Srishti Khanda Extracted Page 524

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-524

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Sanskrit Original

किं नु विश्वपति: साक्षान्महातेजा महाद्युतिः। आस्ते यथाध्याननिष्ठो विधिमास्थाय योगवित् ॥८॥ शृण्वतः परया भक्तद्या ब्रह्मन्नेतदशेषतः। वक्तुमर्हसि धर्मज्ञ यशो नारायणात्मकम् ॥९॥ श्रद्धिनः सूपविष्टस्य भगवन्वक्तुमर्हसि । पुलस्त्य उवाच नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा ॥१०॥ सद्दंशान्वयपूतस्य न्याय्यं कुरु कुलोद्वह । श्ृणुष्वादिपुराणेषु देवेभ्यश्च यथाश्रुति ॥११॥ ब्राह्मणानां च वदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम् । यथा च तपसा दृष्ट्वा बृहस्पतिसमद्युतिः ॥१२॥ पराशरसुतः श्रीमान्गुरुद्वैपायनोऽ ब्रवीत् । तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाभक्ति यथा श्रुतिः ॥१३॥ यद्विज्ञातं मया सम्यशृषिमार्गेण सत्तम। कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम् ॥१४॥ विश्वावितारं ब्रह्मा यन्न वेदयति तत्वतः । तत्कर्म विश्वदेवानां तद्रहस्यं महर्षिषु॥१५॥ स इज्यस्सर्वयज्ञानां स तत्वं तत्वदर्शिनाम् । अध्यात्ममध्यात्मविदां नरकं च विकर्मिणाम् ॥१६॥ अधिदैवं च तद्दैवमधिदैवतसंज्ञितम् । अधिभूतं च तद्भूतं परं च परमार्थिनाम् ॥१७॥ स यज्ञो देदनिर्दिष्टस्तत्तपः कवयो विदुः । यः कर्त्ता कारकोबुद्धि र्यतः क्षेत्रज्ञ एव च ॥९८॥ प्रणवः पुरुषः शास्ता एकश्चेति विभाव्यते । प्राणः पंचविधश्चैव ध्रुवमक्षरमेव च ॥१९॥ कालः पाकश्च यज्ञश्च यष्टा चाधीतमेव च। उच्यते विविधैभावैः स एवायं तु तत्परम् ॥२०॥ स एव भगवान्सर्वं करोति न करोति च। सोस्मिन्कारयते सर्व स्थानिनां च कृतिः कृता॥२९॥ चुके थे, पृथिवी केवल गुफा के समान रह गयी थी तथा महाभूतं का विनाश हो गया था । महातेजस्वी तथा महाकान्ति सम्पन्न ध्यननिष्ठ, योग वेत्ता विश्व के स्वामी किस प्रकार से योग का आश्रय लेकर रहते हैं ॥८॥ हे ब्रह्मन् ! मैं इन सारी बातों को परमा भक्ति से सुन रहा हूँ, अतएव हे धर्मज्ञ आप भगवान् नारायण के यश का वर्णन करें ॥९॥ हे भगवन् ! मैं श्रद्धा सम्पन्न हूँ मुझे सृष्टि विषयक बातों को बतलायें । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- भगवान् नारायण के यश को सुनने की जो तुम्हारी कामना है ॥१०॥ वह सद्वंश में उत्पन्न हुए तुम्हारे लिए उचित ही है । जिसतरह आदि पुराणों में, देवताओं से जैसा सुना गया है ॥११॥ कहने वाले ब्राह्मणों तथा महात्माओं की वाणी को सुनकर तथाआचार्य वृहस्पति के समान कान्ति सम्पन्न हमारे गुरु तथा महर्षि पराशर के पुत्र महर्षि व्यास ने जैसा साक्षात्कार करके कहा, उसी को मैं अपनी भक्ति तथा श्रुति के अनुसार तुम्हें सुनाता हूँ ॥१२-१३॥ मैंने जिसे ऋषिमार्ग से जाना है कि कौन भगवान् नारायण को पूर्ण रूप से जानने का उत्साह कर सकता है ?।।१४।। विश्व के रक्षक जिन भगवान् नारायण को ब्रह्माजी भी तत्त्वत: नहीं जान पाते हैं । उनके कर्म सम्पूर्ण देवताओं तथा महर्षियों के लिए रहस्यमय है॥१५॥ वे ही सभी यज्ञों में पूजनीय हैं तथा वे ही तत्त्वज्ञों के लिए तत्त्व हैं वे अध्यात्म को जानने वालों के लिए आध्यात्म हैं, तथा पापियों के लिए नरक हैं ॥१६॥ वे ही अधिदैव संज्ञक अधिदेव हैं, वे ही अधिभूत तथा भूत हैं तथा परमार्थियों के परंतत्व हैं ॥१७॥ वे ही वेदों में निर्दिष्ट यज्ञ हैं तथा ब्रह्मवेत्ता उनको ही तप रूप से जानते हैं । वे ही कर्ता, कराने वाले हैं, उनसे ही ज्ञान तथा जीव उत्पन्न होते हैं ॥१८॥ वे ही प्रणव, पुरुष तथा जगत् के एकमात्र प्रशासक रूप से जाने जाते हैं । वे ही पाँच प्रकार के प्राण ध्रुव एवं अक्षर हैं ॥१९॥ वे ही काल, पाक, यज्ञ, यजन करने वाले तथा वेदाध्ययन स्वरूप हैं । वे अनेक भावों से यही हैं इस प्रकार से कह जाते हैं ॥२०॥ वे ही भगवान् सबो की सृष्टि करते हैं, उनमें विकार उत्पन्न करते हैं । वे ही इस जगत् के प्राणियों से सब कुछ करवाते

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