Srishti Khanda Extracted Page 509
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-509
Sanskrit Original
आडीबकं महद्युद्धं सर्वलोकविनाशनम् । पृथिव्यां यानि सत्वानि तिर्यग्योनिगतानि वै॥१६६॥ दिव्यानां पार्थिवानां च राजसूयेक्षयः श्रुतः । स त्वं पुरुषशार्दूल बुद्धया संचित्य पार्थिव॥१६७॥ प्राणिनां च हितं सौम्यं पूर्णधर्म॑ समाचर। भरतस्य वचः श्रुत्वा राघवः प्राह सादरम् ॥१६८॥ प्रीतोस्मि तव धर्मज्ञ वाक्येनानेन शत्रुहन् । निवर्तिताराजसूयान्मतिमे धर्मवत्सल ॥१६९॥ पूर्ण धर्म करिष्यामि कान्यकुब्जे च वामनम् । स्थापयिष्याम्यहं वीर सा मेख्यातिर्दिवं गता ॥१७०॥ भविष्यति न संदेहो यथा गङ्गा भगीरथात् ॥१७१॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे यज्ञनिवारणं नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७॥ —— ie अड़तीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच कथं रामेण विप्रर्षे कान्यकुब्जे तु वामनः। स्थापितः क्व च लब्धोसौ विस्तरान्मम कीर्तय ॥१॥ तथाहि मधुरा चैषा या वाणी रामकीर्तने । कीर्तिता भगवन्महां हतकर्णसुखावहा ॥२॥ अनुरागेण तं लोकाः स्नेहात्पश्यंति राघवम् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च बुद्धया च परिनिष्ठितः ॥३॥ राजसूय यज्ञ के अन्त में ॥१६५॥ संसार को विनष्ट कर देने वाला आडी और वक का महान् युद्ध हुआ । पृथिवी पर जितने भी तिर्यग्योनि के जीव हें ॥१६६॥ दिव्य राजाओं के राजसूय के अन्त में विनाश सुना जाता है । अतएव हे पुरुष शार्दूल राजन् ! आप बुद्धिपूर्वक विचार करें ॥१६७॥ प्राणियों का कल्याण करने वाले सौम्य धर्म का अनुष्ठान करें । भरतजी की वाणी सुनकर श्रीरामजी ने आदर पूर्वक कहा ॥१६८॥ हे शत्रुओं का विनाश करने वाले! में तुम्हारी बात से बहुत प्रसन्न हूँ । हे धर्मवत्सल अब मेरी बुद्धि राजासूय से दूर हो गयी है ॥१६९॥ में कान्यकुब्ज में वामन की स्थापना करके पुर्ण धर्म करूंगा । उससे मेरी ख्याति स्वर्गलोक तक उसीतरह व्याप्त होगी जिस तरह भगीरथ से गङ्गा लोक विख्यात हैं ॥१७०-१७१॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथमसृष्टि खण्ड के यज्ञनिवारण नामक सैंतीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ३७।। — ae विभीषण का वृत्तान्त जानने के लिए श्रीरामचन्द्रजी का भरतजी के साथ दक्षिणापथ में प्रस्थान, श्रीरामजी का वनवास काल में अपने निवास स्थानों को भरतजी को दिखाना, किष्किन्था में सुग्रीव आदि से भेट, वहाँ से सुग्रीव को लेकर लङ्का जाना, विभीषण से भेंट, केकसी राम संवाद, विभीषण का श्रीराम को वामन की मूर्ति समर्पित करना, सेतुभङ्ग, श्रीरामकृत रामेश्वर स्तुति, पुष्कर में श्रीराम द्वारा ब्रह्माजी की स्तुति, ब्रह्मा और राम का संवाद, श्रीराम का मथुरा गमन, वामन भगवान् की प्रतिष्ठा भीष्मजी ने कहा-- हे विपर्षे ! श्रीरामचन्द्रजी ने कान्यकुब्ज में यामन भगवान् की प्रतिष्ठा कैसे की, उन्हे वामन की मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुयी ? इन सारी बातों को विस्तार से बतलायें ॥१॥। वही वाणी मधुर है जो श्रीरामजी के वर्णन से सबद्ध है । हे भगवन् ! आपने कानों को सुख देने वाली रामकथा को मुझे सुनाया है ॥२॥ संसारी जीव
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