Srishti Khanda Extracted Page 493

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-493

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Sanskrit Original

अधमं तहिजानीयात्सर्वशास्त्रेषु गर्हितम् । दिशः प्रकाशयेद्यत्तन्मध्यमं मुनिसत्तम॥५८॥ ऊर्ध्वगं त्रिशिखं यत्स्यादुत्तमं तदुदाहृतम् । एतान्युत्तमजातीनि ऋषिभिः कीर्तितानि तु ॥५९॥ आश्चर्याणां बहूनां हि दिव्यानां भगवान्निधिः। एवं वदति काकुत्स्थे मुनिर्वाक्यमथाब्रवीत् ॥६०॥ अगस्त्य उवाच शृणु राम पुरावृत्तं पुरा त्रेतायुगे महत् । द्वापरे समनुप्राप्ते वने यद्दृष्टवानहम् ॥६९॥ आश्चर्य सुमहाबाहो निबोध रधुनंदन। पुरा त्रेतायुगे ह्यासीदरण्यं बहुविस्तरम्॥६२॥ समंताद्योजनशतं मृगव्याघ्रविवर्जितम् । तस्मिन्नििष्पुरुषेऽ रण्ये चिकीर्षुस्तप उत्तमम् ॥६३॥ अहमाक्रमितुं सौम्य तदरण्यमुपागतः । तस्यारण्यस्य मध्यं तु युक्तं मूलफलैः सदा॥६४॥ शाकै बहुविधाकारै नानारूपैः सुकाननैः । तस्यारण्यस्य मध्ये तु पंचयोजनमायतम् ॥६५॥ हंसकारंडवाकीर्ण चक्रवाकोपशोभितम्। तत्राश्चर्यं मया दृष्टं सरः परमशोभितम् ॥६६॥ विसरिकच्छपाकीर्ण बकपंक्तिगणैर्युतम्। समीपे तस्य सरसस्तपस्तप्तुं गतः पुरा ॥६७॥ देशं पुण्यमुपेत्यैवं सर्वहिंसाविवर्जितम् । तत्राहमवसं रात्रिं नैदाघीं पुरुषर्षभ ॥६८॥ प्रभाते पुनरुत्थाय सरस्तदुपचक्रमे । अथापश्यं शवमहमस्पृष्टजरसं क्वचित् ॥६९॥ तिष्ठंतं परया लक्ष्म्या सरसो नाति दूरतः । तदर्थं चिंतयानोऽहं मुहूर्तमिव राघव ॥७०॥ अस्य तीरे न वै प्राणी कोवाप्येष सुरर्षभः । मुनिर्वा पार्थिवो वापि क्व मुनिः पार्थिवोपि वा ॥७१॥ अथवा पार्थिवसुतस्तस्यैवं संभवः कृतः । अतीतेऽहनि रात्रौ वा प्रातर्वापि मृतो यदि ॥७२॥ इसे किसने बनाया है 2॥५६॥ हे महामते ! में कुतृहलवशात् ही यह आपसे पूछ रहा हूँ । इसको हथेली पर रखने पर हथेली को यह प्रकाशित करता है ॥५७॥ जो रत्न नीचे की ओर प्रकाशित हो उसे अधम रत्न जानना चाहिए । वह सभी शास्त्रों में निन्दित रत्न होता है जो रत्न सभी दिशाओं को प्रकाशित करे वह मध्यम कोटि का होता है॥५८॥ हे मुनिश्रेष्ठ जो रत्न ऊपर की ओर तीन शिखाओं वाला हो वह उत्तम कोटि का कहा गया है । ये रत्न उत्तम जाति के है । यह ऋषियों के द्वारा वर्णित हैं ॥५९॥ ये आश्चर्यकारी दिव्य आभरण आपको कैसे मिले ? इसतरह से श्रीरामचन्द्रजी के पूछने पर महर्षि अगस्त्य ने कहा ॥६०॥ आगस्त्य महर्षि ने कहा- हे श्रीराम आप इसका इतिहास सुनें-- बीते हुए त्रेतायुग के अन्त में द्वापर युग के आने पर मैंने वन में जिस आश्चर्य को देखा उसे हे महाबाहो आप सुनें । प्राचीनकाल में एक बहुत बड़ा वन था ॥६१-६२॥ वह चारो ओर से सौ योजन में फैला था उसमें मृग, व्याघ्र इत्यादि कोई भी जीव नहीं थे । उस पुरुष रहित वन में उत्तम तप करने की इच्छा से ॥६३॥ हे सौम्य ! में गया उस अरण्य के बीच में सर्वदा रहने वाले मूलों तथा फलों से युक्त ।॥।६४।। अनेक प्रकार के शाकों तथा अनेक प्रकार के वनों से युक्त एक पाँच योजन विस्तृत ॥६५॥ हंसों, कारण्डवों तथा चक्रवाकों से सुशोभित अत्यन्त आश्चर्यमय सरोवर को मैंने देखा जो अत्यन्त सुन्दर था ॥६६॥ उसमें बड़े-बड़े कछुए थे । वहाँ बकों की पंक्ति सुशोभित होती थी । उसी सरोवर के पास मैं तपस्या करने के लिए गया ॥६७॥ इसतरह से सभी हिंसाओं से रहित उस पवित्र स्थान में आकर गर्मी के दिन में एक रात्रि को मैने निवास किया ॥६८॥ प्रातःकाल उठकर उस सरोवर पर मैं आया । वहाँ मैंने एक शव को देखा वह पूर्णरूप से जरा से रहित था ॥६९॥ अत्यन्त सुशोभित वह सरोवर के सन्निकट में ही पड़ा था हे राघव ! में उसके विषय में थोड़ी देर तक विचार करता रहा ॥७०॥ इस सरोवर के तीर पर न तो कोई प्राणी है, यह कोई श्रेष्ठ देवता है क्या ? यहाँ कोई मुनि अथवा राजा भी नहीं है,

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