Srishti Khanda Extracted Page 514

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-514

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Sanskrit Original

सृष्टिखण्ड ह८ पर प्रथमे दिवसे बद्धो योजनानि चतुर्दश । द्वितीयेहनि षट्त्रिंशत्तृनीयेऽर्धशतंतथा ॥६४॥ इयं सा दृश्यते लंका स्वर्णप्राकारतोरणा। अवरोधो महानत्र » कृतोवानरसत्तमैः ॥६५॥ चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां महद्युद्धमभूदिह। अष्टचत्वारिंशद्दिनं यत्रासौ रावणो हतः ॥६६॥ अत्र॒ प्रहस्तो नीलेन हतो राक्षसपुंगवः । हनूमता च धुम्राक्षो ह्यत्रैव विनिपातितः ॥६७॥ महोदरातिकायौ च सुग्रीवेण महात्मना । अत्रैव मे कुंभकर्णो लक्ष्मणेनेंद्रजित्तथा ॥६८॥ मया चात्र दशग्रीवो हतो राक्षसपुंगवः। अत्र संभाषितुं प्राप्तो ब्रह्मा लोकपितामहः॥६९॥ पार्वत्या सहितो देवः शूलपाणिर्वृषध्वजः । महेद्राद्याः सुरगणाः सगंधर्वास्सकिंनराः ॥७०॥ पिता मे च समायातो महाराजस्त्रिविष्टपात् । वृतश्चाप्सरसां संधै विद्याधरगणैस्तथा ॥७९॥ तेषां समक्षं सर्वेषां जानकी शुद्धिमिच्छता । उक्ता सीता हव्यवाहं प्रविष्टा शुद्धिमागता॥७२॥ लंकाधिपैः सुरै दृष्टा गृहीता पितृशासनात् । अथाप्युक्तो राज्ञाहमयोध्यां गच्छ पुत्रक ॥७३॥ नमे स्वर्गो बहुमतस्त्वया हीनस्य राघव । तारितोहं त्वया पुत्र प्राप्तोऽ स्मीन्द्रसलोकताम् ॥७४॥ लक्ष्मणं चाब्रवीद्राजा पुत्र पुण्यं त्वयार्जितम् । भ्रात्रा सममथोदिव्यांल्लोकाग्ग्राप्स्यसि चोत्तमान् ॥७५॥ आहूय जानकी राजा वाक्यं चेदमुवाच ह। न च मन्युस्त्वया कार्यो भर्तारं प्रति सुब्रते॥७६॥ ख्यातिर्भविष्यत्येवाग्र्या भर्तुस्ते शुभलोचने । एवं वदति रामे तु पुष्पके च व्यवस्थिते ॥७७॥ तत्र ये राक्षसवरास्तेगत्वाऽशु विभीषणम् । प्राप्तो रामः समसुग्रीवश्चारा इत्थं तदाऽवदन् ॥७८॥ महासागर को सेतु के माध्यम से पार करके लङ्का जायँ ॥६२॥ वरुणालय समुद्रपर मैंने इस सेतु को बाँधा इसको रेष्ठ वानरों ने तीन दिनों में पूरा कर दिया ॥६३॥ पहले दिन चौदह योजन बंधा, दूसरे दिन छत्तीस योजन और तीसरे दिन पचास योजन सेतु बँधा ।।६४।। वही लङ्का दिखायी देती है जिसकी चहार दिवारी इत्यादि सोने की हे । इसको श्रेष्ठ वानरों ने सुदृढ तरीके से घेर लिया ॥६५॥ यहाँ पर चैत्र शुक्ल चतुर्दशी के दिन घोर युद्ध हुआ । इस युद्ध में अड़तालिस दिनों में रावण मारा गया ॥६६॥ यहाँ पर राक्षस श्रेष्ठ प्रहस्त नील के द्वारा मारा गया; यहीं पर हनुमान ने धृम्राक्ष को मार कर गिरा दिया ॥६७॥ महोदर तथा अतिकाय को सुग्रीव ने मारा । यहाँ पर मैने कुम्भकर्ण को तथा लक्ष्मण ने इन्द्रजित को मारा ॥६८॥ यहाँ पर राक्षसश्रेष्ठ रावण को मैंने मारा । यहाँ पर बातें करने के लिए लोकपितामह ब्रह्माजी आये थे । तथा पार्वती के साथ वृषभध्वज भगवान् शङ्करभी आये थे । गन्धर्वो एवं किन्नरों के साथ महेन्द्र आदि देवता भी आये थे ॥६९-७०॥ मेरे पिता महाराज दशरथ भी स्वर्गलोक से आये थे । उनको अप्सराओं तथा विद्याधरों के समूह घेरे हुए थे ॥७१॥ उन सबों के सामने ही जानकी की शुद्धि चाहने वाले मैंने सीता को अग्नि में शुद्धि के लिए प्रवेश कराया और वह शुद्ध निकली ॥७२॥ लङ्का के स्वामी देवताओं ने इस बात को देखा और अपने पिताश्री के आदेश से मैंने उसे (सीता को) स्वीकार किया । उसके बाद महाराज ने कहा-- पुत्र अब अयोध्या जाओ ।७३॥ हे राघव ! तुम्हारे बिना मुझको स्वर्ग प्रिय नहीं है । हे पुत्र ! तुमने मुझे तार दिया और मैं इन्द्र लोक में गया हूँ ॥७४॥ लक्ष्मण को महाराज ने कहा-- हे पुत्र तुमने पुण्य कमाया है । अतएव तुम अपने भाई के साथ दिव्य लोकों को प्राप्त करोगें ॥॥७५॥ जानकी को बुलाकर महाराज ने कहा हे सुव्रते ! तुम्हें अपने पति के प्रति क्रोध नहीं करना चाहिए ॥७६॥ हे सुन्दर नेत्रों वाली ! इससे तुम्हारे पति का शुभ्र यश फैलेगा । जब श्रीरामजी पुष्पक पर बैठकर इस तरह से बातें कर रहे थे ॥७७॥ उसी समय वहाँ जो श्रेष्ठ राक्षस थे वे शीघ्र जाकर विभीषण को बतलाये कि श्रीरामचन्द्रजी आये हैं ओर उनके साथ सुग्रीव भी हें ॥७८॥ विभीषण ने जब यह सुना कि 5s

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