशनं प्रजापतिं भुवनधरं सुरेश्वरम् । पितामहं श्रुतिनिलयं मुनिं प्रभुं समापयञ्छयनमरोचयत्प्रभुः ॥७२॥ एवमेकार्णवीभूते शेते लोके महाद्युतिः । प्रच्छाद्यसलिले नोवी हंसो नारायणायते ॥७३॥ महतो राजसो मध्ये महार्णवसमस्य वै। वारिजाक्षो महाबाहुरक्षयं ब्रह्म यद्विदुः ॥७४॥ आत्मरूपसरूपेण तमसा संवृतः प्रभुः। मनः सात्विकमादाय यत्र तत्सत्वमाहितम् ॥७५॥ यथातथ्यं परं ज्ञानं भूताय ब्रह्मणे ततः । रहस्यं च तथोष्दिष्टं यथोपनिषदां स्मृतम् ॥७६॥ पुरुषो यज्ञ इत्येतत्परमं परिकीर्तितम् । यश्चान्यः पुरुषाख्यः स्यात्स एव पुरुषोत्तमः ॥७७॥ ये च यज्ञकरा विप्रा य ऋत्विज इति स्मृताः। अस्मादेव पुराभूता वक्त्रेभ्यः श्रूयते तथा॥७८॥ ब्रह्माणं प्रथमं वक्रादुद्वातार च सामगम् । होतारं च तथादध्वर्यु बाहुभ्यामसृजत्प्रभुः ॥७९॥ ब्रह्माणं ब्राह्मणाच्छंसिस्तोतारौ चैव सर्वशः। मेढ़ाच्च मैत्रावरुणं प्रतिष्ठातारमेव च ॥८०॥ उदरात्मतिहर्तारं पोतारं चैव पार्थिव | पाणिभ्यामथ चाग्रीध्रमुन्नेतारं च याजुषम् ॥८ १॥ निस्सीम भोग सम्पन्न श्रीभगवान् में ही बड़े-बड़े जीव भी लीन हो गये रहते हैं ॥६६॥ सूर्य, वायु तथा आकाश आदि के नष्ट हो जाने पर जब जगत् सूक्ष्म हो जाता है, तब श्रीभगवान् समुद्रों को शान्त करके तथा शरीर धारियों को जलाकर उनका संड्कोच कर देते हैं । उसके पश्चात् श्रीहरि अकेले शयन करते हैं । अमित विक्रम सम्पन्न वे नागरिकों का रूप धारण करके शयन करते हैं ॥६८॥ योगनिद्रा को अपनाकर श्रीभगवान् अनेक हजार युगों तक उस एकार्णव के जल में शयन करते हैं ॥६९॥ इनको कोई भी व्यक्त अथवा अव्यक्त नही जान सकता है कि इस पुरुष का नाम कया है ? इस योग का नाम क्या है ? तथा योग को अपनाने वाला पुरुष कौन है ?।।\७०॥ उनके आगे, पीछे, पार्श्व (बगल) में कोई भी जानने वाला देवता नहीं दिखायी पड़ता ॥७१॥ आकाश, पृथिवी, वायु तथा जल को प्रकाशित करने वाले, प्रजाओं के स्वामी, लोकों को धारण करने वाले, सुरेश्वर, सम्पूर्ण जगत् के पितामह, श्रुतियों के आश्रय स्वरूप, मननशील जगत् स्वामी ने समयानुसार अपनी निद्रा को समाप्त करना चाहा ॥७२॥ इस तरह जगत् के एकार्णव हो जाने पर महती कान्ति सम्पन्न श्रीभगवान् शयन करते हैं । सम्पूर्ण पृथिवी को जल से ढँककर हंस स्वरूप श्रीभगवान् नारायण हो जाते हैं ।।७३।। महत् तत्त्व एवं रजोगुण के बीच महार्णव को सन्निविष्ट करके उसकी रक्षा करते हुए महाबाहु भगवान् कमल नयन जिनको ब्रह्म कहते हैं ॥७४॥ अपने आत्मारूप से वे तमोगुण से आच्छन्न होकर सत्त्व गुण सम्पन्न सात्त्विक मन को अपनाकर ॥७५॥ उत्पन्न हुए ब्रह्माजी को परंज्ञान का ठीक-ठीक ज्ञान तथा उपनिषदों में वर्णित रहस्य का उपदेश दिये ॥७६॥ जिनको यज्ञ पुरुष तथा परम पुरुष कहा गया है, जिनको अन्य पुरुष कहा गया है वे ही पुरुषोत्तम हैं ॥७७॥ जो यज्ञ करने वाले ब्राह्मण हैं, जिनको ऋत्विज शब्द से से कहा गया है । पहले उत्पन्न हुए इन्हीं के मुख से सुना जाता है ॥७८॥ उनके प्रथम सामवेद का उद्रान करने वाले मुख उद्राता तथा ब्रह्मा की उत्पत्ति हुयी । उन्होंने अपनी दोनों भुजाओं से अध्वर्यु तथा होता की सृष्टि की ॥७९॥ ब्राह्मणाच्छंशी
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