Srishti Khanda Extracted Page 498

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-498

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Sanskrit Original

सैंतीसवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच तदद्धततमं वाक्यं श्रुत्वा च रघुनंदनः । गौरवाद्विस्मयाच्चपि भूयः प्रष्टुं प्रचक्रमे ॥१॥ राम उवाच भगवंस्तद्दनं घोरं यत्रासौ तप्तवांस्तपः । श्वेतो वैदर्भको राजा तदद्भुतमभूत्कथम् ॥२॥ विषमं तद्दनं राजा शून्यं मृगविवर्जितम् । प्रविष्ट तप आस्थातुं कथं वद महामुने ॥३॥ समंताद्योजनशतं निर्मनुष्यमभूत्कथम् । भवान्कथं प्रविष्टस्तद्येन कार्येण तद्वद् ॥४॥ अगस्त्य उवाच पुरा कृतयुगे राजा मनुर्दण्डडधरः प्रभुः । तस्य पुत्रो थनाम्रासीदिक्ष्वाकुरमितद्युतिः ॥५॥ तं पुत्र पूर्वजं राज्ये निक्षिप्य भुवि संमतम् । पृथिव्यां राजवंशानां भव राजेत्युवाचह ॥६॥ तथेति च प्रतिज्ञातं पितुः पुत्रेण राघव । ततः परम संहृष्टः पुनस्तं प्रत्यभाषत॥७॥ प्रीतोस्मि परमोदारकर्मणा ते न संशयः । दण्डेन च प्रजारक्ष न च दंडमकारणम् ॥८॥ अपराधिषु यो दंड: पात्यते मानवैरिह। स दंडो विधिवन्मुक्तः स्वर्ग नयति पार्थिवम् ॥९॥ तस्माइण्डे महाबाहो यत्मवान् भवपुत्रक । धर्मस्ते परमो लोके कृत एवं भविष्यति ॥१०॥ इति तं बहुसंदिश्य मनुः पुत्रं समाधिना। जगामत्रिदिवं हृष्टो ब्रह्मलोकमनुत्तमम् ॥९९॥ दण्डकारण्य की उत्पत्ति और राजा दण्ड की कथा, गृध्र एवं उल्लू के परस्पर में गृह के विषय में विवाद होने पर श्रीराम द्वारा निर्णय; गृप्र के पूर्वजन्म की कथा, श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा राजसूय यज्ञ का विचार होने पर भरतजी द्वारा सयौक्तिक उसका निषेध, कान्यकुब्ज में श्रीराम द्वारा वामन की स्थापना की प्रतिज्ञा पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- उस अत्यन्त अद्भुत वाक्य के अनुसार श्रीरामचन्द्रजी गौरव तथा विस्मय वशात् पुनः पूछना प्रारम्भ किए ॥१॥ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा-- हे भगवन् ! वह घोर वन जहाँ पर राजा श्वेत ने तपस्या की थी, अद्भुत के समान क्यों हो गया ?॥२॥ हे महामुने ! आप यह बतलाएँ कि राजा श्वेत उस विषम तथा शृगाल आदि से रहित वन में तपस्या करने के लिए क्यों गये ॥३॥ चारो ओर से सौ योजन विस्तृत वह वन मनुष्यों से रहित क्यों हो गया और आप उस वन में किस कार्य के लिए गये ? इसे हमें बतलायें ॥४।। अगस्त्य महर्षि ने कहा-- पहले सत्ययुग में मनु नामक एक राजी हुए । उनके पुत्र इक्ष्वाकु निस्सीम कान्ति सम्पन्न राजा हुए यह सुना जाता है ॥५॥ राजा ने उस अपने इक्ष्वाकु नामक पुत्र को अपने पूर्वजों के राज्य पर नियुक्त करके कहा कि पृथिवी के समस्त राजवंशों के तुम राजा होओ ॥६॥ पुत्र ने भी अपने पिता के समक्ष उसी तरह करने की प्रतिज्ञा की । उसके बाद अत्यन्त प्रसन्न होकर मनु ने कहा ॥७॥ मनु ने कहा-- मैं तुम्हारे इस कार्य से अत्यन्त प्रसन्न हूँ, इसमें कोई सन्देह नहीं है । तुम दण्ड के द्वारा प्रजाओं की रक्षा करो, किन्तु दण्ड को अकारण नहीं होना चाहिए ॥८॥ जो अपराधियों को मनुष्यों द्वारा दण्ड दिया जाता है, वह दण्ड विधिपूर्वक होता है, और उससे दण्ड देने वाला राजा मुक्त होकर स्वर्ग जाता है ॥९॥ इसलिए हे महाबाहो ! दण्ड के विषय में तुम्हे सावधान होना चाहिए । ऐसा करने से संसार में तुम महान् धर्म को प्राप्त करोगे ॥१०॥ आगस्त्य महर्षि ने कहा-- इसतरह से अनेक प्रकार से पुत्र को उपदेश देकर मनु प्रसन्नता पूर्वक ब्रह्मलोक में चले गये ॥११॥ इसके बाद मैं कैसे पुत्रों को उत्पन्न करूँगा ? इस ट ८५०2

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