Srishti Khanda Extracted Page 505

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-505

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Sanskrit Original

उलूकः शोभते राजन्नतु गृध्रो महामते । त्वं प्रमाणं महाराज राजा हि परमा गतिः ॥१०५॥ राजमूलाः प्रजाः सर्वा राजा धर्मः सनातनः। शास्ता राजा तृणां येषां न ते गच्छंति दुर्गतिम्॥१०६॥ वैवस्वतेन मुक्ताश्च भवंति पुरुषोत्तमाः । सत्वानां वचः श्रुत्वा रामो वचनमब्रवीत् ॥९०७॥ श्रूयतामभिधास्यामि पुराणं यदुदाहृतम् । द्यौः सचंद्रार्कनक्षत्रा सपर्वतमहीद्टुमम् ॥१०८॥ सलिलार्णवे संमग्नं त्रैलोक्यं सचराचरम् । एकमेव तदाह्यासीत्सर्वमेकमिवांबरम् ॥ १ ० ९॥ पुनर्भूः सह लक्ष्म्या च विष्णो र्जठरमाविशत्। तानि गृह्ममहातेजा: प्रविश्य सलिलार्णवम्॥११०॥ सुष्वापहि कृतात्मा स बहुवर्षशतान्यपि । विष्णौ सुप्ते ततो ब्रह्मा विवेश जठरं ततः ॥११९॥ बहुस्त्रोतं च तं ज्ञात्वा महायोगी समाविशत्। नाभ्यां विष्णोः समुद्धूतं पद्मं हेमविभूषितम्॥९९२॥ सतु निर्गम्य वै ब्रह्मा योगी भूत्वा महाप्रभः । सिसृक्षुः पृथिवीं वायुं पर्वतांश्च महीरुहान् ॥१९३॥ तदंतराः प्रजाः सर्वा मानुषांश्च सरीसृपान्। जरायुजाण्डजान्सर्वान्ससर्ज समहातपाः ॥ १ १४॥ तस्य गात्रसमुत्पन्नः कैटभो मधुना सह । दानवौ तौ महावीर्यौ घौरौ लब्धवरौ तदा ॥९९५॥ दृष्ट्वा प्रजापतिं तत्र क्रोधाविष्टावुभौ नृप । वेगेन महता भोक्तुं स्वयंभुवमधावताम् ॥११६॥ दृष्ट्वा सत्वानि सर्वाणि निस्सरन्ति प्रथक् प्रथक् । ब्रह्मणा संस्तुतो विष्णुर्हत्वा तौ मधुकैटभौ ॥९९७॥ पृथिवीं वर्धयामास स्थित्यर्थं मेदसा तयोः। मेदो गंधा तु धरणी मेदिनीत्यभिधां गता ॥११८॥ तस्मादगृध्रस्त्वसत्यो वै पापकर्मा परालयम्। स्वीयं करोति पापात्मा दण्डनीयो न संशयः॥९९९॥ एक पाश से मुक्ति पूरे एक वर्ष में होती है अतएव ज्ञाता पुरुष को सदा सत्य ही बोलना चाहिए ॥१०४॥ इन बातों को सुनकर मन्त्रों ने श्रीराम से कहा-- हे महामते ! उल्लू ही ठीक कह रहा है । गृध्र नहीं ॥१०५॥ हे महाराज आपको प्रणाम है, राजा ही परम आश्रय होता है, सारी प्रजाओं का मूल राजा होता, राजा ही सनातन धर्म हे ॥१०६॥ जिन मनुष्यों का प्रशासन करने वाला राजा होता है, वे मनुष्य दुर्गति प्राप्त नहीं होते हें । वे यमराज के द्वारा मुक्त होकर पुरुषोत्तम (उत्तम पुरुष) बन जाते हैं ॥१०७॥। मन्त्रियों की बातों को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने कहा मेरी बात सुनो जिसे पुराण बतलाया है ॥१०८॥ चुलोक, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, पर्वत, पृथिवी, वृक्ष, चर अचर से युक्त त्रैलोक्य ये सबके सब सागर के जल में डूबे हुए थे ॥१०९॥ उस समय सब के सब एक ही समान थे जैसे अकेला आकाश हो । उसके बाद पृथिवी लक्ष्मीजी के साथ भगवान् विष्णु के उदर में प्रवेश कर गयी ।।११०।। उनको निगृहीत करके महातेजस्वी भगवान् विष्णु समुद्र के जल में अनेक हजार वर्ष तक सोते रहे ॥१११॥ भगवान् विष्णु के सो जाने पर ब्रह्माजी उनके पेट में प्रवेश किए । भगवान् विष्णु को अनेक स्रोतों वाला जानकर महायोगी ब्रह्माजी प्रवेश किए॥११२॥ भगवान् विष्णु की नाभि से सुवर्णालंकृत कमल उत्पन्न हुआ । वे सृष्टि करने के इच्छुक योगी होकर महाप्रभु ब्रह्माजी ॥११३॥ पृथिवी, वायु, पर्वत, वृक्ष, ब्रह्माण्ड के भीतर रहने वाली सारी प्रजाओं, मनुष्यों, सपों, जरायुजों, अण्डजों इत्यादि सबों की सृष्टि किए । भगवान् विष्णु के शरीर से मधु एवं कैटभ उत्पन्न हुए ॥११४-११५॥ वे दोनों दानव महावीर तथा वरदान प्राप्त थे । उन दोनों ने ब्रह्माजी को देखा और क्रुद्ध हो गये ॥११६॥ वे दोनों ब्रह्माजी को खा जाने के लिए वेग से दौड़े । उन दोनों को देखकर सभी जीव अलग-अलग निकलने लगे ।॥।११७॥ ब्रह्माजी ने भगवान् विष्णु की स्तुति की, भगवान् विष्णु ने उन दोनों की मेदा से पृथिवी को बढाने के लिए, उन दोनों को मार दिए ॥११८॥ मेदस की गन्धवाली होने के कारण पृथिवी मेदिनी कहलाने लगी । अतएव वह गृह गृध्र का नहीं अपितु उल्लू का है ॥११९॥ अतएव गृध्र झुठ बोलता है दूसरे के घर को अपना बनाना चाहता है, अतएव

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