Srishti Khanda Extracted Page 511

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-511

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Sanskrit Original

वर्तते यद्धितार्थ वै दशग्रीवो निपातितः । गमिष्ये तदहं लंकां यत्र चासौ विभीषणः ॥ ९८॥ तं च दृष्टवा पुरी तां तु कार्यमुक्त्वा च राक्षसम् । आलोक्य सर्ववसुधां सुग्रीवं वानरेश्वरम् ॥१९॥ महाराजं च शत्रुघ्नं भातुपुत्रांश्च सर्वशः । एवं वदति काकुत्स्थे भरतः पुरतः स्थितः॥२०॥ उवाच राघवं वाक्यं गमिष्ये भवता सह । एवं कुरु महाबाहो सौमित्रिरिह तिष्ठतु ॥२९॥ इत्युक्तवा भरतं राम सौमित्रिं चाह वै पुरे । रक्षा कार्या त्वया वीर यावदागमनं हि नौ ॥२२॥ एवं लक्ष्मणमादिश्य ध्यात्वा वै पुष्पकं नृप । अरुरोह स वै यानं कौसल्यानंदवर्धनः ॥२३॥ पुष्पकं तु ततः प्राप्तं गांधारविषयं यतः। भरतस्य सुतौ दृष्ट्वा जगन्नीतिं निरीक्ष्य च ॥२४॥ पूर्वा दिशं ततो गत्वा लक्ष्मणस्य सुतौ यतः । पुरेषु तेषु षड़ात्रमुषित्वा रघुनंदनौ ॥२५॥ गतौ तेन विमानेन दक्षिणामभितो दिशम्। गङ्गायामुनसं भेदं प्रयागमृषिसेवितम् ॥२६॥ अभिवाद्य भरद्वाजमत्रेराश्रममीयतुः । संभाष्य च मुनीस्तत्र जनस्थानमुपागतौ ॥२७॥ राम उवाच अत्र पूर्व हृता सीता रावणेन दुरात्मना । हत्वा जटायुषं गृध्रं योऽसौ पितृसखोहि नौ॥२८॥ अत्रास्माकं महद्युद्धं कबन्धेन कुबुद्द्रना। हतेन तेन दग्धेन सीतास्ते रावणालये ॥२९॥ ऋष्यमूके गिरिवरे सुग्रीवो नाम वानरः । स ते करिष्यते साह्यं पंपां व्रज सहानुजः ॥३०॥ पंपासरः समासाद्य शबरीं गच्छ तापसीम् । इत्युक्तो दुःखितो वीर निराशोजीविते स्थितः ॥३९॥ इयं सा नलिनी वीर यस्यां वै लक्ष्मणो वदत् । मा कृथाः पुरुषव्याघ्र शोकं शत्रुविनाशन ॥३२॥ देवताओं के साथ विभीषण का व्यवहार कैसा है 2॥१७॥ देवताओं के लिए मैंने रावण को मारा, अतएव मैं लङ्का विभीषण को देखने के लिए जाऊँगा ॥१८॥ उस लङ्कापुरी को देखकर तथा विभीषण को कर्तव्य का उपदेश करके, सम्पूर्ण पृथिवी का अवलोकन करके पुनः वानरराज महराज सुग्रीव से मिलकर शत्रुघ्न तथा उनके पुत्रों से मिलूँगा । जिस समय श्रीरामचन्द्रजी यह कह रहे थे उसी समय उनके सामने खड़ा होकर भरतजी ने कहा ॥१९-२०॥। में भी आपके साथ चलूँगा । हे महाराज आप ऐसा ही कीजिये, तब तक लक्ष्मण यहाँ रहें ॥२१॥ इस तरह से भरतजी को स्वीकृति देकर श्रीरामचन्द्रजी ने लक्ष्मणजी से कहा कि जब तक हम दोनों लौट न आएँ तब तक तुम्हें रक्षा का कार्य करना है ॥२२॥ इस तरह से लक्ष्मणजी को आदेश देकर भगवान् ने पुष्पक विमान का स्मरण किया और वे उस पर चढ गये ॥२३॥ वहाँ से पुष्पक विमान गधार राज्य में पहुँचा । वहाँ पर श्रीभगवान् भरतजी के दोनों पुत्रों से मिले और उनकी जगत् नीति का निरीक्षण किये ॥२४॥ वहाँ से पूर्व दिशा में गये जहाँ लक्ष्मणजी के दोनों पुत्र थे । वहाँ पर श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी छह रात्रियों तक निवास किए ॥२५॥ वहाँ से वे विमान द्वारा अपनी अभिमत दक्षिण दिशा में चले । वे गङ्गा और यमुना के संगम स्थल प्रयाग में गये ॥२६॥ वहाँ भरद्वाज ऋषि का दर्शन करके वे दोनों अत्रि महर्षि के आश्रम में आये । वहाँ पर मुनियों से वार्तालाप करके वे दण्डकारण्य में आये ॥२७॥ श्रीराम ने कहा-- यहाँ पर हमारे पिताजी के मित्र जटायु गृध्र का वध करके रावण ने सीताजी का अपहरण किया था॥२८॥ यहाँ पर हमारा युद्ध दुष्ट कबन्ध से हुआ था । उसको मारकर मैंने जला दिया तो उसने बतलाया कि आपकी सीता रावण के गृह में हैं ॥२९॥ ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव नामक वानर रहते हैं, वे आपकी सहायता करेंगे । अतएव आप अपने अनुज के साथ पम्पासरोवर पर जायँ ॥३०॥ पम्पासरोवर पर जाकर शबरी नाम की तपस्विनी से मिलें । हे वीर ! इस तरह से उसके द्वारा कहे जाने पर दु:खी तथा जीवन से निराश में पम्पासरोवर पर गया ॥ ३१॥ यह

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