Srishti Khanda Extracted Page 485
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-485
Sanskrit Original
प्राणानहंजुहोम्यग्रौ पर्वताद्वा पते ह्यहम् । कथं शुद्धिमहं यामि श्रुत्वा ब्राह्मणभाषितम् ॥४२॥ वसिष्ठस्याग्रतः स्थित्वा राज्ञो दीनस्य नारदः। प्रत्युवाच श्रुतं वाक्यमृषीणां सन्निधौ तदा॥४३॥ शृणु राम यथाकालं प्राप्तो वै बालसंक्षयः । पुरा कृतयुगे राम सर्वत्र ब्राह्मणोत्तरम्॥४४॥ अब्राह्मणो न वै काश्चित्तपस्तपति राघव । अमृत्यवस्तदा सर्वे जायंते चिरजीविनः ॥४५॥ त्रेतायुगे पुनः प्राप्ते ब्रह्मक्षत्रमनुत्तमम् । अधर्माद्वापरे तेषां वैश्यान् शूद्रास्तथा विशत् ॥४६॥ एवं निरंतरं जुष्टमुद्धूतमनृतं पुनः । अधर्मस्य त्रयः पादा एको धर्मस्य चागतः ॥४७॥ ततः पूर्वे भृशं त्रस्तावर्णा ब्राह्मण पूर्वकाः। भूयः पादस्तु धर्मस्य द्वितीयः समपद्यत॥४८॥ तस्मिन्द्वापरसंज्ञे तु तपो वैश्यं समाविशत्। युगत्रयस्यवै धर्म्य धर्मस्य प्रतितिष्ठति ॥४९॥ कलि सज्ञे ततः प्राप्ते वर्तमाने युगेंतिमे । अधर्मश्चानृतं चैव ववृधाते नरर्षभ ॥५०॥ भविता शूद्रयोन्यां तु तपश्चर्या कलौ युगे । स ते विषयपर्यते राजन्नुग्ररं तप: ॥५१॥ शूद्रस्तपति दुर्बुद्धिस्तेन बालवधः कृतः । यस्याधर्ममकार्यं वा विषये पार्थिवस्य हि ॥५२॥ पुरे वा राजशार्दूल कुरूते दुर्मतिर्नरः । क्षिप्रं स॒ नरकं याति यावदाभूतसंप्लवम् ॥५३॥ चतुर्थ तस्य पापस्य भागमश्चाति पार्थिवः । सत्त्वं पुरुषाशार्दूल गच्छस्व विषयं स्वकम् ॥५४॥ दुष्कृतं यत्र पश्येथास्तत्र यत्नं समाचर एवं ते धर्मवृद्धिश्च बलस्य वर्धनं तथा॥५५॥ पुलस्त्य उवाच भविष्यति नरश्रेष्ठ बालस्यास्य च जीवनम् । नारदेनैवमुक्तस्तु साश्चर्यो रघुनंदनः ॥५६॥ बातों को सुनकर उस ब्राह्मण को चुप कराकर महर्षि वसिष्ठ से पूछा कि ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए?।।३९-४१॥ में अपने प्राणों को अग्नि में होम कर दूँगा अथवा पर्वत से मैं कूद पडूगा, इस ब्राह्मण की बातों को सुनकर मैं कैसे शुद्ध हो सकता हूँ ॥४२॥ जिस समय महर्षि वसिष्ठ के सामने खड़े होकर दीन भाव से श्रीरामचन्द्रजी इन बातों को कह रहे थे उसी समय नारदजी ने ऋषिड़ेरकी वाणी को सुनकर कहा ॥४३॥ हे श्रीराम! बालक के काल कवलित होने का कारण आप सुनें । पहले सत्ययुग में सर्वत्र ब्राह्मण ही तपस्या करते थे । ब्राह्मण से भिन्न वर्ण का कोई कहीं तपस्या नहीं करता था, उस समय सभी दीर्घायु होते थे, किसी की अकालमृत्यु नहीं होती थी ॥४४-४५॥ त्रेतायुग में फिर ब्राह्मण और क्षत्रिय तपस्या करने लगे, द्वापर युग में अधर्म वैश्य और शूद्रं में प्रवेश कर गया ॥४६॥ इसतरह से सदा होते रहने से अनृत (अधर्म) उत्पन्न हुआ । अधर्म के तीन चरण और धर्म का एक चरण हो गया ॥४७॥ इसतरह पहले ब्राह्मण आदि वर्ण बहुत अधर्म से भयभीत रहते थे । उसके बाद धर्म का दूसरा चरण भी हो गया ॥४८॥ उस द्वापर नामक युग में तपस्या वैश्यों में भी प्रवेश कर गयी । तीनों युगों की विधर्मता ही धर्म की विरोधिनी हो गयी ॥४९॥ हे नरश्रेष्ठ ! अन्तिम युग कलियुग के आने पर अधर्म और अनृत (मिथ्याभाषित्व) दोनों बढ जाते हैं ॥५०॥ कलियुग में तपश्चर्या शूद्रयोनि में चली जायेगी । आपके राज्य की सीमा में हे राजन् ! कोई शूद्र उग्र तपस्या कर रहा है ॥५१॥ उस दुष्टबुद्धि के ही कारण बालक की अकाल में मृत्यु हुयी है । जिस राजा के राज्य में, अथवा नगर में अधर्म अथवा अकार्य कोई दुष्ट व्यक्ति करता है, हे नरश्रेष्ठ ! वह राजा शीघ्र ही नरक में चला जाता है और वहाँ प्रलयकाल पर्यन्त उसे यातना भोगनी पड़ती है ॥५२-५३॥ क्योंकि उस दुष्ट व्यक्ति के द्वारा किए गये पाप का चतुर्थांश राजा को भोगना पड़ता है । अतएव हे नरश्रेष्ठ ! आप अपने राज्य में जाइये ॥५४॥ जहाँ कहीं भी आप पाप देंखें, वहाँ उसे आप रोकने का प्रयास करें । ऐसा करने से आपके धर्म की
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