Srishti Khanda Extracted Page 521
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-521
Sanskrit Original
कालश्च कामरूपीच नीलग्रीवो विदांवरः । वेदकर्तार्भको नित्यः पशूनां पतिरव्ययः॥१६४॥ दर्भपाणि ह॑सकेतुः कर्ता हर्ता हरो हरिः। जटी मुंडी शिखी दंडी लगुडी च महायशाः॥१६५॥ भूतेश्वरः सुराध्यक्षः सर्वात्मा सर्वभावनः । सर्वगः सर्वहारी च स्रष्टा च गुरुरव्ययः ॥१६६॥ कमंडलुधरो देवः स्रुक्त्रुवादिधरस्तथा। हवनीयोर्चनीयश्च ओंकारो ज्येष्ठसामगः ॥१६७॥ मृत्युञ्चैवामृतश्चैव पारियात्रश्च सुव्रतः । ब्रह्मचारीव्रतधरो गुहावासी सुपङ्कजः ॥१६८॥ अमरोदर्शनीयश्च बालसूर्यनिभस्तथा । दक्षिणे वामतश्चापि पत्नीभ्यामुपसेवितः ॥१६९॥ भिक्षुश्च भिक्षुरूपश्च त्रिजटी लब्धनिश्चयः । चित्तवृत्तिकरः कामो मधुर्मधुकरस्तथा ॥१७०॥ वानप्रस्थो वनगत आश्रमी पूजितस्तथा । जगद्धाता च कर्ता च पुरुषः शाश्वतो ध्रुवः॥१७१॥ धर्माध्यक्षो विरूपाक्षस्त्रिधमो भूतभावनः । त्रिवेदो बहुरूपश्च सूर्यायुतसमप्रभः ॥१७२॥ मोहको बंधकश्चैव दानवानां विशेषतः । देवदेवश्च पद्याङ्क्त्रनेत्रोब्जजटस्तथा ॥१७३॥ हरिश्मश्रु॒ धनुर्धारी भीमो धर्मपराक्रमः । एवं स्तुतस्तु रामेण ब्रह्मा ब्रह्मविदांवरः ॥१७४॥ उवाच प्रणतं रामं करे गृह्यपितामहः। विष्णुस्त्वं मानुषे देहेऽवतीर्णो वसुधातले ॥१७५॥ कृतं तद्धवता सर्व देवकार्यं महाविभो । संस्थाप्य वामनं देवं जाह्नव्या दक्षिणे तटे॥९७६॥ अयोध्यां स्वपुरीं गत्वा सुरलोकं व्रजस्व च । विसृष्टे ब्रह्मणा रामः प्रणिपत्य पितामहम् ॥९७७॥ आरूढः पुष्पकं यानं संप्राप्तो मधुरां पुरीम्। समीक्ष्य पुत्रसहितं शत्रुघ्नं श्रुघतिनम्॥१७८॥ नीलग्रीव तथा ज्ञानियों में श्रेष्ठ है । आप वेदकर्ता, नित्य ही बाल स्वरूप तथा निर्विकार पशुपति हैं ॥१६४॥ आप हाथ में कुश धारण करने वाले, हंसकेतु, जगत् के कर्ता, हर्ता तथा जगत् का संहार करने वाले हैं । आप महायशस्वी जटी, मुंडी तथा लगुडी हैं ॥१६५॥ आप भूतेश्वर, देवताओं के स्वामी, सबों की आत्मा स्वरूप तथा सर्वात्मा हैं । सर्वत्र व्याप्त, सबों का हरण करने वाले, सृष्टि करने वाले तथा निर्विकार गुरु हैं ।। १६६। आप कमण्डलु धारण करने वाले तथा खुक् एवं खुव धारण करने वाले हैं । आप हवनीय, अर्चनीय, ओंकार स्वरूप तथा ज्येष्ठ साम स्वरूप हैं ॥१६७॥ आप मृत्यु स्वरूप तथा अमृत स्वरूप हैं पारियात्र तथा सुव्रत ब्रह्मचारी, व्रत धारण करने वाले, हृदय गुफा में निवास करने वाले तथा सुन्दर पङ्कज स्वरूप हैं ॥१६८। आप अमर, दर्शनीय, बाल सूर्य के समान है । आपके दायें और बायें दोनों ओर आपकी दोनों पत्नियाँ रहती हैं ॥१६९। आप भिक्षु, भिक्षुरूप वाले, त्रिजटी तथा निश्चय प्राप्त करने वाले, चित्त में विकार को उत्पन्न करने वाले, काम स्वरूप मधु तथा मधुकर हें॥१७०॥। आप वानप्रस्थ, वनवासी, आश्रमी तथा सबों से पूजित हैं । जगत् का पालन करने वाले तथा जगत् को रचने वाले तथा ध्रुव, शाश्वत पुरुष हें ॥१७१॥ आप हरिश्मश्रु, धनुष धारण करने वाले भीम, धर्म तथा पराक्रम स्वरूप हें । भगवान् श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा इस प्रकार से स्तुति किये जाने वाले ब्रह्मज्ञानियो में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ।॥१७४॥ विनम्र हुए श्रीरामचन्द्रजी का हाथ पकड़कर उनसे कहे--- आप विष्णु हैं और इस पृथिवी पर मनुष्य रूप से अवतीर्ण हुए हैं ॥१७५॥ हे महाविभो ! आपने देवताओं के समस्त कार्यो को कर दिया, गङ्गा नदी के दाहिने तट पर वामन भगवान् की प्रतिष्ठा करके ॥१७६॥ अपनी राजधानी अयोध्या में जाकर देवलोक में चले जाइये । ब्रह्माजी से विदा लेकर भगवान् श्रीरामचन्द्र ने उन्हे साष्टाङ्ग प्रणाम किया ॥१७७।। उसके बाद पुष्पक विमान पर चढकर वे मथुरा पुरी
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