Srishti Khanda Extracted Page 513

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-513

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Sanskrit Original

क्रौञ्चयुग्मं मिथो यद्दच्चक्रवाकयुगं यथा । एवं वदंतीं तां तारां तराधिपसमाननाम् ॥४९॥ प्राह प्रवचसां श्रेष्ठो रामो राजीवलोचनः। चारू दंष्ट्रे विशालाक्षि कालो हि दुरतिक्रमः ॥५०॥ सर्व कालकृतं विद्धि जगदेतच्चराचरम् । विसृज्य ताः स्त्रियः सर्वाः सुग्रीवोभिमुख: स्थितः॥५ १॥ सुग्रीव उवाच भवंतौ येन कार्येण इहायातौ नरेश्वरौ । तच्चापि कथ्यतां शीघ्रं कृत्यकालो हि वर्तते ॥५२॥ ब्रुवाणमेवं सुग्रीवं भरतो रामचोदितः। आचचक्षे च गमनं लंकायां राघवस्य तु ॥ तौ चाब्रवीच्च सुग्रीवो भवद्भयां सहितः पुरीम् ॥५३॥ गमिष्ये राक्षसं देव द्रष्टुं तत्र विभीषणम् । सुग्रीवेणैव मुक्ते तु गच्छस्वेत्याह राघवः ॥५४॥ सुग्रीवो राघवौ तौ च पुष्पके तु स्थितास्त्रयः। तावत्प्राप्तं विमानं तु समुद्रस्योत्तरं तटम् ॥५५॥ अब्रवीद्धरतं रामो छात्र मे राक्षसेश्वरः । चतुर्भिः सचिवैः सार्ध जीवितार्थे विभीषणः ॥५६॥ प्राप्तस्ततो लक्ष्मणेन लंकाराज्येभिषेचितः । अत्र चाहं समुद्रस्य परे पारेस्थितस्र्यहम् ॥५७॥ दर्शनं दास्यते मेऽसौ ज्ञातिकार्यं भविष्यति । तावन्नदर्शनं मह्यं दत्तमेतेन शत्रुहन् ॥५८॥ ततः कोपः समुद्ूतश्चतुर्थेऽहनि राघव । धनुरायम्य वेगेन दिव्यमस्त्रकरे धृतम् ॥५९॥ दृष्ट्वा मां शरणान्वेषी भीतो लक्ष्मणमाश्रितः । सुग्रीवेणानुनीतोऽस्मि क्षम्यतां राघव त्वया ॥६०॥ ततो मयो क्षिप्तशरो मरुदेशेह्यपाकृतः । ततस्समुद्रराजेन भृश विनयशालिना ॥६ १॥ उक्तोऽहं सेतुंबंधेन लंकां त्वं ब्रज राघव । लंघयित्वा नरव्याघ्रवारिपूर्ण महोदधिम् ॥६२॥ एष सेतुर्मया बद्धः समुद्रे वरुणालये । त्रिभिर्दिनैः समाप्तिं वै नीतो वानरसत्तमैः ॥६३॥ क्रौंच पक्षी के जोड़े तथा चक्रवाक युगल के समान आप दोनों हैं । चन्द्रमा के समान मुखवाली तारा के इस तरह कहने पर उसको ॥४९॥ वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा-- हे चारुदंष्टे ! हे बड़े-बड़े नेत्रों वाली, काल का कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता है ॥५०॥ तुम यह जानो कि यह सारा चराचरात्मक जगत् काल के अधीन हैं। उसके बाद उन सभी स्त्रियों को छोड़कर श्रीराम सुग्रीव के सामने मुख कर लिए ॥५१॥ सुग्रीव ने कहा-- हे नरेश्वर! आप दोनों जिस कार्य से यहाँ पधारे हैं, उसे शीघ्र बतलायें, अभी तो काम करने का समय हैं ॥५२॥ सुग्रीव के इस तरह कहने पर श्रीरामजी से प्रेरित होकर भरतजी ने कहा-- श्रीरामजी को लङ्का जाना है । उन दोनों से सुग्रवी ने कहा-- आप दोनों के साथ मैं भी राक्षसों की नगरी में ॥५३॥ राक्षसराज विभीषण को देखने के लिए चलूँगा ।सुग्रीव के इस तरह से कहने पर श्रीरामचन्द्रजी ने कहा चलो ॥५४॥ सुग्रीव तथा श्रीरामजी तथा भरतजी तीनों पुष्पक विमान में बैठ गये । उसके बाद समुद्र के उत्तरी तट पर विमान पहुँच गया ॥५५॥ श्रीरामचन्द्रजी ने भरतजी से कहा कि यहाँ पर राक्षसेश्वर विभीषण अपने चार मन्त्रियों के साथ अपनी जीवन रक्षा के लिए मुझे मिले थे॥॥५६॥ उसके बाद लक्ष्मण ने उनको लङ्का के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया । यहाँ पर हमलोग समुद्र के तट पर तीन दिन तक रहे ॥५७॥ इस आशा से पड़े रहे कि समुद्र दर्शन देगा और हमारा कार्य करेगा, हे शत्रुहन् ! किन्तु तब तक समुद्र ने दर्शन नही दिया ॥५८॥ उसके बाद हे राघव ! चौथे दिन मुझे क्रोध उत्पन्न हो गया । अपने धनुष को झुकाकार मैंने दिव्या्र को धारण किया ॥५९॥ मुझको देखकर भयभीत समुद्र लक्ष्मण के शरण में गया । सुग्रीव ने प्रार्थना करते हुए कहा हे राघव ! आप इसे क्षमा कर दें ॥६०॥ उसके बाद मैंने अस्त्र को उतार कर उसे मरुस्थल प्रदेश में फेंक दिया उसके बाद अत्यन्त विनीत समुद्रराज ने ॥६१॥ कहा हे राघव ! आप जल से भरे हुए

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