Srishti Khanda Extracted Page 489
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-489
Sanskrit Original
श्रीपद्यमहापुणण छत्तीसवाँ अध्याय पुलस्त्य उवाच ततो देवाः प्रयातास्ते विमानै बृहुभिस्तदा। रामोप्यनुजगामाशु कुं भयोनेस्तपोवनम्॥१॥ उक्तंभगवता तेन भूयोप्यागमनं क्रियाः । पूर्वमेव सभायां च यो मां द्रष्टुं समागतः ॥२॥ तदहं देवतादेशात्तत्कार्यार्थे महामुनिम् । पश्यामि तं मुनिं गत्वा देवदानवपूजितम् ॥३॥ उपदेशं चमे तुष्ट: स्वयं दास्यति सत्तमः । दुःखी येन पुनर्मत्ये न भवामि कदाचन ॥४॥ पिता दशरथो मह्यं कौसल्या जननी तथा। सूर्यवंशे समुत्पन्न स्तथाप्येवं सुदुःखितः ॥५॥ राज्यकाले वने वासो भार्यया चानुजेन च। हरणं चापि भार्याया रावणेन कृतं मम ॥६॥ असहायेन तु मया तीर्त्वा सागरमुत्तमम् । रुद्धां तु तां पुरीं सर्वा कृत्वा तस्य कुलक्षयम्॥७॥ दृष्टा सीता मया त्यक्ता देवानां तु पुरस्तदा । शुद्धांतां मां तथोचुस्ते मया सीता तथा गृहम् ॥८॥ समानीता प्रीतिमता लोकवाक्याद्विसर्जिता । वने वसति सा देवी पुरे चाहं वसामि वै ॥९॥ जातोहमुत्तमे वंशे उत्तमोहं धनुष्मताम्। उत्तमं दुःखमापन्नो हृदयं नैव भिद्यते॥१०॥ वञ्जसारस्य सारेण धात्राहं निर्मितो ध्रुवम् । इदानीं ब्राह्मणादेशाद््रमामि धरणीतले ॥९९॥ तपःस्थितस्तु शूद्रोऽसौ मया पापो निपातितः। देववाक्यात्तु मे भूयः प्राणो मे हृदि संस्थितः ॥९२॥ पश्यामि तं मुनिं वद्यं जगतोऽस्य हितेरतम् । दृष्टेन मे तथा दुःखं नाशमेष्यति सत्वरम् ॥१३॥ श्रीरामचन्द्रजी का अगस्त्य आश्रम में जाना, रामागस्त्य संवाद, अक्षयराज की कथा, महर्षि अगस्त्य के द्वारा प्रदत्त आभरण को श्रीरामचन्द्रजी का लेना, श्रेतराज की कथा पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- उसके बाद सभी देवता अनेक विमानों से चले गये उनके जाने के बाद श्रीरामचन्द्र भी शीघ्र ही महर्षि अगस्त्य के तपोवन में गये ॥१॥ उन्होंने सोचा भगवान् अगस्त्य जब मुझे देखने के लिए अयोध्या में आये थे उस समय वे मेरी सभा में ही कहे थे कि तुम मेरे आश्रम में पुनः आना ॥२॥ मैं देवता के आदेश से देवताओं का कार्य करने के लिए यहाँ आया हूँ, अतएव देवों एवं दानवों से पूजित उन महामुनि का दर्शन कर लूँ ॥३॥ प्रसन्न होकर वे महर्षि मुझे उपदेश देंगे, जिसके कारण में पुन: दु:खी नहीं होऊँगा, क्योंकि में मनुष्य हूँ ॥४॥ मेरे पिता महाराज दशरथ हैं, मेरी माता कौसल्या हैं ।मेरा जन्म सूर्यवंश में हुआ है फिर भी मैं इतना अधिक दुःखी हूँ ॥५॥ जब राज्य करने की बेला थी तो उस समय मुझे पत्नी तथा अनुज के साथ वन में रहना पड़ा और रावण ने मेरी पत्नी का अपहरण कर लिया ॥६॥ बिना किसी की सहायता के मैंने सागर पार करके उसकी नगरी को घेरकर उसके वंश का विनाश किया ॥७॥ जब सीता मेरे सामने आयी तो मैंने उसका परित्याग देवताओं के सामने कर दिया । उस समय सभी देवताओं ने मुझे कहा कि सीता शुद्ध है तब मैं सीता को अपने घर लाया॥८॥ उसके प्रति प्रेम युक्त होने पर भी संसार के कहने से मैंने उसका परित्याग कर दिया । वह देवी इस समय वन में निवास कर रही है, और में नगर में रहता हूँ ॥९॥ मेरा जन्म उत्तम वंश में हुआ है, धनुर्धारियों में में उत्तम हूँ ।मैंने उत्तम दुःख भी प्राप्त किया फिर भी मेरा हृदय विदीर्ण नहीं होता है ॥१०॥ निश्चित रूप से ब्रह्माजी ने मेरा निर्माण वज्रसार के सार अंश से किया है । इस समय मैं ब्राह्मण के आदेश से धरणीतल पर श्रमण कर रहा हूँ ॥११॥ यह शूद्र तपस्या करता था मैं पापी हूँ अतएव उसको मैंन मारा । फिर भी देवताओं के वाक्यानुसार मेरा प्राण मेरे हृदय
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