Srishti Khanda Extracted Page 495
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-495
Sanskrit Original
सोऽहं निमित्ते कस्मिंश्चिद्वैराग्येण द्विजोत्तम । मरणं हृदये कृत्वा तपोवनमुपागमम् ॥८९॥ सोहं वनमिदं रम्यं भृशं पक्षिविवर्जितम् । प्रविष्टस्तप आस्थातुमस्यैव सरसोंतिके ॥९०॥ राज्येभिषिच्य सुरथं भ्रातरं तं नराधिपम्। इदं सरः समासाद्य तपस्तप्तं सुदारुणम् ॥९ १॥ दशवर्षसहस्राणि तपस्तप्त्वा महावने । शुभं तु भवनं प्राप्तो ब्रह्मलोकमनामयम् ॥९२॥ स्वस्थमपि मां ब्रह्मन्क्षुत्पिपासे द्विजोत्तम। अबाधेताम् भृशं चाहमभवं व्यथितेद्रियः ॥९३॥ ततस्ब्रिभुवनश्रेष्ठमवोचं वै पितामहम् । भगवन् स्वर्गलोकोऽयं क्षुत्पिपासाविवर्जितः ॥९४॥ कस्येयं कर्मणः पक्तिः क्षुत्पिपासे यतो हि मे। आहारः कश्च मे देव ब्रूहि त्वं श्रीपितामह ॥९५॥ ततः पितामहः सम्यक् चिरं ध्यात्वा महामुने। मामुवाच ततो वाक्यं नास्तिभोज्यं स्वदेहजम् ॥९६॥ ऋते ते स्वानि मांसानि भक्षय त्वं तु नित्यशः। स्वशरीरं त्वया पुष्टं कुर्वता तप उत्तमम् ॥९७॥ नादत्तं जायते तात श्वेत पश्य महीतले । आगहाद्धिक्षमाणाय भिक्षापि प्राणिने पुरा ॥९८॥ नहि दत्ता गृहे भ्रांत्या मोहादतिथये तदा । तेन स्वर्गगतस्यापि क्षुत्पिपासे तवाधुना ॥९-९॥ सत्वं प्रपुष्टमाहारैः स्वशरीरमनुत्तमम् । भक्षयस्व च राजेंद्र सा ते तृप्तिर्भविष्यति॥१००॥ एवमुक्तस्ततो देवं ब्रह्माणमहमुक्तवान् । भक्षिते च स्वके देहे पुनरन्यन्न मे विभो ॥१०१॥ क्षुधानिवारणं नैव देहस्यास्यविनौदनम् । खादमि ह्यक्षयं देव प्रियं मे नहि जायते ॥१०२॥ ततोब्रवीत्पुनर्ब्रह्मा तव देहोऽक्षयः कृतः । दिनेदिने ते पुष्टात्मा शवः श्वेत भविष्यति ॥९०३॥ यावद्वर्षशतं पूर्णस्वमांसं खाद भोनृप । यदागच्छति चागस्त्यः श्वेतारण्यं महातपाः ॥१०४॥ रहा था ॥८७॥ राज्य करते हुए और प्रजाओ का पालन करते हुए मेरे अनेक हजार वर्ष बीत गये ॥८८॥ वही मैं एक समय वैराग्य वशात् मृत्यु को ध्यान में रखकर तपोवन में चला गया ॥८९॥ मैं पक्षियों से रहित अत्यन्त मनोहर इस वन में इसी सरोवर के सन्निकट तपस्या करने के लिए आया ॥९०॥ मैंने राज्य पर अपने भाई सुरथ को अभिषिक्त करके उसे राजा बना दिया । इस सरोवर पर आकर अत्यन्त कठोर तप करने के लिए आया ।॥९१॥ इस महावन में दश हजार वर्ष तक तपस्या करके, ब्रह्माजी के निर्दोष शुभलोक में चला गया ॥९२॥ हे द्विजोत्तम उस स्वर्ग में भी मुझे भूख तथा प्यास पीडित करने लगे और मैं दुःखी हो गया ॥९३॥ उसके बाद त्रिभुवन में श्रेष्ठ ब्रह्माजी से मैने कहा हे भगवन् ! यह ब्रह्मलोक तो भूख तथा प्यास की बाधा से रहित हे ॥९४॥ यह किस कर्म का परिणाम है कि मुझको भूख-प्यास सता रहे हैं हे पितामह ! आप बतलाइये कि मेरा आहार क्या है 2॥९५॥ उसके बाद दीर्घकाल तक ध्यान करके ब्रह्माजी ने मुझे कहा कि तुम्हारे देह से उत्पन्न कोई भी भोज्य पदार्थ नहीं है॥९६॥ अतएव तुम प्रतिदिन अपने शरीर के ही मांस को खाया करो । उत्तम तप करते समय तुमने अपने शरीर को पुष्ट किया है ॥९७॥ हे वत्स श्वेत ! जो वस्तु भूलोक में नही दान दी जाती है, वह नहीं मिलती । तुमने आग्रहवशात् भिक्षा माँगने वाले प्राणी को भिक्षा भी नहीं दिया है तुमने किसी अतिथि को भ्रमवशात् भी भोजन नहीं दिया । इसीलिए स्वर्ग में आने पर भी तुमको भूख-प्यास सताते हैं ॥९८-९९। अतएव तुम पुष्ट बने हुए अपने शरीर को ही खाया करो । उसी से तुम्हें तृप्ति हो जाया करेगी ॥१००॥ इस प्रकार से मैने ब्रह्माजी से कहा हे विभो! अपना शरीर खा लेने पर मेरा दूसरा कोई भोज्य नहीं रहेगा ।।१०१।। ओदन के बिना इस देह से मेरे भूख की निवृत्ति नहीं हो सकती है । हे देव ! अक्षय शरीर को खाना मुझको प्रिय नहीं है ॥१०२॥ उसके बाद ब्रह्माजी ने कहा तुम्हारे शरीर को मैंने अक्षय बना दिया है । हे श्वेत तुम्हारा शव प्रतिदिन पुष्ट हो जाता रहेगा ॥१०३॥ हे राजन् !
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