Srishti Khanda Extracted Page 496
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-496
Sanskrit Original
भगवानति दुर्धर्षस्तदा कृच्छाद्विमोक्ष्यसे। सहि तारयितुं शक्तः सेद्रानपि सुरासुरान् ॥१०५॥ आहारं कुत्सितं चेमं राजर्षे किं पुनस्तव। सुरकार्यं॑महत्तेन सुकृतं तु महात्मना ॥१०६॥ उदधिं निर्जलं कृत्वा दानवाश्च निपातिताः । विंध्यश्चापिविद्वेषाद्दर्धमानो निवारितः ॥९०७॥ लंबमानामही चैषा गुरुत्वेनाधिवासिता । दक्षिणादिग्दिवंयाता त्रैलाक्यं विषमस्थितम् ॥१०८॥ मया गत्वा सुरैः सार्द्ध प्रेषितो दक्षिणां दिशम् । समां कुरुमहाभाग गुरुत्वेन जगत्समम् ॥९०९॥ एवं च तेन मुनिना स्थित्वासर्वा धरा समा । कृता राजेंद्र मुनिना एवमद्यापि दृश्यते ॥११०॥ सोहं भगवतः श्रुत्वा देवदेवस्य भाषितम् । भुंजे च कुत्सिताहारं स्वशरीरमतुत्तमम् ॥११९॥ पूर्ण वर्षशतं चाद्य भोजनं कुत्सितं च मे । क्षयं नाभ्येति तद्ठिप्र तृप्तिश्चापि ममोत्तमा ॥१९२॥ तं मुनिं कृच्छ्सन्तप्तश्चिंतयामि दिवानिशम् । कदा वै दर्शनं मह्यां स मुनिर्दास्यते वने ॥११३॥ एवं मे चितयानस्य गतं वर्षशतन्त्विह। सोगस्त्यो हि गतिर्ब्रह्मन्मुनिर्मे भविता ध्रुवम्॥९९४॥ न गतिर्भविता मह्यां कुम्भयोनिमृतेद्विजम् । श्रुत्वेत्थं भाषितं राम दृष्ट्वाहारं च कुत्सितम्॥९१५॥ कृपया परया युक्तस्तं नृपं स्वर्गगामिनम् 4 करोम्यहं सुधाभोज्यं नाशयामि च कुत्सितम् ॥११६॥ चिन्तयन्नित्यवोचं तमगस्त्यः किं करिष्यति । अहमेतत्कुत्सितं ते नाशयामि महामते॥११७॥ ईप्सितं प्रार्थयस्वास्मान्मनः प्रीतिकरं परम् । स स्वर्गी मां ततः प्राह कथं ब्रह्मवचोन्यथा॥११८॥ सौ वर्षों तक तुम अपने शरीर को खाओ उस समय महातपस्वी अगस्त्य श्वेतारण्य में आयेंगे ।।१०४।। भगवान् अगस्त्य दुर्धर्ष हैं, उन्हीं की कृपा से तुम्हे इस कष्ट से मुक्ति मिलेगी । वे समस्त इन्द्रादि देवताओं तथा असुरों का उद्धार करने में समर्थ हैं ॥१०५॥ उन महात्मा ने देवताओं के बड़े-बड़े कार्यों को किया हे । ऐसी स्थिति में तुम्हारे इस निन्दित आहार की कौन सी बात है ॥१०६॥ उन्होंने सागर को निर्जल बनाकर दानवों का विनाश किया, जिस समय सूर्य के विरोध के कारण उनका मार्ग रोकने के लिए विन्ध्याचल पर्वत दिन-रात बढ रहा था तो उन्होंने विन्ध्याचल को बढने से रोक दिया ॥१०७॥ जब पृथिवी लम्बा होती हुयी दक्षिण दिशा में आकाश को छूने लगी, उस समय त्रैलोक्य की विषम स्थिति हो गयी ॥१०८॥ उस समय देवताओं के साथ जाकर मैंने उन महर्षि को दक्षिण दिशा में भेजा । मैंने कहा कि हे महाभाग ! आप अपने गुरुत्व (भारीपन) के द्वारा पृथिवी को सम बना दें ॥१०९॥ इसतरह से मुनि के दक्षिण मे रह जाने से पृथिवी समतल हो गयी । हे राजेनद्र ! उन्हीं मुनि के द्वारा पृथिवी सम बना दी गयी और उसी तरह की आज भी दिखायी देती है ॥११०॥ इस तरह देवाराध्य ब्रह्माजी की बातों को सुनकर अपने इस अद्भुत शरीर रूपी निन्दित आहार का भोग करता हूँ ॥१११। आज इस निन्दित आहार को करते हुए सौ वर्ष बीत गये, फिर भी मेरे इस शरीर का क्षय नहीं होता है, और इसी से मेरी तृप्ति होती है ॥११२॥ विपत्ति से व्याकुल मैं रात-दिन उन महर्षि अगस्त्य का चिन्तन दिन रात करता हूँ । न जाने कब वे मुनि मुझे इस वन में दर्शन देंगे ॥११३।। इस तरह से सोचते हुए मेरे सैकड़ों वर्ष बीत गये हें । निश्चित रूप से आप मेरे गति स्वरूप अगस्त्य महर्षि ही हें ॥११५४॥ महर्षि कुम्भयोनि से भिन्न कोई दूसरा मेरा सहारा नहीं है हे राम ! राजा की उस वाणी को सुनकर और उनके निन्दित आहार को देखकर ॥११५॥ उस स्वर्ग जाने वाले राजा पर अत्यन्त करुणाक्रान्त होकर मैंने सोचा कि इसे अमृतभोजी बनाकर इसके इस निन्दित भोजन को विनष्ट कर दे रहा हूँ॥११६॥ मैंने राजा से कहा अगस्त्य क्या करेंगे ? हे महामते ! मैं तुम्हारे निन्दित आहार को नष्ट कर देता हूँ॥११७॥ जो तुम्हारे मन को अत्यन्त प्रिय लगे उसे तुम मुझसे माँगो उस स्वर्गी ने मुझसे कहा ब्रह्माजी की वाणी
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