Srishti Khanda Extracted Page 508
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-508
Sanskrit Original
गत्वा कुमारावाहूय राघवायन्यवेदयन् । द्वास्थैः कुमारावानीतौ राघवस्य निदेशतः॥१५९॥ दृष्ट्वा तु राघव: प्राप्तौ प्रियौ भरतलक्ष्मणौ। समालिंग्य तु रामस्तौ वाक्यं चेदमुवाच ह ॥१५२॥ कृतं मया यथातथ्यं द्विजकार्यमनुत्तमम् । धर्महेतुमतो भूयः कर्तुमिच्छामि राघवौ ॥१५३॥ भवद्धयामात्मभूताभ्यां राजसूयं क्रतृत्तमं । सहितो यष्टुमिच्छामि यत्र धर्मश्च शाश्चतः॥९५४॥ पुष्करस्थेन वै पूर्व॑ ब्रह्मण लोककारिणा । शतत्रयेण यज्ञानामिष्टं षष्ट्याधिकेन च ॥१५५॥ इष्ट्वाहं राजसूयेन सोमो धर्मेणधर्मवित् । प्राप्तः सर्वेषु लोकेषु कीर्तिस्थानमनुत्तमम् ॥९५६॥ इष्ट्वा हि राजसूयेन मित्रः शत्रुनिबर्हणः । मुहूर्तेन सुशुद्धेन वरुणत्वमुपागतः ॥१५७॥ तस्माद्भवंतौ संचित्य कार्येस्मिन् वदतं हि तत्। भरत उवाच त्वं धर्मः परमः साधो त्वमसि सर्वा वसुंधरा ॥१५८॥ प्रतिष्ठिता महाबाहो यशश्चामितविक्रम । महीपालाश्च सर्वे त्वां प्रजापतिमिवामराः ॥१५९॥ निरीक्षंते महात्मानो लोकनाथ तथा वयम्। प्रजाश्च पितृवद्राजन्पश्यंति त्वां महामते ॥१६०॥ पृथिव्यां गतिभूतोऽसि प्राणिनामिह राघव । सत्वमेवं विधं यज्ञं नाहरत्तासि परंतप॥१६९॥ पृथिव्यां सर्वभूतानां विनाशो दृश्यते यतः। श्रूयते राजशार्दूल सोमस्य मनुजेश्वर ॥१६२॥ ज्योतिषां सुमहद्युद्धं संग्रामे तारकामये। ताराबृहस्पते भार्याहता सोमेन कामतः ॥१६३॥ तत्र युद्धं महदवृत्तं देव दानवनाशनम्। वरुणस्य क्रतौ घोरे संग्रामे मत्स्यकच्छपाः ॥९६४॥ निवृत्ते राजशार्दूल सर्वे नष्टा जलेचराः । हरिश्रंद्रस्य यज्ञांते राजसूयस्य राघव ॥१६५॥ श्रीरामचन्द्रजी की बातों को सुनकर द्वारपाल ॥१५०॥ जाकर श्रीलक्ष्मण और भरतजी को बतलाये और श्रीरामजी की आज्ञानुसार द्वारपाल उन दोनों को लाये ॥१५१॥ श्रीरामचन्द्रजी ने देखा कि प्रिय भरत और लक्ष्मण आ गये हैं उन्होंने उन दोनों का आलिङ्गन किया और कहा ॥१५२॥ मैंने ब्राह्मण का सर्वोत्तम कार्य कर दिया है । वह कार्य धार्मिक था; पुनः ऐसे कार्यो को करना चाहता हूँ ॥१५३।। आप दोनों मेरे प्राणों के समान हैं । आपलोगों के साथ ऐसे यज्ञ को करना चाहता हूँ जो शाश्वत धर्मस्वरूप होता है ॥१५४॥ पुष्कर क्षेत्र में लोक सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी ने तीन सौ साठ यज्ञों को किया था ॥१५५॥ चन्द्रमा ने धर्मपूर्वक राजसूय यज्ञ करके सभी लोकों में व्यापक यश को प्राप्त किया ॥ १५६॥ शत्रुओं को विनष्ट करने वाले सूर्य ने शुद्ध मुहूर्त में राजसूय यज्ञ करके वरुणत्व को प्राप्त कर लिया ॥१५७॥ अतएव आप दोनों अच्छी तरह से विचार करके इस विषय में अपना कल्याणकारी विचार प्रकट करें भरतजी ने कहा-- हे साधो ! आप परम धर्म हैं, यह पृथिवी आपके ऊपर टिकी है ॥१५८॥ हे अमित विक्रम महाबाहो सभी राजा और देवता आपको प्रजापति के समान ॥१५९॥ मानते हैं हे लोकनाथ ! हमलोग भी आपको वैसा ही मानते हैं । हे महामते राजन् ! सारी प्रजा आपको अपने पिता के समान मानती है ॥१६०॥ हे राघव! आप सभी प्राणियों के आश्रय हैं । इस प्रकार के आप ऐसा यज्ञ न करें ॥१६१॥ क्योंकि देखा जाता है कि राजसूय यज्ञ से पृथिवी के सभी जीवों का विनाश होता है । हे मनुजेश्वर ! यह सुना जाता है कि सोम ने ॥१६२॥ तारकमय' सङ्ग्राम में बहुत बड़ा युद्ध हुआ । कामवशात् सोम ने बृहस्पति की पत्नी का अपहरण कर लिया ॥१६३॥ उसमें देवताओ और दानवों का विनाश करने वाला बहुत बड़ा युद्ध हुआ वरुण के भयङ्कर क्रतु में जो संग्राम हुआ उसमें मत्स्य एवं कच्छप ॥१६४॥ यज्ञ के समाप्त होने पर सभी जलचर नष्ट हो गये । हे राघव ! हरिश्चन्द्र के R
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