Srishti Khanda Extracted Page 503
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-503
Sanskrit Original
शृणु त्वं मम देवेश विज्ञाप्यं नरपुंगव । ममालयं पूर्वकृतं बाहुवीर्येण वै प्रभो ॥७५॥ उलूको हरते राजस्त्वत्समीपे विशेषतः । ईदृशोयं दुराचारस्त्वदाज्ञालंघको नृप ॥७६॥ प्राणांतिकेन दंडेन रामशासितुमर्हसि। एवमुक्ते तु गृध्रेण उलूको वाक्यमब्रवीत् ॥७७॥ शृणु देव मम ज्ञाप्यमेकचित्तो नराधिप। सोमाच्छक्राच्च सूर्यच्च घनदाच्च यमात्तथा॥७८॥ जायते वै जृपो राम किंचिद्धवति मानुषः । त्वं तु सर्वमयो देवो नारायणपरायणः ॥७९॥ प्रोच्यते सोमताराजन्सम्यक्कारये विचारिते । सम्यग्रक्षसि तापेभ्यस्तमोघ्नो हि यतो भवान्॥८०॥ दोषे दंडात्प्रजानां त्वं यतः पापभयापहः । दाता प्रहर्ता गोप्ता च तेनेंद्र इव नो भवान् ॥८ १॥ अधृष्यः सर्वभूतेषु तेजसा चानलो मतः । अभीक्ष्णं तपसे पापांस्तेन त्वं रामभास्करः ॥८ २॥ साक्षाद्वित्तेशतुल्यस्त्वमथवाधनदाधिकः । चित्तायत्ता तु पत्नी श्रीर्नित्यं ते राजसतम॥८३॥ धनदस्य तु कोशेन धनदस्तेन वैभवान् । समः सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च ॥८४॥ शत्रो मित्रे चते दृष्टि: समंताद्याति राघव । धर्मेण शासनं नित्यं व्यवहारविधिक्रमैः ॥८५॥ यस्यरूष्यसि वै राम मृत्युस्तस्याभिधीयते । गीयसे तेन वै राजन्यम इत्यभिविश्रुतः ॥८६॥ यश्चासौ मानुषोभावो भवतो नृपसतम । आनृशंस्य परो राजा सर्वेषु कृपयान्वितः ॥८७॥ दुर्बलस्य त्वनाथस्य राजा भवति वै बलम् । अचक्षुषो भवेच्चक्षुरमतेषु मति भवेत् ॥८८॥ अस्माकमपि नाथस्त्वं श्रूयतां मम धार्मिक । भवता तत्र मंतव्यं यथैते किलपक्षिणः ॥८९॥ विषय में पारङ्गत हैं ॥७४॥ हे देवेश ! हे नरपुंगव ! आप मेरी प्रार्थना को सुनें । मैंने अपने बाहुबल से अपना निवास पहले बनाया । किन्तु आपकी उपस्थिति में यह उल्लू उसे ले लेना चाहता है । हे राजन् ! यह इस प्रकार का दुराचारी है, आपकी आज्ञा का उल्लंघन करने वाला है ॥७६॥ अतएव हे श्रीराम ! आप इसको प्राणदण्ड से दण्डित कीजिये । इस तरह से गृध्र के कहने पर उल्लू ने कहना प्रारम्भ किया ॥७७॥ हे नराधिप ! आप सावधानी पूर्वक मेरी बात को सुनें । राजा में सोम, इन्द्र, सूर्य, कुबेर तथा यम का अंश होता है ॥७८॥ मनुष्य का अंश अल्प मात्रा में होता है । आप तो सर्वदेव स्वरूप हैं नारायण तथा सबों के आश्रय हैं ॥७९॥ हे राजन् ! अच्छी तरह से विचार करके कार्य करने को सोमत्व कहते हैं । संतापों से अच्छी तरह से रक्षा करने के कारण आप तमोध्न (अन्धकार विनाशक) हैं ॥८०॥ पाप तथा प्रजाओं के भय के विनष्ट करने वाले आप पाप करने पर प्रजाओं को दण्ड देते हैं । दाता, प्रहर्ता तथा रक्षक होने के कारण आप इन्द्र के समान हें ॥८ १॥ अपने तेज के द्वारा आप सभी जीवों के लिए अनभिभवनीय होने के कारण अग्नि हैं । आप पापियों को सदा संतप्त करते हैं, अतएव आप सूर्य हैं। ८ २॥ आप साक्षात् कुबेर के समान हैं, अथवा उनसे बढकर है । हे राजश्रेष्ठ ! आपकी पत्नी श्रीसदा आपके मन के अधीन रहती हैं । कुबेर की लक्ष्मी तो कोष में रहती हैं । अतएव आप कुबेर हैं । आप समस्त चराचरों के लिएसमदर्शी हैं । आपकी दृष्टि शत्रुओं और मित्रों पर सदा एक समान पड़ती रहती है । आप व्यवहार विधि के अनुसार धर्मपूर्वक शासन करते हैं ॥८३-८५॥ आप जिस पर क्रोध करते हैं, उसकी मृत्यु हो जाती है, इसलिए हे राजन् ! आप यम शब्द से कहे जाते हैं ॥८६॥ हे नृपश्रेष्ठ ! आपका जो यह मनुष्य भाव है, वह इसलिए कि राजा की सबों के प्रति अनृशंसता (निष्ठुरता का अभाव) और कृपा बनी रहती है ॥८७॥ दुर्बलों तथ अनाथों क बल राजा ही होता है। वह नेत्रहीनों के लिए नेत्र होता है और आज्ञानियों के लिए ज्ञान होता है ॥८८॥ आप हमलोगों के भी स्वामी हैं, अतएव हे धार्मिक ! आप हमारी बातों को सुनें । आपको जिस तरह के ये पक्षी हैं उसीतरह से विचार करना चाहिए ॥८९॥
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