Srishti Khanda Extracted Page 527
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-527
Sanskrit Original
भूत्वा चैव सहस्राचि महीं भित्वा रसातले। रमते जलमादाय पिबत्रसमनुत्तमम् ॥५१॥ मूर्तामूर्ते तदन्यच्च यदस्ति प्राणिषु ध्रुवम् । तत्सर्वमरविंदाक्ष आदते पुरुषोत्तमः ॥५२॥ वायुश्च बलवान्भूत्वा विधुन्वानोखिलं जगत् । प्राणापानं समासाद्य वायुनाक्रमते हरिः॥५३॥ ततो देवगणानां च सर्वेषां चैव देहिनाम् । पंचेद्रियगुणास्सर्वे भूतान्येव च यानि च ॥५४॥ घ्रेयं घ्राणं शरीरं च पृथिवीसंश्रितागुणाः । लोकयात्रा भगवता मुहूर्तेन विनाशिता ॥५५॥ जिह्वा रसश्च स्नेहश्च संश्रिताः सलिले गुणाः । रूपं चक्षुर्विभागश्च नेत्रज्योतिः श्रिता गुणाः ॥५६॥ स्पर्शः प्राणश्च चेष्टा च पवनं संश्रिता गुणाः । शब्द: श्रोत्रे च श्रवणं गगनं संश्रिता गुणाः ॥५७॥ मनो बुद्धिश्च चित्तं च क्षेत्रज्ञ चेति संश्रिताः । परेण परमेष्ठी च ह्—ृषीकेशमुपाश्रिताः ॥५८॥ ततो भगवतस्तस्य रश्मिभिः परिवारिताः । वायुना परिनुन्नाश्च भूमिशाखामुपाश्रिताः ॥५९॥ तेषां संहरणोद्धूतः पावकः शतधा ज्वलन् । प्रदहन्नखिलं विश्वं वृत्तः संवर्तकोऽनलः ॥६०॥ सपर्वतद्रुमान्गुल्मान् लतावल्लीस्तृणानि च। विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च ॥६९॥ यानि च श्रयणीयानि सर्वाण्यप्यदहद्धशम् । भस्मीकृत्य तु तान्सर्वाल्लोकान् लोकगुरो गुरु: ॥६ २॥ सभूतिं धारयामास युगांते लोकसंभवाम्। सहस्रवृष्टिः शतधा भूत्वा कृष्णो महाधनः ॥६३॥ दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम् । ततः क्षीरनिकाशेन स्वादुना परमांभसा॥६४॥ शिशिरेण चपुण्येन महीनिर्वाणमागमत्। तेन तोयेन संपृक्ता पयस्साधर्म्यतो धरा ॥६५॥ एकार्णावजलीभूता सर्वसत्वविवर्जिता। महासत्वान्यपि विभुं प्रविष्टान्यमितौजसम् ॥६६॥ रूप से पी लेते हैं । योगवेत्ता भगवान् पर्वतों के भी जल को खींच लेते हैं ॥५०॥ वे सूर्य होकर पृथिवी का भेदन करके रसातल में जाकर वहाँ के सम्पूर्ण जलों को पी लेते हैं ॥५१॥ मूर्त-अमूर्त तथा उससे भिन्न जितने भी प्राणी होते हैं उन सबों को श्रीभगवान् रस लेते हैं ॥५२॥ उसके बाद वायु बनकर वे सम्पूर्ण जगत् को सुखा देते हैं, तथा वे प्राण, अपान आदि वायुओं का भी संहार कर देते हैं ।।५३। उसके पश्चात् समस्त देवताओं आदि शरीरधारियों के पाञों इन्द्रियों के जो गुण हैं, उन सबों को भी वे ग्रहण कर लेते हैं ॥५४॥ प्रेय (सूंघने योग्य वस्तुएँ) प्राणेन्द्रिय तथा शरीर ये सभी पृथिवी में प्रवेश कर जाते हैं । इसतरह सम्पूर्ण संसार को भगवान् एक मुहुर्त में विनष्ट कर देते हैं॥५५॥ रसनेन्द्रिय, रस, स्नेह नामक गुण ये सभी जल में प्रवेश कर जाते हैं । रुप, चक्षुरिन्द्रिय तथा नेत्र ये सभी अग्न में प्रवेश कर जाते हैं ॥५६॥ स्पर्श नामक गुण, प्राण तथा सभी चेष्टायें ये सबके सब वायु में प्रवेश कर जाते हैं । शब्द और श्रोत्रेन्द्रिय आकाश में प्रवेश कर जाते हैं ॥५७॥ मन, बुद्धि, चित्त, तथा जीवात्मा ये सभी तथा ब्रह्मा ये सबके सब हृषीकेश परमात्मा में लीन हो जाते हैं ॥५८॥ उसके पश्चात् भगवान् सूर्य की किरणों से संतप्त, वायु के द्वारा उत्क्षिप्त तथा पृथिवी के ऊपर पड़े हुए इन सबों को ।।५९॥ विनष्ट करने वाली अग्नि अनेक प्रकार से प्रदीप्त हो जाती है और उससे सम्पूर्ण संसार दग्ध हो जाता है ॥६०॥ पर्वत, वृक्ष, गुल्म, लताएँ, बल्लियाँ, तृण, दिव्य विमान, सभी नगर ॥६१॥ जो कुछ भी आश्रय स्वरूप है, वे सबके सब जल जाते हें । इसतरह सभी लोकों को लोकगुरु श्रीभगवान् भस्म कर देते हैं ॥६२॥ वे लोक जन्य विभूति (भस्म) को युग के अन्त में धारण करते हैं। इसके बाद भगवान् महामेघ बनकर मूसलाधार वर्षा करते हैं ॥६३॥ और उस दिव्य जल से पृथिवी को सींच देते हैं। उसके पश्चात् दुग्ध के समान स्वादिष्ट शीतल तथा परम पवित्र जल से पृथिवी शीतल बन जाती है, उस दुग्ध के समान जल से सम्पृक्त तथा ॥६४-६५॥ सम्पूर्ण जीवों से रहित पृथिवी एकार्णव के रूप में परिणत हो जाती है ।
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know