Srishti Khanda Extracted Page 501

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-501

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Sanskrit Original

सोपश्यदरजां दीनां रजसा समभिप्लुताम् । चंद्रस्य घनसंयुक्तां ज्योत्स्नामिव पराजिताम् ॥४४॥ तस्य रोषः समभवत् क्षुधार्तस्य महात्मन: । निर्दहन्निवलोकांस्त्रींस्तान् शिष्यान्समुवाच ह ॥४५॥ पश्यध्वं विपरीतस्य दंडस्यादीर्घदर्शिनः । विपत्तिं घोरसंकाशां दीप्तामग्रिशिखामिव ॥४६॥ यन्नाशं दुर्गतिं प्राप्तस्सानुगश्च न संशयः । यस्तु दीप्तहताशास्य अर्चिः संस्पृष्टवानिह ॥४७॥ यस्मात्सकृतवान्पापमीदृशं घोरसंमितम् । तस्मात्य्राप्स्यति दुर्मेधाः पांसुवर्षमनुत्तमम् ॥४८॥ कुराजा देशसंयुक्तः सभृत्यबलवाहनः। पापकर्मसमाचारो वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः ॥४९॥ समंताद्योजनशतं विषयं चास्य दुर्मतेः। धुनोतु पांसुवर्षेण महता पाकशासनः ॥५०॥ सर्वसत्वानि यानीह जंगमस्थावराणि वै। सर्वेषां पांसुवर्षेण क्षयः क्षिप्रं भविष्यति ॥५१॥ दंडस्य विषयो यावत्तावत्स वनमाश्रमम् । पांसुवर्षमिवाकस्मात् सप्तरात्रं भविष्यति ॥५२॥ इत्युक्त्वा क्रोधसंतप्तस्तमाश्रमनिवासिनम् । जनं जनपदस्यांते स्थीयतामित्युवाचह ॥५३॥ उक्तमात्रे उशनसा आश्रमावसथो जनः । क्षिप्रं तु विषयात्तस्मात्स्थानं चक्रे च बाह्यतः ॥५४॥ तं तथोक्त्वा मुनिजनमरजामिदमब्रवीत् । आश्रमे त्वं सुदुर्मेधे वस चेह समाहिता ॥५५॥ इदं योजनपर्यंतमाश्रमं रुचिरप्रभम् । अरजे विरजास्तिष्ठ कालमत्रसमाश्शतम् ॥५६॥ श्रुत्वा नियोगं विप्रर्षेररजा भार्गवी तदा । तथेति पितरं प्राह भार्गवं भृशदुःखिता ॥५७॥ इत्युक्त्वा भार्गवो वासं सदन्यमुपाक्रमत् । सप्ताहे भस्मसाद्धूतं यथोक्तं ब्रह्मवादिना ॥५८॥ तस्माहंडस्य विषयो विंध्यशैलस्य मानुष । शप्तोह्युशनसा राम तदा भूद्धर्षणे कृते ॥५९॥ आने की प्रतीक्षा करने लगी ॥४२॥ एक मुहूर्त के पश्चात् अत्यन्त कान्ति सम्पन्न शुक्राचार्य स्नान करके भूख लगने के कारण शिष्यों के साथ अपने आश्रम में आये ॥४३॥ उन्होंने दीन बनी हुयी रजोगुण से लथपथ चन्द्रमा की मेघाच्छन्न ज्योत्स्ना (चाँदनी) के समान पराजित अरजा को देखा ॥४४॥ भूख से व्याकुल शुक्राचार्य का क्रोध उदीर्ण हो गया । त्रैलोक्य को भस्म करते हुए के समान उन्होंने शिष्यों से कहा ॥४५॥ मेरे विपरीत कर्म करने वाले मूर्ख दण्ड के ऊपर आने वाली जलती हुयी अग्नि के समान भयङ्कर विपत्ति को तुमलोग देखो ॥४६।। अपने समस्त अनुचरों के साथ उनका दुर्गतिमय नाश होने वाला है । दण्ड ने जो यहाँ जलती हुयी अग्नि की ज्वाला को छुआ है॥४७॥ चूकि उसने इसतरह का भयङ्कर पाप किया है अतएव उसके राज्य में भयङ्कर धूल की वर्षा होगी ॥४८॥ पाप कर्म करने वाले दुष्ट राजा का देश, भृत्य, सेना तथा वाहन के साथ बध कर देना ही उचित है ॥४९॥ इस मूर्ख के राज्य के चारो ओर सौ योजन पर्यन्त इन्द्र धूलि की वर्षा करके विनष्ट कर दे ॥५०॥ यहाँ पर स्थावर जंगम जितने भी जीव हों वे सबके सब इस धूलि की वर्षा से शीघ्र ही विनष्ट हो जायेंगे ।॥५१।। जहाँ तक दण्ड का राज्य है वहाँ तक सभी आश्रम वन आदि में धूलि की वर्षा सात रात तक होती रहेगी ॥५२॥ यह कहकर क्रोध से व्याकुल शुक्राचार्य ने आश्रमवासियों से कह दिया कि, आपलोग इस जनपद के बाहर चले जायँ ॥५३॥ शुक्राचार्य के कहते ही आश्रम में रहने वे लोग शीघ्र ही उस राजा के राज्य से बाहर चले गये ॥५४॥ मुनियों को इस प्रकार से कहकर शुक्राचार्य ने अरजा से कहा हे दुर्बुद्धि वाली, तुम इसी आश्रम में समाहित होकर निवास करो ॥५५॥ यह आश्रम एक योजन तक सुन्दर कान्ति से सम्पन्न रहेगा । हे अरजे ! यहाँ पर रजोगुण से रहित होकर सौ वर्ष तक रहो।५६॥ शुक्राचार्य की आज्ञा को सुनकर भार्गवी अरजा अत्यन्त दुःखी होकर अपने पिता शुक्राचार्य से कही ठीक हैं ॥५७॥ यह कहकर शुक्राचार्य अपना दूसरा निवास स्थान बनाये । एक सप्ताह में ही जैसा कि ब्रह्मवादी शुक्राचार्य ने कहा था

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