Srishti Khanda Extracted Page 518
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-518
Sanskrit Original
विदित्वा तदभिप्रायं वायुना समुदाहृतम् । विभीषणस्त्वलंकृत्य रत्नैः सर्वैश्च वामनम्॥१२३॥ आनीय चार्पयद्रामे वाक्यं चेदमुवाच ह। यदा वै निर्जितः शक्रो मेघनादेन राघव॥१२४॥ तदा वै वामनस्त्वेष आनीतो जलजेक्षण । नयस्व तमिमं देव देवदेवं प्रतिष्ठय ॥१२५॥ तथेति राघवः कृत्वा पुष्पकं च समारुहत् । धनं रत्ममसंख्येयं वामनं च सुरोत्तमम् ॥१२६॥ गृह्यसुग्रीवभरतावारूढौ वामनादनु । ब्रजन्नेवांबरे रामस्तिष्ठेत्याहविभीषणम् ॥१२७॥ राघवस्य वचः श्रुत्वा भूयोप्याह सराघवम् । करिष्ये सर्वमेतद्धि यदाज्ञप्तं विभो त्वया ॥१२८॥ सेतुनानेन राजेद्रपृथिव्यां सर्वमानवाः । आगत्य प्रतिबाधेरन्नाज्ञा भंगो भवेत्तव ॥१२९॥ कोऽत्रमे नियमो देव किन्नुकार्य मया विभो । श्रुत्वैतद्राघवो वाक्यं राक्षसोत्तमभाषितम् ।१३०॥ कार्मुकं गृह्हस्तेन रामः. सेतुं द्विधाच्छिनत् । त्रिर्विभज्य च वेगेन मध्ये वै दशयोजनम् ॥१३१॥ छित्त्वा तु योजनं चैकमेकं खंडत्रयं कृतम् । वेलावनं समासाद्य रामः पूजां रमापतेः ॥१३२॥ कृत्वा रामेश्वरं नाम्ना देवदेवं जनार्दनम् । अभिषिच्याथ संगृह्य वामनं रघुनंदनः ॥९३३॥ दक्षिणादुदधेश्चैव निर्जगामत्वरान्वितः । अंतरिक्षादभूद्वाणी मेघगंभीरनिःस्वना ॥९३४॥ रुद्र उवाच भो भो रामास्तुभद्रं ते स्थितोहमिह सांप्रतम्। यावज्जगदिदं राम यावदेषा धरास्थिता॥१३५॥ तावदेव च ते सेतुतीर्थ स्थास्यति राघव । श्रुत्वैवं देवदेवस्य गिरं ताममृतोपमाम्॥१३६॥ थे उसी समय वायु देवता ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा ॥१२१॥ जिसने प्राचीनकाल में बलि को बाँध दिया था उन भगवान् वामन की यहाँ मूर्ति है, हे महाभाग ! उसे आप ले चलें और कान्यकुब्ज में उसकी प्रतिष्ठा करें ।।१२२॥ वायु के अभिप्राय को जानकर विभीषण ने भगवान् वामन की मूर्ति को सभी रत्नों से अलंकृत करके ॥१२३॥ लाये और श्रीरामचन्द्रजी को प्रदान करके कहे हे राघव ! जब मेघनाद ने इन्द्र को जीत लिया ॥१२४।॥ उसी समय वह इस मूर्ति को लाया था हे देव ! आप इस भगवान की मूर्ति को प्रतिष्ठित करें ॥१२५॥ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा-- ठीक है, और वे पुष्पक विमान पर बैठ गये । वामन भगवान् के पश्चात् भरतजी तथा सुग्रीव असंख्य सम्पत्ति तथा रत्नों को लेकर उस विमान पर बैठ गये । आकाश में जाते हुए श्रीराम. ने विभीषण से कहा-- तुम ठहरो ॥१२७॥ श्रीराम की वाणी को सुनकर विभीषण ने फिर कहा-- हे विभो ! आपने जो आज्ञा दी है, मैं उन सारे कार्यों को करूँगा ॥१२८॥ हे राजेन्द्र ! पृथिवी के सभी मानव इस सेतु के माध्यम से आकर बाधा उपस्थित करेंगे और उसके कारण आपकी आज्ञा का उल्लंघन होगा ॥१२९॥ हे देव ! इसके विषय में मेरा कौन सा नियम होगा तथा मुझे क्या करना चाहिए ? विभीषण की बातों को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ॥१३०॥ हाथ में धनुष उठाकर सेतु को दो भागों में तोड़ दिये । फिर वेग पूर्वक उन्होंने बीच के दश योजन को तीन भागों में विभक्त कर दिया ॥१३१॥ उसके बाद एक योजन को तोड़कर एक टूकड़े को तीन बना दिया । इसके बाद वेला वन में आकर भगवान् विष्णु की वे पूजा किए ॥१३२॥ वहाँ उन्होंने शङ्करजी का नाम रामेश्वर रखा इसके बाद उन्होंने वामन भगवान् का अभिषेक किया॥ १३ ३॥ श्रीरामचन्द्रजी दक्षिण समुद्र से शीघ्रता पूर्वक बाहर निकले उसी समय अंतरिक्ष से मेघ के समान गम्भीर वाणी में आकाशवाणी हुयी ॥१३४॥ रूद्र ने कहा-- हे श्रीराम ! आपका कल्याण हो । में यहाँ पर स्थित हूँ । जब तक यह जगत् रहेगा तथा जब तक पृथिवी रहेगी ॥१३५॥ तब तक आपका यह सेतु तीर्थ बना रहेगा । भगवान् शङ्कर की अमृत के समान वाणी को सुनकर ॥१३६॥ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा-- हे भक्तों को अभय बनाने
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