Srishti Khanda Extracted Page 497

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-497

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Sanskrit Original

डर श्रीपद्ममहापुराण कर्तु मुने मया शक्यं नचान्यस्तारयिष्यति । ऋते वै कुभयोनिं तं मैत्रावरुणसंभवम् ॥११९॥ अपृष्टोपि मया ब्रह्मन्नेवमूचे पितामहः । एवं ब्रुवाणं तं श्वेतमुक्तवानहमस्मि सः ॥१२०॥ आगतस्तव भाग्येन दृष्टोहं नात्र संशयः। ततः स्वर्गी स मां ज्ञात्वा दंडवत्पतितो भुवि॥१२९॥ तमुत्थाप्य ततो रामाब्रवंकिन्ते करोम्यहम् । राजोवाच आहारात्कुत्सिताद्ब्रहमंस्तारयस्वाद्य दुष्कृतात् ॥१२२॥ येन लोकोऽ क्षयः स्वर्गो भवितात्वत्कृते न मे । ततः प्रतिग्रहो दत्तो जगद्वंद्य नृपेण हि ॥१२३॥ भवान्मामनुणृह्णातु प्रतीच्छस्व प्रतिग्रहम् । इदमाभरणं सौम्य › ताराणार्थं द्विजोत्तम ॥१२४॥ ब्रह्मर्षे प्रतिगृह्णीष्व प्रसादं कर्तुमर्हसि। इहगाश्च सुवर्ण च धनं वस्त्रसमन्वितम् ॥९२५॥ भक्ष्यं भोज्यं च विप्रर्षे ददाम्याभरणं त्वहम् । सर्वकामप्रदं तुभ्यं सर्वान् भोगांश्च ते द्विज॥१२६॥ तारणे तु भवान्मह्यं प्रसादं कर्तुमर्हति। तस्याहंस्वर्गिणो वाक्यं श्रुत्वा दुः खसमन्वितम् ॥१२७॥ कृतामतिस्तारणाय नलोभाद्रघुनंदन । गृहीते भूषणे राम ममहस्तगते तदा ॥१२८॥ मानुषः पौर्विकोदेहस्तदानष्टोस्य भूपते । प्रणष्टे तु शरीरे च राजर्षिः परया मुदा ॥१२९॥ मयोक्तोऽसौ विमानेन जगाम त्रिदिवं पुनः । तेन मे शक्रतुल्येन दत्तमाभरणं शुभम्॥१३०॥ तस्मिन्निमित्ते काकुत्स्थ दत्तमद्धुतकर्मणा । श्वेतो वैदर्भको राजा तदाभूद्रतकल्मषः ॥१३१॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे रामागस्त्यसंवादो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥३६॥ — Arte अन्यथा (मिथ्या) ॥११८॥ करने में मैं समर्थ नहीं हूँ । मेरा उद्धार कुम्भयोनि तथा मित्रावरुण महर्षि अगस्त्य को छोड़कर दूसरा कोई नहीं कर सकता है ॥११९॥ हे ब्रह्मन् ! बिना पूछे भी ब्रह्माजी ने मुझे ऐसा बतलाया है । इसतरह से श्वेत के कहने पर मैंने कहा मैं ही वह अगस्त्य हूँ ॥१२०॥। तुम्हारे भाग्यवशात् मैं यहाँ आया हूँ और तुमने मुझे देखा है । उसके बाद वह स्वर्गी मुझे जानकर पृथिवी पर दण्ड के समान गिर पड़ा ॥१२१॥ उसके बाद उसे उठाकर मैंने पूछा तुम्हारा कौन सा उपकार करूँ । राजा ने कहा-- इस पाप जन्य निन्दित आहार से आप मेरा उद्धार करे ॥१२२॥ जिसके द्वारा वह स्वर्गी अक्षय स्वर्गलोक को प्राप्त कर सके, उसके लिए उस राजा ने मुझे यह दान दिया ॥१२३॥ और कहा आप मुझे अनुगृहीत करें और इस प्रतिग्रह को स्वीकार करें । हे सौम्य ! हे द्विजोत्तम! मुझे तारने के लिए इस आभरण कोहे ब्रहर्षे ! स्वीकार करें । मेरे ऊपर कृपा करें । यहाँ पर में गौ, सुवर्ण, धन, वस्र से युक्त ॥१२४॥ हे विप्रर्षे ! मैं भक्ष्य भोज्य तथा अभारण दे रहा हूँ । हे सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले द्विज आपको मैं भक्ष्य एवं भोगों को दे रहा हूँ ॥१२५-१२६॥ आप मेरे ऊपर कृपा करके मेरा उद्धार करें । उस स्वर्गी के दुःखपूर्ण वाक्य को सुनकर ॥१२७॥ लोभ के कारण नहीं अपितु उसका उद्धार करने के लिए, उस आमषूण को लेने का मैंने मन बनाया । इसतरह ये आभूषण मुझे मिले ॥१२८॥ हे राजन् ! उसी समय उसकापहले का मनुष्य शरीर विनष्ट हो गया उस शरीर के विनष्ट हो जाने पर अत्यन्त प्रसन्न होकर वह राजर्षि ॥१२९॥ मुझसे आज्ञा लेकर स्वर्ग चला गया । उस इन्द्र तुल्य स्वर्गी ने मुझे इस आभरण को दिया ॥१३०॥ उस अद्भुत कर्म करने वाले राजा ने मुझे इन आभरणों को दिया और वह श्वेत नामक विदर्भ देश का राजा निष्पाप हो गया ॥१३१॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के श्रीरामागस्त्यसंवाद नामक छत्तीसवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ३६।। te

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