Srishti Khanda Extracted Page 500
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-500
Sanskrit Original
त्वया हता मम प्राणा मां जीवय सुलोचने । दासोस्मि ते वरारोहे भक्तं मां भज शोभने ॥२८॥ तस्यैवं तु ब्रुवाणस्य मदोन्मत्तस्य कामिनः । भार्गवी प्रत्युवाचेदं वचः सविनयं नृपम् ॥२९॥ भार्गवस्य सुतां विद्धि शुक्रस्याक्लिष्टकर्मणः। अरजां नाम राजेंद्र ज्येष्ठामाश्रमवासिनः ॥३०॥ शुक्रः पिता मे राजेद्र त्वं च शिष्यो महात्मनः । धर्मो भगिनी चाहं भवामि नृपनंदन ॥३९॥ एवंविधं वचो वक्तुं नत्वमर्हसि पार्थिव। अन्येभ्योपि सुदृष्टेभ्यो रक्ष्या चाहं सदा त्वया॥३२॥ क्रोधनो मे पिता रौद्रो भस्मत्वं त्वां समानयेत् । अथवा राजधर्मेण संबंधं कुरुषे बलात् ॥३३॥ पितरं याचयस्व त्वं धर्मदृष्टेन कर्मणा । वरयस्व नृपश्रेष्ठ पितरं मे महाद्युतिम् ॥३४॥ अन्यथा विपुलं दुःखं तव घोरं भवेदश्रुवम् । क्रुद्धो हि मे पिता सर्वं त्रैलोक्यमभिनिर्दहेत् ॥३५॥ ततोऽशुभं महाघोरं श्रुत्वा दंडः सुदारुणम् । प्रत्युवाच मदोन्मत्तः शिरसाभिनतः पुनः ॥३६॥ प्रसादं कुरु सुश्रोणि कामोन्मत्तस्य कामिनि। त्वया रूद्धा मम प्राणा विशीर्यति शुभानने ॥३७॥ त्वां प्राप्य वैरं मेऽत्रास्तु वधो वापि महत्तरः । भक्तं भजस्व मां भीरु त्वयि भक्तिर्हि मे परा ॥३८॥ एवमुक्त्वा तु तां कन्यां बलात्संगृह्ण बाहुना । अन्येन राज्ञा हस्तेन विविस्त्रा सा तथा कृता ॥३९॥ अंगमंगे समाश्लेष्य मुखे चैव मुखं कृतम्। विस्फुरंती यथाकामं मैथुनायोपचक्रमे ॥४०॥ तमनर्थं महाघोरं दंडः कृत्वा सुदारुणम् । नगरं स्वं जगामाशु मदोन्मत्त इव द्विपः ॥४९॥ भार्गवी रुदती दीना आश्रमस्याविदूरतः। प्रत्यपालयदुद्विम्रा पितरं देवसम्मितम्॥४२॥ समुहूर्तादुपस्पृ्य देवर्षिरमितद्युतिः । स्वमाश्रमं शिष्यवृतं क्षुधार्तः सन्यवर्तत ॥४३॥ भी चित्त का अकर्षण करने वाला है, यदि में तुमको भोग करने के लिए नहीं प्राप्त कर सकूँ ता में मर जाऊँगा।२७॥ हे सुलोचने ! तुमने मेरे प्राणों को हर लिया है, मुझे जिला दो। हे सुन्दरि ! में तुम्हारा दास हूँ ।में तुम्हारा भक्त हूँ, तुम मुझे अपना बना लो ॥२८॥ इसतरह से बोलने वाले मदोन्मत्त बने हुए कामी राजा ने भार्गवी ने नम्रता पूर्वक कहा ॥२९॥ मैं भृगुवंशीय शुक्राचार्य की पुत्री हूँ मैं आपके आचार्य की अरजा नाम की ज्येष्ठ पुत्री हूँ मेरे पिता आश्रमवासी हैं ॥।३०॥ मेरे पिता शुक्राचार्य हैं, तुम उनके शिष्य हो । हे नृपश्रेष्ठ ! धर्मानुसार में आपकी बहन लगती हुँ ॥३१॥ अतएव तुम इसतरह की बातें मुझसे नहीं कर सकते हो । तुम्हें तो दूसरे दुष्टों से भी मेरी रक्षा करनी चाहिए ॥३२॥ मेरे पिता क्रोधी हैं, वे तुम्हें भस्म कर सकते हैं । यदि तुम राजधर्मानुसार बलपूर्वक सम्बन्ध करना ही चाहते हो तो ॥३३॥ मेरे पिता से तुम्हे याचना करनी चाहिए । हे राजश्रेष्ठ आप मेरे महाद्युति पिता का वरण करें ॥३४॥ यदि ऐसा नहीं करते हो तो तुम्हें अत्यधिक भयङ्कर कष्ट भोगना पड़ेगा । यदि मेरे पिता क्रुद्ध हो जायं तोवे त्रैलोक्य को भस्म कर सकते हैं ॥३५॥ उसके बाद अत्यन्त भयङ्कर अशुभ का श्रवण करके राजा दण्ड शिर झुकाये हुए पुन: कहा ॥३६॥ हे कामिनि ! हे सुश्रोणि ! मेरे ऊपर कृपा करो में कामोन्मत्त हो गया हूँ । तुम्हारे द्वारा रोके गये मेरे प्राण निकल जाना चाहते हैं ॥३७॥ तुमको प्राप्त करके यहाँ मेरा वैर हो जाय अथवा मेरा वध हो जाय कोई बात नहीं है । मैं तुम्हारा भक्त हूँ, मुझे तुम अपना लो, हे भीरु ! तुममें मेरी अत्यन्त भक्ति है॥ ३ ८॥ इसतरह से कहकर राजा ने उस कन्या के एक हाथ को पकड़ लिया, और दूसरे हाथ से उसे निर्वस्त्र कर दिया।३९। उसने अपने अङ्ग से उसके अङ्गों को संश्लिष्ट करके उसके मुख को चूमने लगा । वह कन्या छटपटा रही थी किन्तु वह अपनी इच्छानुसार मैथुन करना प्रारम्भ कर दिया ॥४०॥ वह दण्ड अत्यन्त भयङ्कर अनर्थ करके मदोन्मत हाथी के समान अपने नगर में चला गया ॥४१॥ दीन भार्गवी रोती हुयी आश्रम के सन्निकट ही देवतुल्य अपने पिता के
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