Srishti Khanda Extracted Page 486

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-486

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Sanskrit Original

राम उवाच प्रहर्षमतुलं लेभे लक्ष्मणं चेदमब्रवीत्। गच्छ सौम्यद्विजश्रेष्ठं समाश्वासय लक्ष्मण ॥५७॥ बालस्य च शरीरं त्वं तैलद्रोण्यां निधापय। गंधैश्च परमोदारै स्तैलैश्चैव सुगंधिभिः॥५८॥ यथा नशीर्यते बालस्तथा सौम्य विधीयताम्। यथाशरीरं गुप्तं स्याद्वालस्याक्लिष्टकर्मणः ॥५९॥ पुलस्त्य उवाच विपत्तिः परिभेदो वा न भवेत्तत्तथा कुरु । तथा संदिश्य सौमित्रं लक्ष्मणं शुभलक्षणम् ॥६०॥ मनसा पुष्पकं दध्यावागच्छेति महायशाः । इंगितं तत्तु विज्ञाय कामगं हेमभूषितम् ॥६१॥ आजगाम मुहुर्ततात्तु समीपं राघवस्य हि । सोऽब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यमहमस्मि नराधिप ॥६२॥ अग्रे तव महाबाहो किंकरः समुपस्थितः। भाषितं सुचिरं श्रुत्वा पुष्पकस्य नराधिप ॥६३॥ अभिवाद्य महर्षीस्तान्विमानं सोध्यरोहत । धनुर्गृहीत्वा तूणौ च खङ्गं चापि महाप्रभम् ॥६४॥ निक्षिप्य नगरे वीरौ सौमित्रिभरतावुभौ । प्रायात्प्रतीचीं त्वरितो विचिन्वन्सुसमाहितः ॥६५॥ उत्तरामगमत्पश्चाद्दिशं हिमवदाश्रिताम् । पूर्वामपि दिशं गत्वा तथापश्यन्नराधिपः ॥६६॥ सर्वा शुद्धसमाचारामादर्शमिव निर्मलाम् । ततो दिशं समाक्रामद्दक्षणां रघुनंदनः ॥६७॥ शैलस्य उत्तरे पार्श्वे ददर्श सुमहत्सरः । तस्मिन्सरसि तप्यन्तं तापसं सुमहत्तपः ॥६८॥ ददर्श राघवो भीमं लंबमानमधोमुखम् । तमुपागम्यकाकुत्स्थस्तप्यमानं तु तापसम् ॥६९॥ उवाच राघवो वाक्यं धन्यस्त्वममरप्रभ । कस्यां योनौ तपो वृद्धिर्वर्तते दृढनिश्चय॥७०॥ वृद्धि होगी और उस बालक की भी वृद्धि होगी ॥५५॥ वह बालक भी जीवित हो जायेगा । नारदजी के द्वारा इस तरह से कहने पर श्रीरामचन्द्र आश्चर्य चकित हो गये ॥५६॥ वे अत्यन्त प्रहृष्ट होकर लक्ष्मणजी से कहे-- हे सौम्य! तुम उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के पास जाओ और उसे आश्वासन प्रदान करे ॥५७॥ बालक के शरीर को तेल के नाव में रखवा दो । अच्छे सुगन्धित द्रव्यों तथा सुगन्धित तेलों से भर कर ऐसा प्रयास करना चाहिए कि वह बालक का शरीर सड़ने न पाये । अक्लिष्ट कर्म करने वाले बालक का शरीर अच्छी तरह से सुरक्षित रहे ॥५८-५९॥ जिस तरह से इस विपत्ति का प्रभाव न हो सके वैसा करो । इस तरह से सुन्दर लक्षण वाले लक्ष्मण को इस प्रकार का आदेश देकर ॥६०॥ महायशस्वी श्रीरामचन्द्र ने मन से ध्यान किया कि पुष्पक विमान आ जाय । भगवान् श्रीराम के ईशारे को जानकर वह कामग सुवर्णालङ्कृत पुष्पक विमान एक मुहूर्त में ही वहाँ श्रीरामजी के पास आ गया । उसने हाथ जोड़कर कहा राजन् में आ गया हूँ ॥६१-६२॥ हे महाबाहो ! आपके सामने दास उपस्थित है । हे भीष्म ! पुष्पक की वाणी सुनकर ॥६३॥ श्रीरामचन्द्रजी उन महर्षियों को प्रणाम करके उस विमान पर बैठ गये । वे अपने साथ धनुष दो तुणीर तथा चमचमाता हुआ खड्ग लिए हुए थे ॥६४॥ नगर की रक्षा का भार भरतजी तथा लक्ष्मणजी को सौंप कर वे शीघ्र ही सावधानी पूर्वक पश्चिम दिशा में खोजते हुए गये ॥६५॥ उसके बाद हिमालय के अन्तर्गत आने वाले उत्तर दिशा में गये उसके बाद वे राजा श्रीराम पूर्व दिशा में भी उसी तरह देखते हुए गये ॥६६। उन्होंने सम्पूर्ण धरती को दर्पण के समान स्वच्छ देखा । उसके बाद श्रीरामचन्द्रजी दक्षिण दिशा में गये ॥६७॥ उन्होंने पर्वत के उत्तर दिशा में एक महान् सरोवर को देखा, उस सरोवर में घोर तपस्या करते हुए एक तपस्वी को उन्होंने देखा॥६८॥ वहाँ पर उन्होंने नीचे मुँह करके लटकते हुए भयंड्कर तपस्वी को देखा । तपस्या करने वाले तपस्वी के पास श्रीरामचन्द्रजी आये ॥६९॥ श्रीराम ! ने कहा तुम धन्य हो तुम्हारी कान्ति देवता के समान है । हे दृढनिश्चय !

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