Srishti Khanda Extracted Page 490

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-490

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Sanskrit Original

उदयेन सहस्त्रांशो हिमं यद्वद्विलीयते । तद्दन्मेदुःखसंप्राप्तिः सर्वथा नाशमेष्यति ॥१४॥ दृष्ट्वा च देवान् संप्राप्तानगस्त्यो भगवानृषि:। अर्ध्यमादाय सुप्रीतः सर्वा्तानभ्यपूजयत् ॥१५॥ ते तु गृह्ण ततःपूजां संभाष्य च महामुनिम् । जग्मुस्तेन तदा ह्ृष्टा नाकपृष्ठं सहानुगाः ॥१६॥ गतेषु तेषु काकुत्स्थः पुष्पकादवरुह्य च । अभिवादयितुं प्राप्तः सोगस्त्यमृषिमुत्तमम् ॥१७॥ राजोवाच सुतो दशरथस्याहं भवंतमभिवादितुम् । आगतो वै मुनिश्रेष्ठ सौम्येनेक्षस्व चक्षुषा ॥१८॥ निर्धूतपापस्त्वां दृष्ट्वा भवामीह न संशयः । एतावदुक्त्वा समुनिमभिवाद्य पुनः पुनः ॥१९॥ कुशलं भृत्यवर्गस्य मृगाणां तनयस्य च । भगवहुर्शनाकांक्षी शूद्रं हत्वा त्विहागतः ॥२०॥ अगस्त्य उवाच स्वागतं ते रघुश्रेष्ठ जगद्वंद्यसनातन। दर्शनात्तवकाकुत्स्थ पूतोऽहं मुनिभिः सह ॥२९॥ त्वत्कृते रघुशार्दूल गृहाणार्घं महाद्युते। स्वागतं नरशार्दूल दिष्ट्या प्राप्तोसि शत्रुहन् ॥२२॥ त्वं हि नित्यं बहुमतो गुणैर्बहुभिरुत्तमैः । अतस्त्वं पूजनीयो वै मम नित्यं हृदि स्थित: ॥२३॥ सुरा हि कथयन्ति त्वां शूद्रघातिनमागतम् । ब्राह्मणस्य च धर्मेण त्वया वै जीवितः सुतः॥२४॥ उष्यतां चेह भगवन् सकाशे मम राघव। प्रभाते पुष्पकेणासि गंतायोध्यां महामते ॥२५॥ इदं चाभरणं सौम्य सुकृतं विश्वकर्मणा । दिव्यं दिव्येन वषुषा दीप्यमानं स्वतेजसा ॥२६॥ प्रतिगृह्णीष्व राजेन्द्र मत्त्रियं कुरु राघव । लब्धस्य हि पुनदनि सुमहत्फलमुच्यते॥२७॥ में स्थित हैं ॥१२॥ जगत् का कल्याण करने वाले मुनि का दर्शन करने से मेरे दुःख का विनाश होगा ॥१३॥ जिस तरह सूर्योदय के होने से अंधकार का विनाश हो जाता है, उसी तरह से महर्षि का दर्शन करने से मेरे दु:ख का नाश होगा ॥१४॥ आये हुए देवताओं को देखकर भगवान् अगस्त्य ऋषि ने अत्यन्त प्रसन्नता पूर्वक उन सबों को अर्घ्य प्रदान करके उन सबों की पूजा की ॥१५॥ वे वहाँ पर महर्षि से पूजा प्राप्त करके तथा महर्षि से बातें करके, प्रसन्नता पूर्वक स्वर्ग लोक चले गये ॥१६॥ उन देवताओं के चले जाने पर ककुत्स्थ वंशावतंस श्रीरामचन्द्रजी पुष्पक विमान से उतर कर ऋषियों में श्रेष्ठ महर्षि अगस्त्य के पास उन्हें प्रणाम करने के लिए गये ॥१७॥ राजा श्रीराम ने कहा-- हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं दशरथ का पुत्र हूँ आपको प्रणाम करने के लिए आया हूँ, मुझे प्रसन्नता पूर्वक देखें । १८॥ आपका दर्शन करके मैं निश्चित रूप से निष्पाप हो जाऊंगा, यह कहकर उन्होंने मुनि का बारम्बार अभिवादन किया॥१९॥ आपके शिष्यों का तथा मृगशावकों का कुशल एवं आपका दर्शन करने की आकांक्षा से शूद्र का वध करके में आया हूँ ॥२०॥ अगस्त्य महर्षि ने कहा-- हे जगद्वंद्य रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्र ! आपका स्वागत है । आपका दर्शन करकेमं मुनियों के साथ पवित्र हो गया । हे महामते ! आपके लिए यह अर्घ्य है आप इसे स्वीकार करें । हे शत्रुओं का विनाश करने वाले नरश्रेष्ठ ! मेरे सौभाग्य से आप पधारे हैं ॥२१-२२॥ आप सदा अनेक उत्तम गुणों से सम्पन्न होने के कारण सबों को अत्यन्त प्रिय हैं । यद्यपि आप मेरे हृदय में निवास करते हैं, फिर भी आप मेरे लिए पूजनीय हैं ॥२३॥ देवताओं ने मुझे बतलाया है कि शूद्र को मारने वाले आप आये हुए है आपने धर्म के द्वारा ब्राह्मण के पुत्र को जीवित कर दिया है ॥२४॥ हे राघव ! आज आप रात्रि में मेरे पास ही निवास कीजिये । हे महामते ! आप प्रातःकाल पुष्पक द्वारा अयोध्या जाइयेगा ॥२५॥ हे सौम्य ! अपने दिव्य शरीर से देदीप्यमान, इस देदीप्यमान दिव्य आभूषण को विश्वकर्मा ने अपने तेज से निर्माण किया था ॥२६॥ हे राघव ! मेरा कल्याण कीजिये, इसे आप स्वीकार NN

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