Srishti Khanda Extracted Page 516
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-516
Sanskrit Original
विभीषण उवाच एवं कुरुष्व वै मातर्गृहाण नवमंबरम् । पात्रं चंदनसंयुक्तं दधिक्षौद्राक्षतैः सह ॥९५॥ ू र्वयार्घ सह कुरु राजपुत्रस्य दर्शनम् । सरमामग्रतः कृत्वा याश्चान्यदेवकन्यकाः ॥९६॥ ब्रजस्व राघवाभ्याशं तस्मादग्रे वजाम्यहम्। एवमुक्त्वा गतं रक्षो यत्र रामो व्यवस्थितः ॥९७॥ उत्सार्य दानवान् सर्वान् रामं द्रष्टुं समागतान्। सभां तां विमलां कृत्वा रामं स्वाभिमुखे स्थितम्॥९८॥ विभिषण उवाच बिज्ञाप्यं शृणु मे देव वदतश्च विशांपते । दशग्रीवं कुंभकर्णं या च मां चाप्यजीजनत् ॥९९॥ इयं सा देव माता नः पादौ ते द्रष्टुमिच्छति । तस्यास्तु त्वं कृपां कृत्वा दर्शनं दातुमर्हसि॥१००॥ राम उवाच अहं तस्याः समीपं तु मातृदर्शनकांक्षया । गमिष्ये राक्षसेंद्र त्वं शीघ्रं याहि ममाग्रतः ॥१०९॥ प्रतिज्ञाय तु तं वाक्यमुत्तस्थौ च वरासनात् । मूर्ध्नि चांजलिमाधाय प्रणाममकरोद्विभुः॥१०२॥ अभिवादयेहं भवतीं माता भवसि धर्मतः । महता तपसा चापि पुण्येन विविधेन च॥१०३॥ इमौ ते चरणौ देवि मानवो यदि पश्यति । पूर्णस्स्यात्तदहं प्रीतो दृष्ट्वेमौ पुत्रवत्सले॥१०४॥ कौसल्या मे यथा माता भवती च तथा मम । केकसी चाव्रवीद्रामं चिरंजीव सुखी भव ॥१०५॥ भर्त्र मे कथितं वीर विष्णुर्मानुषरूपधृत् । अवतीर्णो रघुकुले हितार्थे त्रिदिवौकसाम् ॥१०६॥ दशग्रीवविनाशाय भूतिं दातुं विभीषणे । वालिनो निधनं चैव सेतुबंधं च सागरे ॥९०७॥ कहा था ॥९३॥ रघुवंशियों के वंश में दशरथ पुत्र विष्णु राक्षसराज रावण का विनाश करेंगे ॥९४।। विभीषण ने कहा-- हे माँ ऐसा करो कि नवीन वस्त्र लेकर दधि, मधु तथा अक्षत के साथ चन्दन युक्त पात्र में दूर्वा युक्त अर्घ्य के साथ श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन करो । सरमा को आगे कर लो, जितनी भी देव कन्यायें हैं उन सबों के साथ श्रीरामचन्द्रजी के पास जाओ । में सबों के आगे चलूँगा । इस तरह से कहकर विभीषणजी श्रीरामजी के पास गये।।९ ५-९६॥ श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन करने के लिए आये हुए सभी दानवों को हटाकर, उस सभा को स्वच्छ बनाकर सामने बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी से ।।९८। विभीषण ने कहा-- हे देव ! हे राजन् ! आप मेरी बातों को सुनें जिसने रावण, कुम्भकर्ण तथा मुझको जन्म दिया ॥९९॥ वह हमारी माता आपके चरणों का दर्शन करना चाहती है । अतएव कृपा करके आप उसे दर्शन दें ॥१००॥ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा-- हे राक्षसेन्द्र ! में उसका दर्शन करने के लिए स्वयं उसके पास चलूँगा और आप मेरे आगे-अगे चलें ॥१०१॥ कैंकसी की बातों को जानकर श्रीरामचन्द्रजी उस श्रेष्ठ आसन से उठ कर खड़े हो गये और अपनी अञ्जलि को शिर से लगाकर भगवान् श्रीराम ने कैकसी को प्रणाम किया ॥१०२॥ उन्होंने कहा-- मैं आपको प्रणाम करता हूँ । आप मेरी धर्म की माता हें; क्योंकि आपने अत्यधिक तपस्या की है, और अनेक प्रकार के पुण्यों को आपने अर्जित किया है ॥१०३॥ यदि आपके इन दोनों चरणों का कोई मनुष्य दर्शन करता है, तो वह पूर्ण हो जाय । हे पुत्रवत्सले ! में आपके चरणों का दर्शन करके अत्यन्त प्रसन्न हुँ ॥॥१०४॥ जिस तरह कौसल्या मेरी माता हैं, उसी तरह आप भी मेरी माता हें । कैकसी ने कहा-- तुम चिरंजीवी और सुखी होओ ।॥१०५॥ मेरे पति ने कहा था कि देवताओं का कल्याण करने के लिए रघुकुल में भगवान् विष्णु मनुष्य रूप से अवतीर्ण हुए हैं ॥१०६॥ वे रावण का विनाश करेंगे तथा विभीषण को. ऐश्वर्य प्रदान करेंगे वे बाली को मारेंगे और समुद्र पर सेतु बनायेंगे ॥१०७॥ इन समस्त कार्यो को महाराज दशरथ
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