Srishti Khanda Extracted Page 526

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-526

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Sanskrit Original

द्वाभ्यां धर्म: स्थितः पद्ध्यामधर्म स्त्रिभिरत्यितः । विपर्ययशतै र्थर्म:ः क्षयमेति कलौ युगे ॥३६॥ ब्रह्मण्यभावश्र्यवते तथास्तिक्यं विवर्ज्यते। व्रतोपवासास्त्यज्यंते कलौ वै युगपर्यये ॥३७॥ तदा वर्षसहस्त्रं तु वर्षाणां द्विशते तथा । यत्राधर्मश्चतुष्पादो धर्मः पादपरिग्रहः ॥३८॥ कामिनस्तापसाः क्षुद्रा जायंते यत्र मानवाः । नचावसायिकः कश्चिन्नसाधुर्न च सत्यवाक्॥३९॥ नास्तिका ब्राह्मणा भक्ता ज्ञायंते तत्र मानवाः । अहंकारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबंधनाः ।४०॥ विप्राः शूद्रसमाचारास्संति सर्वे कलौ युगे । आश्रमाणां विपर्यासः कलौ संप्रतिवर्तते ॥४१॥ वर्णानां चैव संदेहो युगांते कुरुनंदन । एषा द्वादशसाहस्रीयुगाख्या पूर्वनिर्मिता ॥४२॥ सहस्रयुगपर्यतं तदहर्बाह्यमुच्यते । ततो हनि गते तस्मिन्सर्वेषामेव जीविनाम् ॥४३॥ शरीरनिर्वृतिं दृष्ट्वा कालः संहारबुद्धिमान्। देवतानां च सर्वेषां ब्राह्मणानां महीपते ॥४४॥ दैत्यानां दानवानां च यक्षराक्षसपक्षिणाम् । गंधर्वाणामप्सरसां भुजंगानां च पार्थिव ॥४५॥ पर्वतानां नदीनां च पशूनां चैव सत्तम । तिर्यग्योनिगतानां च क्रिमीणां दंशिनां तथा ॥४६॥ सर्वभूतपत्तिः पंच भूत्वा भूतानि भूतकृत्। जगत्संहरणार्थाय कुरुते वैशसं महत् ॥४७॥ भूत्वा सूर्यश्चक्षुषीआददानो भूत्वा वायुः प्राणिनांप्रणिजातम् । भूत्वा वह्विनिर्दहन्सर्वलोकान् भूत्वामेधो भूय उग्रोऽ भ्यवर्षत् ॥४८॥ भूत्वा नारायणो योगी सर्वमूर्तिविभावसुः । गभस्तिभिः प्रदीप्ताभिः संशोषयति सागरान् ॥४९॥ ततः पीत्वार्णवान्सर्वान्नदीकूपांश्च सर्वतः । पर्वतानां च सलिलं सर्वमादाय योगवित् ॥५०॥ तथा क्षुद्र हो जाते हैं ॥३५॥ द्वापर में धर्म के दो पैर हो जाते हैं तथा अधर्म के तीन पैर हो जाते हैं । अनेक प्रकार के विपर्ययों के कारण धर्म कलियुग में नष्ट हो जाता है ॥३६॥ ब्राह्मणों के प्रति भक्ति की भावना क्षीण हो जाती है कहीं ही आस्तिकता नहीं रह जाती है । कलियुग के आने पर लोग व्रतों तथा उपवासों का परित्याग कर देते हैं। ३७॥ उसके बाद अपनी संध्या तथा संध्यांश के साथ बारह सौ वर्ष तक रहने वाला क्रूर कलियुग होता है, कलि में अधर्म चार पैरों वाला और धर्म एक चरण वाला रहता है ॥३८॥ कलियुग में तपस्वीगण, कामी तथा क्षुद्र हो जायेंगे सभी ब्राह्मण कोई भी निश्चय में समर्थ सज्जन और सत्य बोलने वाला नहीं होगा ॥३९॥ ब्राह्मण भक्तिहीन, तथा नास्तिक हो जायेंगे, वे अहङ्कारी तथा स्नेह के बन्धन से रहित होंगे ॥४०॥ कलियुग में सभी ब्राह्मण शूद्र के समान आचरण करने वाले हो जाते हैं । कलियुग में आश्रमों में उलट-फेर हो जाते हैं ॥४१। हे कुरुनन्दन भीष्म ! कलियुग में तो वर्ण भी पहचनाने में कठिनाई होने लगती है । इस तरह से बारह हजार दिव्य वर्षों का एक चतुर्युग पूर्वकाल से ही निर्मित है ॥४२॥ इस तरह के एक हजार चतुर्युग का ब्रह्माजी का एक दिन होता है । उसके बाद ब्रह्माजी के दिन के बीत जाने पर सभी प्राणियों के ॥४३।। शरीर की पूर्ति को देखकर काल सबों का संहार करता है । सभी देवताओं, ब्रह्मण आदि मनुष्यों, दानवों, दैत्यों, यक्ष, राक्षस, पक्षी, गन्धर्व, अप्सरायें, सर्प ॥४४-४५॥ पर्वतों, नदियों, तिर्यक् योनि के पशुओं, क्रिमियों, दंशों इत्यादि सबों का वह संहार करता है ॥४६॥ योग शक्ति सम्पन्न सभी जीवों के स्वामी परमात्मा जगत् का संहार करने के लिए सबों का विनाश कर देते हैं ॥४७॥ वे सूर्य होकर सबों के े तरों की ज्योति समाप्त कर देते हैं, वायु बनकर वे प्राणियों के प्राण समूह को ले लेते हैं, अग्नि होकर वे लोकों को जलाने लगते हैं तथा मेघ होकर वे अत्यन्त भयङ्कर वर्षा करते हैं ॥४८॥ सर्व शरीरक योगी भगवान् नारायण अग्नि होकर अपनी किरणों से सागरों के जल को सोख लेते हैं ॥४९॥ वे सभी समुद्रों, नदियों तथा कूपों के जल को पूर्ण

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