Srishti Khanda Extracted Page 520

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-520

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Sanskrit Original

सृष्टिखण्ड ' ४९५ दर्शनादेव नश्यंति नात्र कार्या विचारणा । गच्छ त्वं वामनं स्थाप्य गंगातीरे रघुत्तम ॥१५१॥ पृथिव्यां सर्वशः कृत्वा भागानष्टौ परंतप । श्वेतद्वीपं स्वकं स्थानं ब्रज देव नमोस्तुते॥१५२॥ प्रणिपत्य ततो रामस्तीर्थ प्राप्तश्च पुष्करम्। विमानं तु न यात्यूर्ध्व वेष्टितं तत्तु राघव: ॥९५३॥ किमिदं वेष्टितं यानं निरालंबेऽम्बरे स्थितम् । भवितव्यं कारणेन पश्येत्याह स्म वानरम् ॥१५४॥ सुग्रीवो रामवचनादवतीर्यधरातले । स॒ च पश्यति ब्रह्माणं सुरसिद्धसमन्वितम् ॥१५५॥ ब्रहार्षिसङ्खसहितं चतुर्वेदसमन्वितम् । दृष्ट्वा गत्याब्रवीद्रामं सर्वलोकपितामहः ॥१५६॥ सहितोलोकपालैश्च वस्वादित्यमरुद्रणैः । तं देवं पुष्पकं नैव लंघयोब्द्रि पितामहम् ॥१५७॥ अवतीर्य ततो रामः पुष्पकाद्धेमभूषितात् । नत्वा विरिंचनं देवं गायत्र्या सह संस्थितम् ॥१५८॥ अष्टांगप्रणिपातेन पंचांगलिंगितावनिः । तुष्टाव प्रणतो भूत्वा देवदेवं विरिंचनम् ॥१५९॥ राम उवाच नमामि लोककर्तारं प्रजापतिसुरार्चितम् । देवनाथं लोकनाथं प्रजानाथं जगत्पतिम् ॥१६०॥ नमस्ते देवदेवेश सुरासुरनमस्कृत । भूतभव्यभवन्नाथ हरिपिंगललोचन ॥ १६ १॥ बालस्त्वं वृद्धरूपी च मृगचर्मासनांबरः । तारणश्चासि देवस्त्वं त्रैलोक्यप्रभुरीश्वरः ॥१६२॥ हिरण्यगर्भ पद्यागर्भ वेदगर्भस्मृतिप्रद । महासिद्धो महापद्मी महादंडी च मेखली ॥१६३॥ वे लोग यदि महापापी भी होंगे तो उनके भी पाप विनष्ट हो जायेंगे । कष्ट प्रदान करने वाले ब्रह्महत्या इत्यादि पाप हें॥१५०॥ वे सभी पाप इस सेतुबन्ध तीर्थ का दर्शन करने से नष्ट हो जायेंगे, इसमें किसी भी प्रकार का संशय नहीं है । आप जाइये, गङ्गा के तट पर वामन की स्थापना करके ।।१५१॥ सम्पूर्ण पृथिवी को आठ भागों में विभक्त करके आप अपने स्थान श्वेतद्वीप में चले जायँ । हे देव, आपको नमस्कार हें ॥१५२॥ उसके बाद भगवान् श्रीराम शङ्करजी को साष्टाङ्ग प्रणाम करके पुष्कर तीर्थ में आये । किन्तु पुष्कर तीर्थ के वेष्टित होने के कारण उसके ऊपर से वह विमान आगे नहीं जा रहा था ॥१५३॥ यह देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने कहा क्या कारण है कि इस आधार हीन आकाश में विमान वेष्टित (स्तम्भित) क्यों हो गया ? उन्होंने उसका कारण जानने के लिए सुग्रीव से कहा ॥ १५४॥ श्रीरामचन्द्रजी की बात सुनकर सुग्रीव पृथिवी पर उतर कर पृथिवी पर विद्यमान देवताओं तथा सिद्धं के साथ ब्रह्माजी को देखे ॥१५५॥ उनके साथ महर्षियों का समूह तथा चारो वेद थे, यह देखकर सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी को बतलाये की सम्पूर्ण लोकों के पितामह ।।१५६॥ ब्रह्माजी लोकपालों, वसुओं, आदित्यों तथा मरुद्रणों के साथ नीचे विद्यमान हैं। अतएव यह पुष्पक ब्रह्माजी को नहीं लांघ सकता है ॥१५७॥ उसके बाद सुवर्ण मण्डित पुष्पक विमान से उतरकर गायत्री देवी के साथ विद्यमान ब्रह्माजी को नमस्कार करके ॥१५६-१५७॥।। जिसमें (शिर, हृदय, पैर, हाथ और घुटने) पृथिवी से सट गये थे इसतरह से साष्टाङ्ग प्रणाम करके श्रीरामजी नम्र होकर देवाराध्य ब्रह्माजी की स्तुति किए ॥१५९॥ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा-- देवताओं से पूजित लोककर्ता प्रजापति ब्रह्माजी को मैं नमस्कार करता हूँ हे देवताओं के स्वामी लोकों के स्वामी, प्रजाओं के स्वामी तथा जगत् के स्वामी ब्रह्माजी में नमस्कार करता हूँ । ,हे देवदेवेश, हे सुरासुर नमस्कृत, भूत भविष्य तथा वर्तमान के स्वामी, हरित तथा पीत नेत्र वाले ॥१६ १॥ ब्रह्माजी आप बालरूप तथा बृद्ध रूप वाले हैं । मृगचर्म ही आपका आसन और वस्र है । आप उद्धार करने वाले देवता त्रैलोक्य के स्वामी तथा ईश्वर है ॥१६२॥ हिरण्यगर्भ, पद्मगर्भ, वेदगर्भ तथा स्मृति प्रदान करने वाले ब्रह्माजी आप महासिद्ध, महापद्मी, महादण्डी तथा मेखला धारण करने वाले हैं ॥१६३।॥ आप काल स्वरूप, काल शरीरक,

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