Srishti Khanda Extracted Page 525

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-525

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Sanskrit Original

यजामहे तमेवाद्य॑ स एवोत्थाननिर्वृतः । यो वक्ता यच्च वक्तव्यं यश्चाहं तद्ब्रवीमि ते॥२२॥ श्रूयते यच्च वै श्राव्यं यच्चान्यत्परिजल्पितम्। या कथायाश्च श्रुतयो योधर्मी धर्मतत्परः ॥२३॥ विश्वं विश्वपतिर्यश्च स तु नारायणः स्मृतः । यत्सत्यं यदत्रृतमादिमध्यभूतं यच्चांत्यं निरवधिकं च यद्भविष्यम् ॥२४॥ यत्किचिच्चरमचरं यदस्ति चान्यत्सर्वं तत्पुरुषवरः प्रधानभूतः । चत्वार्य्याहु सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् ॥२५॥ तस्य तावच्छती संध्या द्विगुणा कुरुनंदन। यत्र धर्मश्चतुष्पादस्त्वधर्मः पादविग्रहः ॥२६॥ स्वधर्मनिरताः शांता जायंते यत्र मानवाः । विप्राःस्थिता धर्मपरा राजवृत्तिस्थिता नृपाः॥२७॥ कृष्यामभिरता वैश्याः शूद्राः शुश्रूषवस्तथा । तदा सत्यं च सत्वं च धर्मश्चैव विवर्धते ॥२८॥ सद्धिराचरितो धमो येन लोकः प्रवर्त्तते । एतत्कृतयुगे वृत्तं सर्वेषामेव पार्थिव ॥२९॥ प्राणिनां धर्मसंज्ञानां नराणां नीचजन्मनाम्। त्रीण वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ॥३०॥ तस्यतावच्छती संध्या द्विगुणा परिकीर्तिता। द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यां त्रिभि ् धर्मोव्यवस्थितः॥३१॥ यत्र सत्यं च सत्वं च क्रियाधमों विधीयते। त्रेतायां विकृतिं यांति वर्णा लोभेन संयुताः ॥३२॥ चातुर्वणर्यस्य वैकृत्यं क्षांतिदौर्बल्यमेव च । एषा त्रेता युगगति विचित्रा देवनिर्मिता ॥३३॥ द्वापरं द्विसहस्त्रं तु वर्षाणां कुरुनन्दन । तस्य तावच्छती सन्ध्या द्विगुणं युगमुच्यते॥३४॥ तत्राप्यतीवार्थ पराः प्राणिनो रजसा हताः । शठा ै ष्कृतिकाः क्षुद्रा जायन्ते कुरुनन्दन॥३५॥ हैं वे ही सर्वकृति स्वरूप हैं ॥२१॥ हमलोग उन्हीं आद्य पुरुष का यजन करते हैं, वे ही उत्थान और पूर्णता रूप हैं। वे ही वक्ता, वक्तव्य तथा मैं जो बोलता हूँ वह सब वे ही हैं ॥२२॥ जो सुना जाता है, जो सुनने योग्य है, तथा जो कुछ कहा जा चुका है, कथाएँ, श्रुतियाँ, धर्म तथा धर्मी भी वे ही हैं ॥२३॥। तथा विश्व एवं विश्व के स्वामी भी भगवान् नारायण ही हैं । सत्य, अनृत (मिथ्या) आदि, मध्य, अन्तिम, अनन्त, भविष्य भी वे ही हैं ॥२४॥ जो कुछ भी सबसे अन्तिम है तथा दूसरी सारी वस्तुएँ भी भगवान नारायण ही है । वे ही प्रधान स्वरूप श्रेष्ठ पुरुष हैं। सत्य युग को चार हजार दिव्य वर्षो वाला कहा गया है ॥२५॥ और उसकी सन्ध्या और सन्ध्यांश भी चार-चार सौ वर्ष के ही होते हैं । सत्ययुग में धर्म चार पैरों वाला और अधर्म एक पैर वाला होता है ॥२६॥ इस युग में सभी मनुष्य अपने धर्म का पालन करने वाले तथा शान्त उत्पन्न होते हैं । ब्राह्मण धर्म परायण रहते हैं और क्षत्रिय राजवृत्ति वाले होते हैं ॥२७॥ वैश्य कृषि करते हैं तथा शूद्र सेवा परायण होते हैं । सत्ययुग में, सत्य, सत्त्वगुण तथा धर्म की वृद्धि होती है ॥२८॥ सज्जन पुरुष जिस धर्म का अनुष्ठान करते हैं, उसी से लोक की प्रवृत्ति होती है । हे राजन् ! सत्ययुग में सभी लोगों का ऐसा ही धर्म संज्ञक प्राणियों, मनुष्यों तथा नीचों के व्यवहार होते हैं । तीन हजार दिव्य वर्षा का त्रेतायुग कहा गया है ॥२९-३०॥ इस युग के सन्ध्या और सन्ध्यांश भी तीन-तीन सौ दिव्य वर्षों के ही होते हैं । त्रेतायुग में अधर्म के दो पैर होते हैं ओर धर्म के तीन पैर होते हैं ॥३ १॥ त्रेतायुग में सत्य, सत्वगुण तथा धार्मिक क्रियाओं का अनुष्ठान होता हैं । त्रेतायुग में सभी वर्णो में लोभ रूपी विकार आ जाता है ॥३२॥ चारो वो मे क्षान्ति रूपी दुर्बलता आ जाती है । यह त्रेतायुग की विचित्र गति देवताओं ने बनायी है ॥३३॥ हे कुरुनन्दन द्वापरयुग दो हजार दिव्य वर्षों का होता है । उस युग की सन्ध्या और सन्ध्यांश भी दो-दो सौ दिव्य वर्षो के ही हो जाते हैं ॥३४॥ इस युग में लोग अत्यन्त अर्थ परायण भी हो जाते हें । इस युग के लोग शठ, निष्कृति (कृतघ्न)

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