Srishti Khanda Extracted Page 492

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-492

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Sanskrit Original

श्रेयसेऽस्मासु लोकेश पार्थिवं कुरु सांप्रतम् । यस्मिन्पूजां प्रयुंजाना: पुरुषा भुंजते महीम् ॥४२॥ ततो ब्रह्मासुरश्रेष्टो लोकपालान् सवासवान् । समाहूयाब्रवीत्सर्वास्तेजो भागोऽत्र युज्यताम् ॥४३॥ ततो ददुरलोकपालाश्चतुर्भागंस्वतेजसा । अक्षयश्च ततो ब्रह्मा यतो जातो क्षयो नृपः ॥४४॥ तं ब्रह्मा लोकपालानामंशं पुंसामयोजयत् । ततो नृपस्तदा तासां प्रजानां क्षेमपंडितः॥४५॥ तत्रैद्रेण तु भागेन सर्वानाज्ञापयेच्नपः । वारुणेन च भागेन सर्वान्पुष्णाति देहिनः ॥४६॥ कौबेरेण तथांशेन त्वर्थान् दिशति पार्थिवः। यश्च याम्यो नृपो भागस्तेन शास्ति च वै प्रजाः ॥४७॥ तत्र चैद्रेण भागेन नरेन्द्रोऽसि रघूत्तम । प्रतिगृह्णीष्वाभरणं तारणार्थे मम प्रभो॥४८॥ ततो रामः प्रजग्राह मुनैर्हस्तान्महात्मनः । दिव्यमाभरण चित्रं प्रदीप्तमिव भास्करम् ॥४९॥ प्रतिगृह्य ततोऽगस्त्याद्राघवः परवीरहा। निरीक्ष्य सुचिरं कालं विचार्य च पुनः पुनः ॥५०॥ मौक्तिकानि विचित्राणि धात्रीफलसमानि च । जांबूनदनिबद्धानि व्रविद्रुमनीलकैः ॥५ १॥ पद्मरागैः सगोमेधै वैंडूयैंः पुष्परागकैः । सुनिबद्धं सुविभक्तं सुकृतं विश्वकर्मणा ॥५२॥ दृष्ट्वा प्रीतिसमायुक्तो भूयश्चेदं व्यचिंतयत् । नेदूशानि च रत्नानि मया दृष्टानि कानिचित् ॥५३॥ उपशोभानि बद्धानि पृथ्वी मूल्यसमानि च । विभीषणस्य लंकायां न दृष्टनि मया पुरा ॥५४॥ इति सं चित्य मनसा राघवस्तमृषिं पुनः । आगमं तस्य दिव्यस्य प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥५५॥ अत्यद्भुतमिदं ब्रहमन्नप्राप्यं च महीक्षिताम् । कथं भगवता प्राप्तं कुतो वा केन निर्मितम् ॥५६॥ कुतूहलवशाच्चैव पृच्छामि त्वां महामते। करतले स्थिते रत्ने करमध्यं प्रकाशते ॥५७॥ के लिए ब्रह्माजी के पास गयीं और कहीं हे देवदेवेश देवताओं के राजा इन्द्र हैं ॥४१॥ हे देवेश ! हमलोगों का भी कल्याण करने के लिए आप राजा को प्रदान कीजिये । जिससे उसकी पूजा करके प्रजाएँ उसकी भूमि का उपभोग करें॥४२॥ उसके बाद देवताओ में श्रेष्ठ ब्रह्माजी ने इन्द्र इत्यादि लोकपालों को बुलाकर कहा । आपलोग अपने तेज का अंश प्रदान कीजिये ॥४३॥ उसके बाद लोकपालों ने अपने तेज का चतुर्थांश प्रदान किया वह तेज अक्षय हो गया। उससे अक्षय राजा हुए ॥४४॥ ब्रह्माजी ने लोकपालों के उस अंश को प्रजाओं को प्रदान कर दिया । उसी समय से राजा प्रजाओं का कल्याण करने में निपुण .होता है ॥४५।। उन चारो भागों में से राजा इन्द्र के भाग से प्रजाओं का प्रशासन करता है । वरुण के भाग से वह सबों का पोषण करता है ॥४६॥ कुबेर के अंश से राजा प्रजाओं को धन प्रदान करता है और यमराज के तेज के अंश से राजा प्रजाओं को दण्डित करता है ॥४७॥ राघव ! आप इन्द्र के तेज के भाग से राजा हैं । फलतः मुझको तारने के लिए आप. इस आभरण को स्वीकार कीजिये ॥४८॥ उसके बाद श्रीराम ने मुनि के हाथ से दिव्य तथा सूर्य के समान देदीप्यमान आभरण को स्वीकार किया ॥४९॥ शत्रुओं का विनाश करने वाले श्रीराम उसे लेकर उस आभरण को देर तक देखते रहे । बार-बार विचार कर ॥५०॥ धात्री फल के समान् अद्भुत मोतियों को जो सोने से मढी गग्री.थीं उन हीरे, मूंगों तथा नीलम, पद्मराग, गोमेद, वैदूर्य मणि, तथा पुष्पराग मणि से अच्छी तरह से विश्वकर्मा द्वारा निर्मित आभूषण को ॥५१-५२॥ देखकर श्रीरामचन्द्र अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक पुन: महर्षि अगस्त्य से पूछे मैंने इस'्रकार क्वा कोई भी रत्न नहीं देखा है ॥५३॥ उपशोभा से युक्त बने हुए, जो पृथिवी के मूल्य के समान मूल्यवान् हें, पहले कभी नहीं देखा ।॥५४।। इस तरह से मन में विचार करके श्रीराम मुनि से फिर उसकी भ्राप्ति का वृतान्त जानना चाहे ॥५५॥ उन्होंने कहा-- हे ब्रह्मन् ! यह आभरण अत्यन्त अद्भुत है, यह किसी राजा को नहीं मिल सकता है । आपने इसे कहाँ से और कैसे प्राप्त किया ?

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