Srishti Khanda Extracted Page 491

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-491

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Sanskrit Original

त्वं हि शक्तः परित्रातुं सेद्रानपि सुरोत्तमान् । तस्मात्प्रदास्ये विधिवत्प्रतीच्छस्व नरर्षभ ॥२८॥ अथोवाच महाबाहुरिक्ष्वाकूणां महारथः । कृतांजलिर्मुनिश्रेष्ठं स्वं च धर्ममनुस्मरन् ॥२९॥ प्रतिग्रहो वे भगवंस्तव मेऽत्र विगर्हितः । क्षत्रियेण कथं विप्र प्रतिग्राह्यं विजानता ॥३०॥ ब्राह्मणेन तु यहत्तं तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि । सपुत्रो गृहवानस्मि समर्थोस्मि महामुने॥३१॥ आपदा च न चाक्रांतः कथं ग्राह्यः प्रतिग्रहः । भार्या मे सुचिरं नष्टा न चान्या मम विद्यते ॥३ २॥ केवलं दोषभागी च भवामीह न संशयः । कष्टां चैव दशां प्राप्य क्षत्रियोपि प्रतिग्रही ॥३३॥ कुर्वन्नदोषमाप्रोति मनुरेवात्र कारणम् । बृद्धौ च मतापितरौ साध्वीभार्या शिशुः सुतः॥३४॥ अप्यकार्यशतं कृत्वा भर्तव्या मनुरब्रवीत् । नाहं प्रतीच्छे विप्रर्षे त्वया दत्तं प्रतिग्रहम् ॥३५॥ न च मे भवता कोपः कार्यो वै सुरपूजित ॥३६॥ अगस्त्य उवाच न च प्रतिग्रहे दोषो गृहीते पार्थिवै र्नृप। भवान्वै तारणे शक्तस्रैलोक्यस्यापि राघव ॥३७॥ तारय ब्राह्मणं राम विशेषेण तपस्विनम् । तस्मात्प्रदास्य विधिवत्प्रतीच्छस्व नराधिप ॥३८॥ राम उवाच क्षत्रियेण कथं विप्र प्रतिग्राह्यं विजानता । ब्राह्मणेन तु यद् दत्तं तन्मे त्वं वक्तुमर्हसि ॥३९॥ अगस्त्य उवाच आसीत्कृतयुगे राम ब्रह्मभूते पुरातने । अपार्थिवाः प्रजाः सर्वाः सुराणां च शतक्रतुः॥४०॥ ताः प्रजाः देवदेवेशं राजार्थं समुपागमन्। सुराणां विद्यते राजा देवदेवः शतक्रतुः ॥४९॥ कीजिये । बतलाया गया है कि दान में प्राप्त वस्तु को पुनः दान कर देने से बहुत बड़ा फल होता है ॥२७॥ आप इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं की भी रक्षा करने में समर्थ हैं, इसीलिए में इसे विधिपूर्वक आपको प्रदान करता हूँ, इसे आप स्वीकार करें ॥२८॥ इसके बाद अपने क्षात्रधर्म का स्मरण करते हुए, इक्ष्वाकुवंशीय महारथ महाबाहु श्रीरामजी ने कहा ॥२९॥ हे भगवन् ! आपसे दान लेना मेरे लिए निन्दित है । ज्ञानी क्षत्रिय किसी ब्राह्मण से दान कैसे ले सकता है ?॥३०॥ ब्राह्मण के द्वारा प्रदत्त किसी वस्तु को मैं कैसे ले सकता हूँ ? मैं पुत्रों वाला गृहस्थ हूँ । अतएव हे महामुने ! इसे आप ही बतलायें ॥३ १॥ मेरे ऊपर कोई विपत्ति भी नहीं आयी है अतएव में दान कैसे ले लूँ ?। मेरी पत्नी दीर्घकाल से नष्ट हो गयी है, मेरी कोई दूसरी पत्नी भी नहीं है ॥३२॥ ऐसा करके मैं केवल पाप को ही करने वाला बनूँगा । विपत्ति में पड़ा हुआ क्षत्रिय भी दान ले सकता है ॥३३॥ ऐसा करके वह पाप का भागी नहीं होता है । यह मनु ने कहा है । वृद्ध माता-पिता, साध्वी पत्नी तथा छोटे बच्चे का भरण पोषण अकार्य (पाप) करके भी किया जा सकता है; यह मनु ने कहा है । अतएव हे महामुने ! आपके द्वारा दिए जाने वाले दान को लेने में समर्थ नहीं हूँ ॥।३४-३५॥ हे सुरपूजित महर्षे ! आप मेरे ऊपर कोप नहीं करें ।।३६।। अगस्त्य महर्षि ने कहा-- हे राजन् ! राजाओं को दान लेने में कोई पाप नहीं है । हे राघव ! आप तो त्रैलोक्य का उद्धार करने में समर्थ हैं॥३७॥ हे श्रीराम ! आप इस तपस्वी ब्राह्मण का उद्धार करें । अतएव मैं आपको विधिपूर्वक प्रदान कर रहा हूँ और आप इसे स्वीकार करें । श्रीरामचन्द्र ने कहा-- ज्ञानी क्षत्रिय ब्राह्मण से दान कैसे ले सकता है ? ब्राह्मण ने किसी क्षत्रिय को दान दिया हो उसे आप मुझे बतलायें ॥३८-३९।। आगस्त्य महर्षि ने कहा-- ब्रह्म स्वरूप प्राचीन सत्ययुग मे सारी प्रजाएँ राजा से रहित थीं । देवताओं के राजा इन्द्र थे ॥४०॥ वे सभी प्रजाएँ राजा को प्राप्त करने

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