Srishti Khanda Extracted Page 515

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-515

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Sanskrit Original

.० श्रीपद्यमहापुराण विभीषणस्तु तच्छुत्वा रामागमनमंतिके। चारां स्तान्पूजयामास सर्वकामधनादिभिः ॥७९॥ अलंकृत्य पुरीं तां तु निष्क्रान्त; सचिवैः सह। दृष्ट्वा राम विमानस्थं मेराविवदिवाकरम् ॥८०॥ अष्टाङ्गप्रणिपातेन नत्वा राघवमब्रवीत् । अद्यमे सफलं जन्म प्राप्ताः सर्वे मनोरथाः ॥८ १॥ यददृष्टौ देवचरणौ जगद्वंद्यावनिंदितौ । कृतः श्लाध्योस्म्यहं देव शक्रादीनां दिवौकसाम्॥८ २॥ आत्मानमधिकं मन्ये त्रिदशेशात्पुरंदरात् । रावणस्य गृहे दीप्ते सर्वरत्ननोपशोभिते ॥८३॥ उपविष्टे तु काकुत्स्थे अर्घ दत्वा विभीषणः । उवाच प्रांजलिर्भूत्वा सुग्रीवं भरतं तथा ॥८४॥ इहागतस्य रामस्य यद्दास्ये न तदस्तिमे । इयं च लंका 'रामेण रिपुं त्रैलोक्यकंटकम् ॥८ ५॥ हत्वा तु पापकर्माणं दत्ता पूर्व पुरीं मम । इयं पुरी इमे दारा अमी पुत्रास्तथाह्यहम्॥८ ६॥ सर्वमेतन्मयादत्तं सर्वमक्षयमस्तु ते। ततः प्रकृतयः सर्वा लंकावासिजनाश्च ये ॥८७॥ आजग्मूराघवं द्रष्टुं कौतूहलसमन्विताः । उक्तो विभीषणस्तैस्तु रामं दर्शय नःप्रभो ॥८८॥ विभीषणेन कथिता राघवाय महात्मने । तेषामुपायनं सर्व॑ भरतो रामचोदितः ॥८९॥ जग्राह वानरेन्रश्च धनरत्मौघसंचयम्। एवं तत्र त्र्यहं रामो ह्यवसद्राक्षसालये ॥९०॥ चतुर्थेऽहनि संप्राप्ते रामे चापि सभा स्थिते । केकसी पुत्रमाहेदं रामं द्रक्ष्यामि पुत्रक ॥९१॥ दृष्टे तस्मिन्महत्पुण्यं प्राप्यते मुनिसत्तमैः । विष्णुरेष महाभागश्चतुर्मूर्तिस्सनातनः ॥९२॥ सीतालक्ष्मीर्महाभाग न बुद्धा साग्रजेनं ते। पित्रा ते पूर्वमाख्यातं देवानां दिवि संगमे॥९३॥ कुले रघूणां वै विष्णुः पुत्रो दशरथस्य तु । भविष्यति विनाशाय दशग्रीवस्य रक्षसः॥९४॥ श्रीरामचन्द्रजी सन्निकट आ गये हैं उन्होंने दूतों को धन इत्यादि देकर सन्तुष्ट किया और उन सबों की कामना पूर्ण की ॥७९॥ लङ्कापुरी को अलंकृत करके वे मन्त्रियो के साथ बाहर निकले और उन्होंने विमान पर बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजी को उसी तरह देखा जैसे सुमेरु पर्वत पर सूर्य विद्यमान हों ॥८०॥। उन्होंने श्रीरामचन्द्रजी को साष्टाङ्ग प्रणाम किया और कहा आज मेरा जन्म सफल हो गया और मेरे सारे मनोरथ पूर्ण हो गये ॥८ १॥ क्योंकि आज मेने आपके जगद्वन्द्य पवित्र चरणों का दर्शन किया है । हे देव ! में आज इन्द्र इत्यादि देवताओं के लिए भी प्रशंसनीय हो गया हूँ ॥८ २॥ में देवताओ के स्वामी इन्द्र से भी अधिक अपने को मानता हूँ । सभी रत्नों से सुशोभित रावण के जले हुए भवन में श्रीरामचन्द्रजी के बैठ जाने पर विभीषणजी अपना आधा आसन देकर सुग्रीव तथा भरतजी से हाथ जोड़कर कहे ॥८३-८४॥ यहाँ पर आये हुए श्रीरामचन्द्रजी के दासभूत मेरी यह लङ्का है । श्रीरामचन्द्रजी ने त्रैलोक्य के शत्रु पापी रावण को मारकर मुझे इस नगरी को प्रदान किया है । यह नगरी, ये स्त्रियां, ये पुत्र तथा में स्वयम् ॥८५-८६॥ इन सारी वस्तुओं को इन्हें प्रदान करता हूँ, ये सारी वस्तुएँ आपके अक्षय बनी रहें । उसके बाद सारी प्रजा तथा सभी लङ्कावासी ॥८७॥ कौतूहल वशात् श्रीरामचन्द्रजी का दर्शन करने के लिए आये और विभीषण से कहे हे प्रभो ! हमे रामजी का दर्शन कराइये ।॥८८।। विभीषण के कहने से श्रीरामचन्द्रजी के लिए लाये गये उपहार को श्रीरामजी के द्वारा प्रेरित होकर भतरजी ने ॥८९॥ तथा सुग्रीव ने धन तथा रत्न समूह को स्वीकार किया। इस तरह श्रीरामचन्द्रजी रावण के घर में तीन दिन तक निवास किए ॥९०॥ चौथे दिन जब श्रीरामचन्द्रजी भी सभा में बैठे थे, उस समय कैकसी ने आपने पुत्र विभीषण से कहा-- हे पुत्र ! में श्रीराम का दर्शन करूंगी ॥९ १॥ उनका दर्शन करके श्रेष्ठ मुनिजन महान् पुण्य को प्राप्त करते हैं ये सनातन चतुर्मूति विष्णु हैं ॥९२॥ सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं । इस बात को तुम्हारा बड़ा भाई नहीं जान सका । जब स्वर्गलोक में देव सभा हुयी उस समय तुम्हारे पिता ने

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