Srishti Khanda Extracted Page 499
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-499
Sanskrit Original
जनयिष्ये कथं पुत्रानिति चिंता परोभवत्। कर्मभिर्बहुभिस्तैस्तैस्ससुतैस्संयुतो भवत् ॥१२॥ तोषयामासपुत्रैस्स पितृन् देवसुतोपमैः । सर्वेषामुत्तमस्तेषां कनीयान् रघुनंदन ॥१३॥ शूरश्च कृतविद्यश्च गुरुश्चजनपूजया । नामतस्याथदंडेति पिता चक्रे सबुद्धिमान्॥॥९४॥ भविष्यद्दण्डपतनं शरीरे तस्य वीक्ष्य वै । संपश्यमानस्तं दोषं घोरं पुत्रस्य राघव ॥१५॥ सविध्यनीलयोर्मध्ये राज्यमस्य ददौ प्रभुः । सदंडस्तत्रराजा भूद्रम्ये पर्वतमूर्द्धनि॥ ९ ६॥ पुरं चाप्रतिमं तेन निवेशाय तथाकृतम्। नामास्य पुरस्याथ मधुमत्तमिति स्वयम् ॥१७॥ तथादेशेन संपन्न: शूरो वासमथाकरोत् । एवं राजा स तद्राज्यं चकार स पुरोहितः॥१८॥ प्रष्ट सुप्रजाकीर्ण देवराजो यथादिवि । ततः स दंडः काकुत्स्थ बहुवर्षगणायुतम्॥१९॥ अकारयत्तुधर्मात्मा राज्यं निहतकंटकम् । अथ काले तु कस्मिश्चिद्राजा भार्गवमाश्रमम् ॥२०॥ रमणीयमुपाक्रमच्चैत्रमासे मनोरमे । तत्र भार्गवकन्यांतु रूपेणाप्रतिमां भुवि॥२१॥ विचरंतीं बनोद्देशे दंडोपश्यदनुत्तमाम् । उत्तुंगपीवरी श्यामा चंद्राभवदनां शुभाम् ॥२२॥ सुनासां चारुसर्वांगी पीनोन्नतपयोधराम्। मध्ये क्षामां च विस्तीर्णा दृष्ट्वा तां कुरुते मुदम्॥२३॥ एकवस्त्रां वने चैकां प्रथमे यौवनेस्थिताम् । स तां दृष्ट्वा त्वधर्मेण अनंगशरपीडितः ॥२४॥ अभिगम्य सुविश्रांतां कन्यां वचनमब्रवीत् । कुतस्त्वमसि सुश्रोणि कस्य चासि सुशोभने ॥२५॥ पीडितोहमनंगेन पृच्छामि त्वां सुशोभने । त्वया मेऽपहृतं चित्तं दर्शनादेव सुंदरि ॥२६॥ इदं ते वदनं रम्यं मुनीनां चित्तहारकम् । यद्यहं न लभे भोक्तुं मृतं मामवधारय॥२७॥ तरह से इक्ष्वाकु सोचने लगे और वे विविध प्रकार के कर्मो के द्वारा अनेक पुत्रों वाले हो गये ॥१२॥ उन्होंने देव पुत्रों के समान पुत्रों के द्वारा पितरों को सन्तुष्ट किया । हे रघुनंदन उन सभी पुत्रों में जो सबसे छोटा पुत्र था वह सबों से योग्य था ॥१३॥ बह शूरवीर, लब्धविद्य तथा गुरुजनों की पूजा करने वाला था । उसका नाम बुद्धिमान् पिता ने दण्ड रखा ॥१४॥ भविष्यत् काल में उसके शरीर पर दण्डपात होगा इस बात को जानकर उस पुत्र के भयङ्कर दोष को देखते हुए पिता ने उस पुत्र को विन्ध्य तथा नील पर्वत के बीच में राज्य प्रदान किया । वह दण्ड उस मनोहर पर्वत के ऊपर राजा हुआ ॥१५-१६॥ उसने अपने रहने के लिए अप्रतिम नगर बसाया और उसनगर का नाम मधुमत्त रखा ।।१७।। उस प्रकार के देश वाला वह शूरवीर राजा, वहाँ पर निवास करता था । इस प्रकार से वह राजा अपने पुरोहित के साथ राज्य करता था ।।१८॥। सुन्दर प्रजाओं से युक्त वह उसी तरह राज्य करता था जिस तरह देवराज स्वर्गलोक का राज्य करते हैं । हे काकुत्स्थ ! वह अनेक अयुत वर्षो तक अकण्टक राज्य किया । एक बार वह राजा शुक्राचार्य के आश्रम में गया ॥१९-२०॥ उस समय मनोहर चैत्र का महीना प्रारम्भ हुआ था । वहाँ पर उसने भूलोक सुन्दरी शुक्राचार्य की पुत्री को देखा ॥२१॥ वह वन में विचरण कर रही थी । उस सुन्दरी को दण्ड ने देखा । उन्नत पीवरी उस युवती का मुख चन्द्रमा के समान आह्लादक था ॥२२॥ उसकी नासिका उठी हुयी थी, उसके सभी अङ्ग अत्यन्त सुन्दर थे, उसके विशाल उठे हुए स्तन थे । उसकी कमर पतली थी और वह विस्तीर्ण शरीर वाली थी, देखने मात्र से वह आनन्द उत्पन्न कर देती थी ॥२३॥ उसकी नवीन जवानी थी । उस समय वह रजस्वला थी । उसको देखकर राजा अधर्म पूर्वक काम के बाणों से पीडित हो गया ॥२४॥ वह विश्राम करती हुयी उस कन्या के पास जाकर कहा हे सुन्दरि ! तुम कहाँ से आयी हो, तुम किसकी पत्नी हो ?॥२५॥ मैं कामपीडित हूँ हे सुन्दरि ! मैं पूछता हूँ । हे सुन्दिर ! देखने मात्र से तुमने मेरे चित्त का हरण कर लिया है ॥२६॥ तुम्हारा यह मुखडा मुनियों के
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