Srishti Khanda Extracted Page 487

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-487

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Sanskrit Original

अहं दाशरथी राम: पृच्छामि त्वां कुतूहलात् । कोऽर्थो व्यवसितस्तुभ्यं स्वर्गलोकोऽ थवेत्तर: ॥७१॥ किमर्थ तप्यसे वा त्वं श्रोतुमिच्छामि तापस । ब्राह्मणो वासि भद्रं ते क्षत्रियो वाथदुर्जयः॥७२॥ वैश्यस्तृतीयवर्णो वा शूद्रो वा सत्यमुच्यताम् । तपः सत्यात्मकं नित्यं स्वर्गलोक परिग्रहे ॥७३॥ सात्विक राजसं चैव तच्च सत्यात्मकं तपः । जगदुपकारहेतुर्हि सृष्टं तद्वै विरिंचिना ॥७४॥ रौद्रं क्षत्रियतेजोजं तत्तुराजसमुच्यते । परस्योत्सादनार्थाय तच्चासुरमुदाहृतम् ॥७५॥ अंगानि निहुते यो वा असृग्दिग्थानि भागशः । पंचाग्निं साधयेद्वापि सिद्धिं वा मृत्युमेव वा ॥७६॥ आसुरो होष ते भावो न च मेत्वं द्विजो मतः । सत्यं ते वदतः सिद्धिरनृते नास्ति जीवितम् ॥७७॥ तस्य तद्भाषितं श्रुत्वा रामस्याक्लिष्टकर्मणः । अवाकशिरास्तथाभूतो वाक्यमेतदुवाच ह ॥७८॥ शूद्रतापस उवाच स्वागतं ते नृपश्रेष्ठ चिराद्दृष्टोसि राघव । पुत्रभूतोस्मि ते चाहं पितृभूतोसि मेऽनघ ॥७९॥ अथवा नैतदेवं हि सर्वेषां नृपतिः पिता । स त्वमच्योंऽसि भो राजन् वयं ते विषये तप:॥८ ०॥ चरामस्तत्र भोगोस्ति पूर्व सृष्टः स्वयंभुवा । नथन्याः स्मो वयं राम धन्यस्त्वमसि पार्थिव ॥८ १॥ यस्य ते विषये ह्योवं सिद्धिमिच्छंति तापसाः । तपसा त्वं मदीयेन सिद्धिमाप्ुहि राघव ॥८२॥ यदेतद्भवता प्रोक्तं योनौ कस्यां तु ते तप: । शूद्रयोनिप्रसूतोहं तप उग्रं समास्थितः ॥८३॥ देवत्वं प्रार्थये रामस्वशरीरेण सुब्रत । न मिथ्याहं वदे भूप देवलोकजिगीषया॥८ ४॥ पुलस्त्य उवाच शूद्रं मां विद्धि काकुत्स्थ शंबूकं नाम नामतः । भाषतस्तस्य काकुत्स्थः खङ्गं तु रुचिरप्रभम् ॥८५॥ आप किस योनि में तप की वृद्धि कर रहे हो ॥७०॥ में दशरथ पुत्र राम हूँ कौतूहलवशात् पूछ रहा हूँ । तुम किसलिए तपस्या कर रहे हो ? स्वर्ग की प्राप्ति के लिए अथवा किसी अन्य प्रयोजन से ॥७१॥ तुम किस प्रयोजन से तपस्या करते हो उसे मैं जानना चाहता हूँ । तुम यदि ब्राह्मण हो तो तुम्हारा कल्याण हो, अथवा दुर्जय क्षत्रिय हो॥७२॥ या तुम तृतीय वर्ण के वैश्य हो या शूद्र हो, मुझे सत्य बतलाओ । स्वर्गलोक में तपस्या सदा सत्यात्म रूप से परिगृहीत है ॥७३॥ वह सत्य स्वरूप तीन प्रकार का होता है, सात्त्विक, राजस एवं तामस । ब्रह्माजी ने जगत् का कल्याण करने के लिए सात्त्विक एवं राजस तप को बनाया है ॥७४॥ क्षत्रिय तेज से युक्त होकर भयङ्कर तप होता है, वह राजस तप है । दूसरे को दुःख देने के लिए किया जाने वाला तप तामस कहलाता है ॥७५॥ उसमें खून से लथपथ अङ्गां को टुकड़े-टुकड़े काटा जाता है, अथवा पञ्चाग्नि की सिद्धि की जाती है, अथवा मृत्यु की सिद्धि की जाती है ॥७६॥ मुझे तुम्हारा अभिप्राय आसुर प्रतीत होता है, अतएव तुम ब्राह्मण तो नहीं ही हो । यदि तुम सत्य बोलोगे तो तुम्हे सिद्धि की प्राप्ति होगी और यदि झूठ बोलते हो तो तुम जीवित नहीं रहोगे ॥७७॥ अक्लिष्ट कर्म कर्ता श्रीराम की बातें सुनकर, नीचे शिर किए हुए ही उसने कहा ॥७८॥ हे श्रीराम आपका स्वागत है, आप बहुत समय बाद दर्शन दिए हैं । आप मेरे पिता स्वरूप हें में आपका पुत्र स्वरूप हुँ ।।७९।। अथवा ऐसी बात नहीं है, राजा तो सबों का पिता होता है हे राजन् ! आप पूजनीय हैं । मैं आपके राज्य में तप कर रहा हूँ ॥८०॥ हम जो कुछ भी करते हैं, उसका एक भाग ब्रह्माजी ने राजा का बनाया है । हे राम ! मैं धन्य नहीं हुँ धन्य तो आप हैं॥८ १॥ क्योंकि आपके राज्य में तपस्वीजन इस प्रकार से सिद्धि प्राप्त करना चाहते हें । हे राधव ! मेरी तपस्या से आप सिद्धि प्राप्त करें ॥८२॥ आपने यह जो पूछा है कि किस योनि में तुम तप की वृद्धि करते हो तो मैं शूद्र योनिमें उत्पन्न हुआ हूँ और उग्र तपस्या कर रहा हूँ ॥८३॥ मैं अपने इसी शरीर से देवत्व प्राप्त करना चाहता हूँ । हे राजन् ! मैं मिथ्या नहीं कह रहा हूँ, मैं देवलोक प्राप्त करना चाहता हूँ ॥८४॥ हे काकुत्स्थ मुझे आप शम्बूक नाम का शूद्र जानें इसतरह से उसके कहते ही चमकते हुए खड्ग को ॥८५॥ म्यान से निकालकर श्रीराम ने उसके शिर

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