Srishti Khanda Extracted Page 512
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-512
Sanskrit Original
आज्ञाकारिणि भृत्ये च मयि प्राप्स्यसि मैथिलीम्। अत्र मे वार्षिका मासा गता वर्षशतोपमाः ॥३३॥ अत्रैव निहतो वाली सुग्रीवार्थे परंतप । एषा सा दृश्यते नूनं किष्किंधा वालि पालिता॥३४॥ यस्यां वै स हि धर्मात्मा सुग्रीवो वानरेश्वरः । वानरैः सहितो वीर तावदास्ते समाः शतम् ॥३५॥ वानरैस्सह सुग्रीवो यावदास्ते सभां गतः । तावत्तत्रागतौ वीरौ पुर्या भरतराघवौ ॥३६॥ दृष्ट्वा सभ्रातरौ प्राप्तौ प्रणिपत्याब्रवीदिदम् । क्व युवां प्रस्थितौ वीरौ कार्य किं तु करिष्यथः॥३७॥ विनिवेश्यासने तौ च ददावर्ध्यं स्वयं तदा । एवं सभास्थिते तत्र धर्मिष्ठे रघुनंदने॥३८॥ अंगदोथहनूमांश्च नलो नीलश्च पाटलः । गजो गवाक्षो गवयः पनसश्च महायशाः ॥३९॥ पुरोधसो मत्रिणश्च दैवज्ञो दधिवक्त्रकः | नीलश्शतबलिमैन्दो द्विविदो गंधमादनः ॥४०॥ वीरबाहुस्सुबाहुश्च वीरसेनो विनायकः। सूर्याभः कुमुदश्चैव सुषेणो हरियूथपः ॥४९॥ ऋषभो विनतश्चैव गवाख्यो भीमविक्रमः । ऋक्षराजश्च धूम्रश्न सहसैन्यैरुपागताः॥४२॥ अंतः पुराणि सर्वाणि रुमां तारा तथैव च । अवरोधोंगदस्यापि तथान्याः परिचारिकाः ॥४३॥ प्रहर्षमतुलं प्राप्य साधुसाध्विति चाब्रुवन्। वानराश्च महात्मानः सुग्रीवसहितास्तदा ॥४४॥ वानर्यश्च महाभागास्ताराद्यास्तत्र राघवम् । अभिप्रक्ष्याश्रुकं ठ्यश्च प्रणिपत्येदमब्रुवन् ॥४५॥ क्व सा देवी त्वया देव या विनिर्जित्य रावणम् । शुद्धिं कृत्वा हि ते वह्वौ पितुरग्र उमापपतेः ॥४६॥ त्वया नीतां पुरीं राम न तां पश्यामि तेग्रतः । न विना त्वं तया देव शोभसे रघुनंदन ॥४७॥ त्वया विनापि साध्वी सा क्वनु तिष्ठति जानकी । अन्यां भार्या न ते वेद्मि भार्याहीनो न शोभसे ॥४८॥ वही कमलिनी है, जहाँ पर लक्ष्मणजी ने मुझसे कहा, हे शत्रुओं का विनाश करने वाले पुरुष श्रेष्ठ शोक न करें। ३ २॥ में आपका आज्ञाकारी भृत्य हूँ । मेरे रहते आप सीताजी को अवश्य प्राप्त करेंगे । यहाँ पर मैंने वर्ष के चार महीनों को बड़े कष्ट से बिताया ॥३३॥ हे परन्तप सुग्रीव का कल्याण करने के लिए मैंने बालि का वध किया। यह बालि की राजधानी किष्किन्धा दिखायी दे रही है ॥३४॥ यहीं पर वानरों के राजा सुग्रीव सैकड़ों वर्ष से वानरों के साथ रहते हैं ॥३५॥ जिस समय वानरों के साथ सुग्रीव सभा में विद्यमान थे उसी समय भरतजी के साथ श्रीरामजी वहाँ पहुँच गये ।॥।३६॥ श्रीराम और भरतजी दोनों को देखकर सुग्रीव ने साष्टाङ्ग प्रणाम किया और पूछा आप दोनों कहाँ से आ रहे हैं । आप दोनों कौन सा कार्य करने वाले हैं ?।।३७॥। उन दोनों को आसन पर बैठाकर सुग्रीव ने स्वयं उन्हें अर्ध्य प्रदान किया । इस तरह सभा में धार्मिक श्रीराम के स्थित रहने पर ॥३८॥ अङ्गद, हनूमान, नल, नील, पाटल, गज, गवाक्ष, गवय, महायशस्वी पनस ॥३९॥ पुरोहित, मन्त्रीगण, दैवज्ञ, दधिवक्त्र, नील, शतबलि, मैन्द, द्विविद, गन्धमादन ।॥४०।। बीरबाहु, सुबाहु, वीरसेन, विनायक, सूर्याभ, कुमुद तथा सेनापति सुषेण ॥४१॥ ऋषभ, विनत, भीम विक्रम गवाक्ष, ऋक्षराज, धूम्र ये सभी सेना के साथ आये ॥४२॥ अन्तःपुर की सभी नारियाँ, रुमा, तारा, अङ्गद के भी अन्तःपुर की खियाँ तथा अन्य परिचारिकायें ॥४३॥ अत्यधिक हर्षित होकर सबों ने साधु- साधु कहा । सुग्रीव इत्यादि बड़े-बड़े वानर ॥४४॥ सभी तारा आदि वानरियों ने श्रीरामचन्द्रजी को देखकर रुँधे गले से प्रणाम करके पूछा ॥४५॥ वे देवी कहाँ हैं, जिनको आपने रावण को परास्त करके, तथा महाराज दशरथजी तथा शङ्करजी के समक्ष अग्नि में पवित्र करके ॥४६॥ अपनी नगरी में लाये हमलोग उन देवी को नहीं देख रहे हैं। हे रघुनंदन ! आप उनके बिना सुशोभित नहीं हो रहे हैं ॥४७।। आपके बिना वे साध्वी देवी जानकी कहाँ पर विद्यमान हैं? में जानती हूँ कि आपकी कोई दूसरी पत्नी नहीं हो सकती और आप पत्नी के बिना सुशोभित नहीं हो रहे हैं ॥४८॥
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know