Srishti Khanda Extracted Page 504

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-504

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Sanskrit Original

योस्मन्नाथ: सपक्षीद्रो भवतो विनियोज्यक: । अस्वाम्यं देवनास्माकं सन्निधौ भवतः प्रभो ॥९०॥ भवतैव कृतं पूर्वं भूतग्रामं चतुर्विधम् । ममालयप्रविष्टस्तु गृध्रो मां बाधते नृप ॥९१॥ भवान्देव मनुष्येषु शास्ता वै नरपुंगव । एतच्छुत्वा तु वै रामः सचिवानाह्वयत्स्वयम् ॥९२॥ विष्टिर्जयंतो विजयः सिद्धार्थो राष्ट्रवर्धनः । अशोको धर्मपालश्च सुमंत्रश्च महाबलः ॥९३॥ एते रामस्य सचिवा राज्ञो दशरथस्य च । नीतियुक्ता महात्मानः सर्वशास्त्रविशारदाः ॥९४॥ सुशांताश्च कुलीनाश्च नये मन्त्रे च कोविदाः । तानाहूय स धर्मात्मा पुष्पकादवरूह्य च॥९५॥ गृध्रोलूकौ विवदंतो पृच्छतिस्म रघूत्तमः । कतिवर्षाणि भो गृध्र तवेदं निलयं कृतम् ॥९६॥ एतन्मे कौतुकं ब्रूहि यदि जानासि तत्त्वतः । एतच्छुत्वा वचो गृध्रो वभाषे राघवं स्थितम् ॥९७॥ इयं वसुमती राम मानुषैर्बहुबाहुभिः । उच्छितेराचिता सर्वा तदाप्रभृतिमद्गृहम्॥९८॥ उलूकस्त्वब्रवीद्रामं पादपै रूपशोभिता । यदैव पृथिवी राजंस्तदा प्रभृति मे गृहम्॥९९॥ एतच्छुत्वा तु रामो वै सभासद उवाच ह । न सा सभा यत्र न संति वृद्धा, वृद्धा न ते ये न वदंति धर्मम् ॥१००॥ नासौधर्मो यत्र न चास्ति सत्यं, नतत्सत्यं यच्छलमभ्युपैति । ये तु सभ्याः सभां गत्वा, तूष्णीं ध्यायंत आसते ॥१०१॥ यथा प्राप्तं न ब्रुवते सर्वेतेऽनृतवादिनः । न वक्ति च श्रुतं यश्च कामात्क्रोधात्तथा भयात्॥१० २॥ सहस्रं वारुणाः पाशाः प्रतिमुंचंति तं नरम्। तेषां संवत्सरे पूर्णे पाश एकः प्रमुच्यते ॥१०३॥ तस्मात्सत्यं तु वक्तव्यं जानता सत्यमंजसा। एतच्छुत्वा तु सचिवा राममेवाब्रुवंस्तदा ॥१०४॥ हमलोगों के स्वामी गरुड़ आपके सेवक हैं । हे देव ! आपकी सन्निधि में हम स्वामी रहित नहीं है ।।९०। आपने ही पहले चार प्रकार के जीवों की रचना की है । हे राजन् ! मेरे घर में प्रवेश करके यह गृध्र मुझे दुःख देता है ॥९१॥ हे देव ! आप मनुष्यों के स्वामी है तथा मनुष्यों में श्रेष्ठ हें । इन सारी बातों को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने अपने मन्त्रियों को बुलाया ॥९२॥ विष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, राष्ट्रवर्धन, अशोक, धर्मपाल तथा महाबलवान् सुमन्त्र।९३॥ ये ही श्रीरामचन्द्रजी के तथा महाराज दशरथ के भी मन्त्री हैं । ये सभी नीति को जानने वाले तथा सभी शास्रं में निपुण है ॥९४॥ ये अत्यन्त शान्त, कुलीन तथा नीति एवं मन्त्रणा करने में विशारद है । वे धर्मात्मा, पुष्पक विमान से उतरकर तथा उन सबों को बुलाकर ॥९५॥ श्रीरामचन्द्रजी ने जिस विषय में गृध्र तथा उल्लू दोनों विवाद करते थे उसके विषय में पूछा । श्रीराम ने कहा हे गृध्र कितने दिन पहले तुमने अपना घर बनाया ।।९६॥ मुझको यह उत्कण्ठा है, अतएव तुम ठीक-ठीक बतलाओ । यह सुनकर गृध्र ने श्रीरामचन्द्र से कहा ॥९७॥ गृध्र ने कहा-- हे श्रीराम ! जब यह पृथिवी अनेक भुजाओं वाले मनुष्यों से भरी पड़ी थी हे राजन् ! उस समय मैंने अपना यह घर बनाया है ॥९८॥ इस पर उल्लू ने श्रीरामचन्द्र से कहा जब यह पृथिवी वृक्षों से सुशोभित हुयी, उस समय से मेरा घर है ॥९९॥ यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने सभासदों से कहा ॥१००॥ श्रीरामजी ने कहा-- वह सभा सभा नहीं है, जिसमें वृद्ध पुरुषों न हों और वे वृद्ध वृद्ध नहीं है जो धर्मानुकूल न बोलें । जिसमें सत्य न हो वह धर्म धर्म नहीं है और छल युक्त सत्य भी सत्य नहीं होता है ॥१०१॥ जो सभासद सभा में बैठकर चुपचाप बैठे रहते हैं तथा समयानुकूल उचित बातें नहीं कहते हैं वे सब झूठ बोलने वाले हैं ॥१०२॥ य॒दि कोई सभासद काम, क्रोध अथवा भय कें कारण सुनकर भी नहीं बोलता है, उस मनुष्य को हजारो वरुण बाँध लेते हैं ॥१०३॥ ऐसे लोगों की

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