Srishti Khanda Extracted Page 506
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-506
Sanskrit Original
ततोऽशरीरिणी वाणी अंतरिक्षात्प्रभाषते । मावधीरामगृध्रं त्वं पूर्वं दग्धं तपोबलात् ॥१२०॥ पुरा गौतमदग्धोऽयं प्रजानाथो जनेश्वर। ब्रह्मदत्तस्तु नामैष शूरः सत्यव्रतः शुचिः ॥१२१॥ गृहमागत्यविप्र्षे भोजनं प्रत्ययाचत। साग्रं वर्षशतं चैव भुक्तवाज्रपसत्तम॥१२२॥ ब्रह्मदत्तस्य वै तस्य पाद्यमर्ध्य स्वयं ततः । आत्मनैवाकरोत्सम्यगभोजनार्थ महाद्युते ॥१ २३॥ समाविश्य गृहं तस्य आहारे तु महात्मनः । नारीं पूर्णस्तनीं दृष्ट्वा हस्तेनाथपरामृशत् ॥९२४॥ अथ क्रुद्धेन मुनिना शापो दत्तः सुदारुणः । गृष्रत्वं गच्छ वै मूढ राजा मुनिमथाब्रवीत्॥१२५॥ कृपां कुरु महाभाग शापोद्धारो भविष्यति । दयालुस्तद्वचः श्रुत्वा पुनराहनराधिप॥१२६॥ उत्पत्स्यते रघुकुले रामो नाम महायशाः । इक्ष्वाकूणां महाभागो राजा राजीवलोचनः ॥१२७॥ तेन दृष्टो विपापस्त्वं भविता नरपुंगव। दृष्टो रामेण तच्छुत्वा बभूव पृथिवीपतिः ॥१२८॥ गृध्त्वं त्यज्य वै शीघ्र दिव्यगंधानुलेपनः । पुरुषो दिव्यरूपोऽसौ बभाषे तं नराधिपम् ॥१२९॥ साधु राघव धर्मज्ञ त्वत्प्रसादादहं विभो। विमुक्तो नरकाद्घोरादपापस्तु त्वया कृतः॥१३०॥ विसर्जितं मया गार्ध्य॑नररूपी महीपतिः । उलूकं प्राह धर्मज्ञ स्वगृहं विश कौशिक ॥१३१॥ अहं संध्यामुपासित्वा गमिष्ये यत्र वै मुनिः। अथोदकमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्य पश्चिमाम्॥१३२॥ आश्रमं प्राविशद्रामः कुंभयोने र्महात्मनः। तस्यागस्त्यो बहुगुणं फलमूलं च सादरम् ॥१३३॥ रसवंति च शाकानि भोजनार्थमुपाहरत् । स भुक्त्वा नरव्याघ्रस्तदन्नममृतोपमम् ॥१३४॥ प्रीतश्च परितुष्टश्च तां रात्रिं समुपावसत् । प्रभाते कल्यमुत्थाय कृत्वाह्रिकमरिंदम ॥१३५॥ दण्डनीय है ॥१२०॥ उसी समय अन्तरिक्ष से आकाशवाणी हुयी; हे राम ! आप गृध्र का बध न करें, यह तपस्या के बल से पहले ही जल चुका है ॥१२१॥ हे जनेश्वर ! पहले यह राजा था; गौतम महर्षि ने इसे शाप से दग्ध किया। यह ब्रह्मदत्त नाम का वीर तथा पवित्र राजा था ॥१२२॥ इसके घर आकर ब्राह्मण ने भोजन की याचना की । हे राजश्रेष्ठ उस ब्राह्मण के अन्न खाये हुए सौ वर्ष से अधिक बीत गये थे ॥१२३॥ हे महाद्युते ! ब्रह्मदत्त ने उस ब्राह्मण को भोजन कराने के लिए स्वयं पाद्य, अर्घ्य इत्यादि किया ॥१२४॥ उनको भोजन लाने के लिए राजा भीतर गये वहाँ उन्होने पूर्ण स्तनों वाली नारी को देखकर उसका अपने हाथ से स्पर्श किया ॥१२५॥ इसके बाद क्रुद्ध होकर मुनि ने भयङ्कर शाप दिया कि अरे ! मूर्ख तुम गृध्र हो जाओ । इसके बाद राजा ने मुनि से कहा ॥१२६॥ हे महाभाग! आप कृपा कीजिये, मेरा शाप से उद्धार बतलाइये । हे नराधिप ! दयालु ऋषि ने कहा ॥१२७॥ रघु के वंश में राम नाम के यशस्वी राजा उत्पन्न होंगे वे महाभाग इक्ष्वाकु वंशीय राजा होंगे ॥१२८॥ उनके द्वारा देखलिए जाने के बाद तुम निष्पाप होओगे । यह सुनकर श्रीराम ने उसे देखा और वह राजा हो गया ॥१२९॥ उसने शीघ्र ही गृध्रत्व का परित्याग कर दिया दिव्य गन्थों वाले अनुलेपन से युक्त हो गया । दिव्यरूपधारी उस राजा ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा॥१३०॥ हे श्रीरामचन्द्रजी आप धर्मज्ञ हैं, आपकी कृपा से में इस नरक से मुक्त हो गया और आपने मुझे निष्पाप बना दिया ॥१३१॥ मैंने मनुष्य रूपधारी राजा होकर गृध्रत्व का परित्याग कर दिया है । भगवान् श्रीराम ने उल्लू से कहा-- तुम अपने घर में प्रवेश करो । मैं सन्ध्या करके मुनि के पास जाऊंगा । उसके पश्चात् आचमन करके तथा सायं सन्ध्या करने के पश्चात् भगवान् श्रीराम भी महर्षि अगस्त्य के पास आये । उनको महर्षि अगस्त्य ने अच्छे-अच्छे फलों तथा मूलों को प्रेमपूर्वक प्रदान किया ॥१३२-१३३॥ उन्होंने भोजन करने के लिए रसभरे शाकों को प्रदान किया । भगवान् श्रीराम अमृत के समान उस अन्न को खाकर ॥१३४॥ प्रसन्नता पूर्वक सन्तुष्ट होकर उस रात्रि
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