Srishti Khanda Extracted Page 507

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-507

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Sanskrit Original

ऋषिं समभिचक्राम गमनाय रघूत्तमः । अभिवाद्याब्रवीद्रामो महर्षि कुंभसंभवम् ॥१३६॥ आपृच्छे साधये ब्रहान्ननुज्ञातुं त्वमर्हसि । धन्योस्म्यनुगृहीतोस्मि दर्शनेन महामुने ॥१३७॥ दिश्या चाहं भविष्यामि पावनात्मा महात्मनः । एवं ब्रुवति काकुत्स्थे वाक्यमद्धुतदर्शनम् ॥१३८॥ उवाच परमप्रीते बाष्पनेत्रस्तपोधनः। अत्यद्धुतमिदं वाक्यं तव रामशुभाक्षरम्॥१३९॥ पावनं सर्वभूतानां त्वयोक्तं रघुनंदन । मुहूर्तमपि रामत्वां मैत्रेणेक्षंति ये नराः ॥१४०॥ पावितास्सर्वसूक्तैस्ते कथ्यंते त्रिदिवौकसः । ये च त्वां घोरचक्षुर्भिरीक्षंते प्राणिनो भुवि॥१४१॥ ते हता बह्ादंडेन सद्यो नरकगामिनः। ईदृशस्त्वं रघुश्रेष्ठ पावनः सर्वदेहिनाम् ॥१४२॥ कथयतश्च लोकास्त्वां सिद्धिमेष्यंति राघव । गच्छस्वानातुरोऽविघ्नं पंथानमकुतोभयः ॥१४३॥ प्रशाधि राज्यं धर्मेण गतिस्तु जगतां भवान्। एवमुक्तस्तु मुनिना प्राञ्जलिप्रग्रहोनृपः ॥१४४॥ अभिवादयितुं चक्रे सोगस्त्यमृषिसत्तमम्। अभिवाद्यमुनिश्रेष्ठं तांश्च सर्वास्तपोधिकान् ॥१४५॥ अथारोहत्तदाव्यग्रः पुष्पकं हेमभूषितम् । तं प्रयान्तं मुनिगणा आशीवदिस्समन्ततः ॥१४६॥ अपूपुजन्नरेद्रं तं सहस्ताक्षमिवामराः । ततोर्धदिवसे प्राप्ते रामः सर्वार्थकोविदः ॥१४७॥ अयोध्यां प्राप्य काकुत्स्थः पद्भयां कक्षामवातरत्। ततो विसृज्यरुचिरं पुष्पकं कामवाहितम् ॥१४८॥ कक्षांतराद्विनिष्क्रम्य द्वास्थान् राजा व्रवीदिदम् । लक्ष्मणं भरतं चैव गच्छध्वं लघुविक्रमाः॥९४९॥ ममागमनमाख्याय समानयत माचिरम् । श्रुत्वाथ भाषितं द्वास्था रामस्याक्लिष्टकर्मणः ॥१५०॥ में वहीं निवास किए । प्रातःकाल जगकर उन्होंने आहिक कृत्यों को सम्पन्न किया ॥१३५॥ और जाने के लिए महर्षि अगस्त्य के पास आये । उन्होंने प्रणाम करके महर्षि अगस्त्य से कहा ॥१३६॥ हे ब्रह्मन् ! अब मैं जाने के लिए आज्ञा चाहता हूँ आप मुझे जाने की आज्ञा दें । हे महामुने ! आपके दर्शन से मैं धन्य और अनुगृहीत हो गया।।१३७॥। भाग्यवशात् में आपके दर्शन से कभी पुनः पवित्र होऊंगा । इसतरह से जब श्रीरामचन्द्रजी कह रहे थे उस समय महर्षि ने कहा ॥१३८॥ उन्होंने अपनी आँखों में आँसू भरकर अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक कहा- हे श्रीराम! यह सुन्दर वाक्य अत्यन्त अद्भुत है ॥१३९॥ हे रघुनंदन ! आपने सभी भूतों को पवित्र कर देने वाला वाक्य कहा हैं । हे राम ! जो लोग मुहूर्त भर भी मित्रता भरी दृष्टि से देख लेता है ॥१४०॥ वह मनुष्य सभी सूक्तों के द्वारा पवित्र हो जाते हैं, यह देवताओं ने कहा है । जो जीव आपको द्वेष भरी दृष्टि से इस लोक में देखते हैं ॥१४१॥ वे शीघ्र ही ब्रह्मदण्ड से मार दिए जाते हैं और वे शीघ्र ही नरकगामी हो जाते हैं । रघुश्रेष्ठ ! आप इस तरह से सभी प्राणियों को पवित्र बना देने वाले हैं ॥१४२॥ हे राघव ! आपके गुणों की चर्चा करने वालों को सभी लोकों की सिद्धि हो जाती है । आप शीघ्र अपने राज्य में जाये, आपके मार्ग निर्विघ्न और भयरहित हों ।।१४३।। आप धर्मपूर्वक राज्य का प्रशासन करें आप ही लोगों के आश्रय हैं । इसतरह से मुनि के कहने पर हाथ जोड़कर भगवान् श्रीराम ॥१४४॥ ने महर्षि को अभिवादन किया । मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य को प्रणाम करके उन्होंने उन तपस्वी मुनियों को भी प्रणाम किया ॥१४५॥ इसके बाद श्रीरामचन्द्रजी शान्तिपूर्वक, पुष्पक विमान पर चढ गये । जाते हुए श्रीरामचन्द्रजी की मुनिगण अपने आशीर्वाद से ॥१४६॥ उसीतरह पूजा किए जिस देवता इन्द्र की पूजा करते हें । उसके बाद सबकुछ जानने वाले श्रीरामचन्द्रजी दोपहर के समय ॥१४७॥ अयोध्या पहुँचे कक्षा में उतरे । इच्छानुसार चलने वाले पुष्पक विमान को विदा करके ॥१४८॥ दूसरी कक्षा से निकल कर द्वारपालों से श्रीरामचन्द्रजी ने कहा तुमलोग शीघ्र लक्ष्मण और भरत के पास जओ ॥१४९॥ मेरे आगमन को बतलाकर उन्हें शीघ्र लाओ । अक्लिष्ट कर्म करने वाले

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