Srishti Khanda Extracted Page 522
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-522
Sanskrit Original
तुतोष राघव: श्रीमान् भरतः स हरीश्वरः । शत्रुघ्नो भ्रातरौ प्राप्तौ शक्रोपेन्द्राविवागतौ ॥१७९॥ प्रणिपत्य ततो मूर्ध्ना पंचांगालिंगितावनिः । उत्थाप्य चांकमारोप्य रामो भ्रातरमंजसा ॥१८०॥ भरतश्च ततः पश्चात्सुग्रीवस्तदनंतरम् । उपविष्टोऽथ रामाय सोऽर्घमादायसत्वरम् ॥१८९॥ राज्यं निवेदयामास चाष्टांगं राघवे तदा। श्रुत्वा प्राप्तं ततो रामं सर्वो वै माथुरो जनः॥१८२॥ वर्णा ब्रह्माणभूयिष्ठा द्रष्टुमेनं समागताः । संभाष्य प्रकृतीः सवनिगमान्त्राह्मणैः सह ॥१८३॥ दिनानि पंचोषित्वाऽत्र रामो गंतुं मनोदधे । शन्रुध्नश्च ततो रामे वाजिनोथगजांस्तथा॥१८४॥ कृताकृतं च कनकं तत्रोपायनमाहरत् । रामस्त्वाह ततः प्रीतः सर्वमेतन्मया तव ॥१८५॥ दत्त पुत्रौ तेभिषिञ्च राजानौ माथुरे जने । एवमुक्त्वा ततो रामः प्राप्तो मध्यं दिने रवौ॥१८६॥ महोदयं समासाद्य गङ्गातीरे स वामनम्। प्रतिष्ठाप्य द्विजानाह भाविनः पार्थिवांस्तथा ॥१८७॥ मया कृतोयं धर्मस्य सेतुर्भूतिविवर्धनः । प्राप्ते काले पालनीयो न च लोप्यः कथंचन १८८॥ प्रसारितकरेणैवं प्ररार्थनथैषा मया कृता । नृपाः कृते मयार्थित्वे यत्क्षेमंक्रियतामिह॥९८९॥ नित्यं दैनंदिनी पूजा कार्या सर्वैरतंद्रितैः। ग्रामान्दत्वा धनं तच्च लङ्काया आहृतं च यत्॥२९०॥ प्रेषयित्वा च किष्किंधां सुग्रीवं वानरेश्वरम्। अयोध्यामागतो रामः पुष्पकं तमथाब्रवीत्॥९९९॥ नागंतव्यं त्वया भूयस्तिष्ठ यत्र धनेश्वरः। कृतकृत्यस्ततो रामः कर्तव्यं नाप्यमन्यत॥९९२॥ में आये । वहाँ पर वे शत्रुओं का विनाश करने वाले पुत्रों सहित शत्रुष्नजी से मिले ॥१७८॥ और भरतजी के साथ श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त प्रसन्न हुए । इन्द्र एवं उपेन्द्र के समान आये हुए दोनों भाइयों को शत्रुघ्नजी ने पृथिवी पर पड़कर साष्टाङ्ग किया ॥१७९॥ उस समय उनके पाँचों अङ्ग पृथिवी से सट गये थे इसतरह से प्रणाम करते हुए शन्रुघ्नजी को उठाकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी उन्हें अपने हृदय से लगा लिये ॥१८०॥ उसके बाद भरतजी ने शत्रुघ्नजी को हृदय से लगाया और उसके पश्चात् सुग्रीवजी के बैठ जाने पर उन्होंने उन्हें शीघ्र ही अर्ध्य प्रदान किया॥ १८ १॥ तदनन्तर उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी को अष्टाङ्ग राज्य प्रदान किया । मथुरा के लोगों ने जब यह सुना कि श्रीरामचन्द्रजी आये हैं, तो वे उनका दर्शन करने के लिए आये ॥१५८२॥ भगवान् श्रीराम का दर्शन करने आने वालों में ब्राह्मण अधिक थे । भगवान् श्रीर,न ने समस्त वैदिक ब्राह्मणों तथा प्रजाओं से बातें की ॥१८३॥ वहाँ पर पाँच दिन रहने के बाद श्रीरामचन्द्रजी जाने का मन बनाये । उसके पश्चात् शत्रुघ्नजी हाथी, घोड़े तथा सुवर्ण भगवान् श्रीराम को उपहार रूप में प्रदान किये । तदनन्तर प्रसन्न होकर भगवान् श्रीराम ने कहा-- कि तुमने जो कुछ भी दिया है ॥१८४-१८५॥ तुम अपने पुत्रों को अभिषिक्त करो और मैने उसे दोनों पुत्रों तथा मथुरा के लोगों को दे दिया । इसतरह से कहकर रामचन्द्रजी रविवार के दिन दोपहर में ।।१८६॥ वामन भगवान् के साथ गङ्गाजी के तट पर आकर वामन भगवान् की प्रतिष्ठा किए और ब्राह्मणों तथा भविष्यत् कालिक राजाओं से कहे ॥१८७॥ मैंने ऐश्वर्य को बनाने वाले धर्मसेतु का निर्माण किया है । हे राजाओं मैंने जो किया है, उसका आपलोग पालन करेंगे, यही मैं चाहता हूँ ॥१८९॥ सबों को सावधानीपूर्वक प्रतिदिन की पूजा करनी चाहिए । उसके पश्चात् वे जो लङ्का से धन लाये थे उस धन को तथा ग्रामों को श्रीभगवान् ने उन्हें प्रदान किया ॥१९०॥ सुग्रवीजी को किष्किन्धा भेजकर वे अयोध्या आये और पुष्पक विमान से कहे ॥१९१॥ अब तुम मत आना, कुबेर के ही पास रहना । कृतकृत्य होकर भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ने मान लिया कि अब मुझे कुछ भी नहीं करना है ॥१९२॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- हे भीष्म ! की
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