Srishti Khanda Extracted Page 517
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-517
Sanskrit Original
पुत्रो दशरथस्यैव सर्व स च करिष्यति। इदानीं त्वं मया ज्ञातः स्मृत्वा तद्धर्त भाषितम्॥१९०८॥ सीतालक्ष्मी भवान्विष्णुर्देवा वै वानरास्तथा । गृहं पुत्र गमिष्यामि स्थिरकीर्तिमवाप्नुहि॥९०९॥ सरमोवाच इहैव वत्सरं पूर्णमशोकवानिकास्थिता । सेविता जानकी देवी सुखं तिष्टति ते प्रिया॥११०॥ नित्यं स्मरामि वै पादौ सीतायास्तु परंतप । कदा द्रक्ष्यामि तां देवीं चिंतयाना त्वहर्निशम्॥१११॥ किमर्थ देवदेवेन नानीता जानकीत्विह। एकाकी नैव शोभेथा योषिता च तया बिना॥११२॥ समीपे शोभते सीता त्वं च तस्याः परंतप। एवं ब्रुवन्त्यां भरतः केयमित्यब्रवीद्दचः ॥११३॥ ततश्चेंगितविद्रामो भरतं प्राह सत्वरम् । विभीषणस्य भार्या वै सरमा नामनामतः॥९१४॥ प्रिया सखी महाभागा सीतायास्सुदूढं मता । सर्वं कालकृतं पश्य न जाने किं करिष्यति॥११५॥ गच्छत्वं सुभगे भर्तृगेहें पालय शोभने । मां त्यक्त्वा हि गता देवी भाग्यहीनं गतिर्यथा॥९९६॥ तया विरहितः सुक्ष रतिं विदे न कर्हिचित् । शून्या एव दिशः सर्वाः पश्यामीह पुनर्भ्रमन् ॥११७॥ विसृज्य तां च सरमां सीतायास्तु प्रियां सखीम्। गतायामथ केकस्यां रामः प्राह विभीषणम्॥११८॥ दैवतेभ्यः प्रियं कार्य नापराध्यास्त्वया सुराः। आज्ञया राजराजस्य वर्तितव्यं त्ववानघ ॥११९॥ लंकायां मानुषो यो वै समागच्छेत्कथंचन । राक्षसैर्न च हंतव्यो द्रष्टव्योऽसौ यथात्वहम्॥१२०॥ विभीषण उवाच आज्ञयाहं नरव्याघ्र करिष्ये सर्वमेव तु । बिभीषणे हि वदति वायू राममुवाच ह॥१२९॥ ` इहास्ति वैष्णवी मूर्तिः पूर्वं बद्धो बलिर्यया। तां नयस्व महाभागे कान्यकुब्जे प्रतिष्ठय ॥१२२॥ के पुत्र ही करेंगे, अपने पति की बातों को स्मरण करके मैने अब आपको जान लिया है ॥१०८॥ सीताजी लक्ष्मी हैं आप विष्णु हैं तथा सभी वानर देवगण हैं । हे पुत्र ! मैं अपने घर जाऊंगी, तुम स्थिर कीर्ति को प्राप्त करो ॥१०९॥ सरमा ने कहा यहीं पर अशोक वाटिका में एक वर्ष तक रहने वाली, जानकी देवी की मैंने सेवा की है, वे सीताजी सुख पूर्वक हैं न ॥११०॥ हे परंतप ! मैं सदैव सीताजी के चरणों का स्मरण करती हूँ, में सदा यही सोचती हुँ कि सीताजी का न जाने कब दर्शन कर पाऊंगी ॥१११॥ आप अपने साथ जानकी देवी को क्यों नहीं लाये ? अपनी पत्नी के बिना अपकी अकेले शोभा नहीं हो पा रही है ॥११२॥ आपके सन्निकट में रहकर सीताजी सुशोभित होती हैं और आप उनके साथ सुशोभित होते हैं । इस तरह से सरमा के कहते समय भरतजी ने पूछा ये कौन हे?।।११३॥।। उसके बाद इशारे को जानने वाले श्रीरामचन्द्रजी ने भरतजी से कहा, ये विभीषणजी की पत्नी सरमा हैं। १ १४॥ ये महाभागा सीता की स्निग्ध सखी हैं । भगवान् श्रीराम ने कहा-- सबकुछ कालजन्य देखो वह न जाने क्या करने वाला है 2॥११५॥ हे सुभगे ! तुम अपने घर जाओ, अपने पति के घर का पालन करो, वे देवी मुझको छोड़कर भाग्यहीन की गति के समान चली गयीं ॥११६॥ हे सुभ्रु ! सीता के बिना मुझें कहीं भी सुख नहीं मिलता है । घूमता हुआ मैं तो सारी दिशाओं को शून्य सा देखता हूँ ॥११७। सीता की प्रिय सखी सरमा को विदा करके तथा कैकसी के चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण से कहा ॥११८॥ तुम सदा देवताओं का प्रिय कार्य करना, तुम कभी देवताओं का अपराध नहीं करना हे अनघ ! राज-राज की आज्ञा का सदा पालन करना ॥११९॥ लङ्का में यदि कोई मनुष्य आता है तो उसे राक्षसों को नहीं मारना चाहिए, उसको मेरे ही समान देखना चाहिए ।॥१२०॥ विभीषण ने कहा-- हे नरव्याघ्र मैं आपकी आज्ञा का पूर्ण रूप से पालन करूँगा । जिस समय विभीषण बोल रहे
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