Srishti Khanda Extracted Page 494
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-494
Sanskrit Original
अवश्यं तु मया ज्ञेया सरसोस्य विनिष्क्रिया । यावदेवं स्थितश्चाहं चिंतयानो रघूत्तम ॥७३॥ अथापश्यं मुहूर्तात्तु दिव्यमद्भुतदर्शनम् । विमानं परमोदारं हंसयुक्तं मनोजवम् ॥७४॥ पुरस्तत्र सहस्त्रं तु विमानेप्सरसां नृप। गंधर्वाश्चैव तत्संख्या रमयंति वरं नरम् ॥७५॥ गायंति दिव्यगेयानि वादयंति तथापरे। अथापश्यं नरं तस्माद्विमानादवरोहितम् ॥७६॥ शब मांसं भक्षयन्तं च स्नात्वा रघुकुलोद्दह । ततो भुक्त्वा यथा कामं स मांसं बहुपीवरम् ॥७७॥ अवतीर्यसरः शीघ्रमारुरोह दिवं पुनः। तमहं देवसंकाशं श्रिया परमयान्वितम्॥७८॥ भो भो स्वर्मिन् महाभाग पृच्छामि त्वां कर्थत्विदम् । जुगुप्सितस्तवाहारो गतिश्चेयं तवोत्तमा॥७९॥ यदि गुह्यं न चैतत्ते कथयत्वद्य मे भवान्। कामतः श्रोतुमिच्छामि किमेतत्परमं वचः ॥८०॥ को भवान् वद संदेहमाहारश्च विगर्हितः । त्वयेदं भुज्यते सौम्य किमर्थं क्व च वर्तसे ॥८९॥ कस्यायमैश्वरो भावः शवत्वेन विनिर्मितः । आहारं च कथं निद्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ॥८२॥ श्रुत्वा च भाषितं तत्र मम राम सतांवर । प्रांजलिः प्रत्युवाचेदं सस्वर्गी रघुनंदन ॥८ ३॥ शृणुष्वाद्य यथावृत्तं ममेदं सुखदुःखजम् । कामोहि दुरितक्रम्यः श्रृणु यत्पृच्छसे द्विज॥८ ४॥ पुरा वैदर्भको राज पिता मे हि महायशाः । वासुदेव इति ख्यातस्त्रिषु लोकेषु धार्मिकः ॥८ ५॥ तस्य पुत्रद्वयं ब्रह्मन् द्वाभ्यां स्त्रीभ्यामजायत । अहं श्वेत इति ख्यांतो यवीयान् सुरथो भवत् ॥८६॥ पितर्युपरते तस्मिन्पौरा मामभ्यषेचयन् । तत्राहं कारयन् राज्यं धर्मे चासं समाहितः ॥८७॥ एवं वर्षसहस्राणि बहूनि समुपाव्रजन्। मम राज्यं कारयतः परिपालयतः प्रजाः ॥८८॥ अतएव यह मुनि या राजा भी कैसे हो सकता है ?॥७१॥ अथवा यह कोई राजकुमार हो सकता है, किन्तु वह ऐसे मर कैसे सकता है ? यदि यह कल दिन में अथवा रात्रि में मरा होता अथवा प्रातःकाल मरा होता ॥७२॥ तो इसको में अवश्य देखा होता । हे रघूत्तम ! उसके एक मुहूर्त पश्चात् मैंने दिव्य तथा सुन्दर ऐसा एक विमान देखा जिसमें हंस लगे हुए थे । वह मन के समान तीव्र गती वाला विमान था ॥७४॥ हे राजन् ! उस विमान में हजारों अप्सराओं का गण था । उतनी ही संख्या में वहाँ गन्धर्व भी थे जो किसी श्रेष्ठ पुरुष का मनोरञ्जन कर रहे थे ॥७५॥ वे दिव्य गीत गा रहे थे तथा दिव्य वाद्य बजा रहे थे । उसके बाद मैंने देखा कि वह श्रेष्ठपुरुष उस विमान से उतरा ॥७६॥ वह स्नान करके उस शव के मांस को खा रहा था । वह उस खूब मोटे मांस को अपनी इच्छाभर खाकर ॥७७॥ शीघ्र ही सरोवर में स्नान करके स्वर्ग में चला गया । देवता के समान परमशोभा सम्पन्न उस पुरुष से मैने कहा ॥७८॥ ऐ. स्वर्ग में रहने वाले ! में तुमसे पूछता हूँ कि यह क्या बात है ? तुम्हारी गति तो उत्तम है, और तुम्हारा घृणित आहार है ॥७९॥ यदि यह कोई छिपाने वाली बात नहो तो मुझे इसका कारण बतलाओं । मैं अपनी इच्छानुसार सुनना चाहता हूँ । यह मेरी सत्य वाणी है ॥८०॥ आप कौन हैं । आपका यह निन्दित आहार है । हे सौम्य ! तुम इसे क्यों खाते हो तथा कहाँ रहते हो ?॥८ १॥ यह किसका ऐश्वर प्रभाव शव रूप से हो गया है । तुम्हारा आहार निन्दित क्यों है ? मैं इसे पूर्णरूप से सुनना चाहता हूँ ॥८२॥ हे सज्जन श्रेष्ठ श्रीराम ! मेरी वाणी सुनकर वह स्वर्गी हाथ जोड़कर कहा ॥८३॥ आप मेरे सुख एवं दुःख जन्य इतिहास को सुनें । हे द्विज ! यह पाप के कारण है, आप इसे सुने॥८४॥ प्राचीन काल में मेरे पिता विदर्भ देश के महायशस्वी राजा वासुदेव थे ।वे त्रैलोक्य विख्यात धार्मिक थे।८५॥ उनकी दो खियों से दो पुत्र उत्पन्न हुए । मेरा नाम श्वेत हुआ और मेरे छोटे भाई का नाम सुरथ था ॥८६॥ पिताजी की मृत्यु हो जाने पर नागारिकों ने मुझे राज्य पर अभिषिक्त कर दिया ।मैं सावधानी पूर्वक धार्मिक राज्य कर
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