Srishti Khanda Extracted Page 510
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-510
Sanskrit Original
प्रशास्ति पृथिवीं सर्वा थर्मेण सुसमाहितः । तस्मिन् शासति वै राज्यं सर्वकामफलाद्रुमाः ॥४॥ रसवंतः प्रभूताश्च वासांसि विविधानि च। अकृष्टपच्या पृथिवी निःसपत्ना महात्मनः ॥५॥ देवकार्य कृतं तेन रावणो लोककंटकः । सपुत्रोऽमात्यसहितो लीलयैव निपातितः ॥६॥ तस्य बुद्धिस्समुत्पन्ना पूर्णे धर्मे द्विजोत्तम | तस्याहं चरितं सर्वं श्रोतुमिच्छामि वै मुने ॥७॥ पुलस्त्य उवाच कस्यचित्त्वथ कालस्य रामो धर्मपथे स्थितः । यच्चकारमहाबाहो शृणुष्वैकमना तृप॥८॥ सस्मार राक्षसेंद्रं तं कथं राजा बिभीषणः। लंकायां संस्थितो राज्यं करिष्यति च राक्षसः ॥९॥ गीर्वाणेषु प्रातिकूल्यं विनाशस्य तु लक्षणम् । मया तस्य तु तद्दत्तं राज्यं चंद्रार्ककालिकम् ॥१०॥ तस्याविनाशतः कीर्तिः स्थिरा मे शाश्वती भवेत् । रावणेन तपस्तप्तं विनाशायात्मनस्त्विह ॥११॥ विध्वस्तः स च पापिष्ठो देवकार्ये मयाधुना । तदिदानीं मयान्वेष्यः स्वयं गत्वा विभीषणः ॥१२॥ संदेष्टव्यं हितं तस्य येन तिष्ठेत्स शाश्वतम् । एवं चिंतयतस्तस्य रामस्यामिततेजसः ॥१३॥ आजगामाथ भरतो रामं दृष्ट्वा ब्रवीदिदम् । किं त्वं चिंतयसे देव न रहस्यं वदस्व मे ॥१४॥ देवकार्ये धरायां वा स्वकार्ये वा नरोत्तम । एवं ब्रुवंतं भरतं ध्यायमानमवस्थितम् ॥१५॥ अब्रवीद्राघवो वाक्यं रहस्यं तु न वै तव। भवान् वहिश्चरः प्राणो लक्ष्मणश्च महायशाः ॥१६॥ अवेद्यं भवतो नास्ति मम सत्यं विधारय । एषा मे महती चिंता कथं देवैर्विभीषणः॥९७॥ को अनुरागपूर्वक श्रीराम को देखते हैं । श्रीराम धर्म के ज्ञाता, कृतज्ञ तथा परिपक्व बुद्धि वाले हैं ॥३॥ वे सावधानीपूर्वक पृथिवी का प्रशासन करते हैं । उनके प्रशासन काल में वृक्ष सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले थे॥४। वे रस से युक्त अनेक प्रकार के वस्रों को प्रदान करने वाले थे । उनकी पृथिवी बिना जोते ही अन्न पैदा करने वाली तथा शत्रुओं से रहित थी ॥५॥ उन्होंने देवताओं का कार्य किया और संसार को कष्ट देने वाले रावण के पुत्रों तथा आमात्यों के साथ बिना किसी प्रयास के ही मार दिया ॥६॥ हे द्विजोत्तम ! उन श्रीरामचन्द्रजी को पूर्णधर्म करने की इच्छा हुयी । हे मुने ! मैं उन श्रीरामचन्द्रजी का सम्पूर्ण चरित्र सुनना चाहता हूँ ॥७॥ श्रीपुलस्त्य महर्षि ने कहा-- एक समय धर्ममार्गानुयायी मनुष्य रूपधारी भगवान् श्रीराम ने जो कुछ किया उसे आप सुनें । उन्हें याद आयी कि राजश्रेष्ठ विभीषण कैसे हैं ? वे राक्षसराज लङ्का में राज्य कर रहे हैं ॥८-९॥ देवताओं की प्रतिकूलता विनाश का लक्षण है । मैंने विभीषण को ऐसा राज्य प्रदान किया है, जो तब तक रहे जब तक सूर्य और चन्द्रमा रहें।। १०॥ उसका विनाश नहीं होने से मेरी शाश्वत कीर्ति होगी । रावण ने तो अपने विनाश के लिए तपस्या की थी॥ १ १५॥ इसीलिए देवताओं का कार्य करने वाले मैंने उसका विनाश कर दिया । अतएव मुझको स्वयं जाकर विभीषण का पता लगाना चाहिए ॥१२॥ उसको इस प्रकार का उपदेश देना चाहिए जिससे कि वह सदा बना रहे जिस समय निस्सीम तेजस्वी श्रीराम इस प्रकार से सोच रहे थे ॥१३॥ उसी समय वहाँ भरतजी आ गये और श्रीरामचन्द्रजी को देखकर उन्होनें कहा-- हे देव ! आप क्या सोच रहे है ? यदि कोई रहस्यमयी बात न हो तो उसे आप मुझे बतलायें ॥१४॥ आप किसी देवता के कार्य के विषय में सोच रहे हैं अथवा पृथिवी पर किए जाने वाले अपने कार्य के विषय में सोच रहे हैं ? इस तरह से भरतजी के कहने पर ॥१५॥ भगवान् श्रीराम ने कहा-- कोई भी रहस्य की बात नहीं है । तुम और लक्ष्मण दोनों हमारे बाहर चलने फिरने वाले प्राण हो ॥१६॥ तुम यह सत्य जानो कि मेरी कोई भी ऐसा बात नहीं है जो तुम्हारे लिए नहीं जानने योग्य हो । मुझको यह चिन्ता हो रही है कि
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