Srishti Khanda Extracted Page 519

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-519

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Sanskrit Original

राम उवाच नमस्ते देवदेवेश भक्तानामभयंकर । गौरीकांतनमस्तुभ्यं दक्षयज्ञविनाशन ॥१३७॥ ` नमो भवाय शर्वाय रुद्राय वरदाय च। पशूनां पतये नित्यं चोग्राय च कपर्दिने ॥१३८॥ महादेवाय भीमाय त्र्यम्बकाय दिशांपते । ईशानाय भगघ्नाय नमोस्त्वंधकधघातिने॥९३९॥ नीलग्रीवाय घोराय वेधसे वेधसास्तुत । कुमारशत्रुनिध्ताय कुमारजननाय च॥१४०॥ विलोहिताय धूम्राय शिवाय क्रथनाय च । नमोनीलशिखंडाय शूलिने दैत्यनाशिने॥१४१॥ उग्राय च त्रिनेत्राय हिरण्यवसुरेतसे । अनिद्यायांबिकाभरत्रें सर्वदेवस्तुताय च ॥१४२॥अभिगम्याय काम्याय सद्योजाताय वै नमः । वृषध्वजाय मुंडाय जटिने ब्रह्मचारिणे ॥१४३॥ तप्यमानाय तप्याय ब्रह्मण्याय जयाय च । विश्वात्मने विश्वसृज विश्वमावृत्यतिष्ठते॥९४४॥ नमो नमोस्तु दिव्याय पत्रन्नार्तिहराय च । भक्तानुकंपिने देव विश्वतेजो मनोगते ॥१४५॥ पुलस्त्य उवाच एवं संस्तूयमानस्तु देवदेवो हरो नृप । उवाच राघवं वाक्यं भक्तिनम्रं पुरा स्थितम् ॥१४६॥ रुद्र उवाच भो भो राघव भत्रं ते ब्रूहि यत्ते मनोगतम् । भवान्नारायणो नूनं गूढो मानुषयोनिषु ॥१४७॥ अवतीर्णो देवकार्य कृतं तच्चानघ त्वया । इदानीं स्वं ब्रजस्थानं कृतकार्योसि शत्रुहन् ॥१४८॥ त्वया कृतं परं तीर्थ सेत्वाख्यं रघुनंदन । आगत्य मानवा राजन्पश्येयुरिह सागरे ॥१४९॥ महापातकयुक्ता ये तेषां पापं विलीयते । ब्रह्मवध्यादिपापानि यानि कष्टानि कानिचित्॥१५०॥ वाले देवदेवेश आपको नमस्कार है । हे दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले गौरीकान्त ! आप को नमस्कार है।१३७।। भव, शङ्कर, शर्व, रुद्र तथा वरद को नमस्कार है । पशुपति, उग्र तथा कपर्दी को नित्य ही मेरा नमस्कार है ॥१३८॥ महादेव, त्र्यम्बक तथा दिशाओं के स्वामी ईशान, भगध्न तथा अंधकासुर का विनाश करने वाले शिवजी को नमस्कार है ॥१३९॥ नीलग्रीव, घोर, ब्रह्माजी जिनकी स्तुति करते हैं ऐसे बेधस, कुमार (कार्तिकेय) के शत्रु को मारने वाले, तथा कुमार को उत्यन्न करने वाले शङ्करजी को नमस्कार है ॥|१४०॥ विलोहित, धूम्र, शिव, क्रथन, नीलशिखण्ड, शूलधारी तथा दैत्यों का विनाश करने वाले शिवजी को नमस्कार है ॥१४१॥ उग्र, त्रिनेत्र, हिरण्यवसु तथा हिरण्यरेता शिवजी को नमस्कार है । अनिन्द्य, अम्बिकापति तथा सभी देवता जिनकी स्तुति किए हैं, ऐसे शङ्करजी को नमस्कार है ॥१४२॥ अभिगम्य, काम्य तथा सद्योजात को नमस्कार है । वृषध्वज, मुण्ड, जटिल तथा ब्रह्मचारी शङ्करजी को नमस्कार है ॥१४३॥ तप्यमान, तप्य, ब्रह्मण्य, जय, विश्वात्मा, विश्वसह तथा विश्वव्यापक शिवजी को नमस्कार है ॥१४४॥ दिव्य, शरणागतों के कष्ट को दूर करने वाले, भक्तों पर कृपा करने वाले, विश्वतेज स्वरूप, मन के समान गति वाले शिवजी को नमस्कार है ॥१४५॥ पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- इसतरह से स्तुति किए जाते हुए देवाराध्य भगवान् शङ्करजी ने भक्ति पूर्वक सामने खड़े भगवान् श्रीराम से कहा॥ १४६॥ रुद्र ने कहा-- हे राघव ! आपका कल्याण हो, आपके मन में जो हो आप कहिए । निश्चित रूप से इस मनुष्य रूप में छिपे हुए आप नारायण हैं ॥१४७॥ हे अनघ ! अवतार ग्रहण करके आपने देवताओं का कार्य किया । अब आप अपने स्थान पर जाइये, हे शत्रुओं के विनाशक आपने अपना कार्य कर लिया है ॥१४८॥ हे रघुनंदन! आपने श्रेष्ठतीर्थ सेतुबन्ध का निर्माण किया है । जो लोग यहाँ समुद्र तर पर आकर इसका दर्शन करेंग।१४९॥

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