Srishti Khanda Extracted Page 484

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-484

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Sanskrit Original

दिष्ट्या वर्धसि काकुत्स्थ जयेनामितविक्रम । दृष्टस्संभाषितश्चासि यास्यामश्चाश्रमान् स्वकान् ॥२७॥ अरण्यं ते प्रविष्टस्य मया चेंद्रशरासनम् । अर्पितं चाक्षयौ तूणौ कवचं च परंतप ॥२८॥ भूयोप्यागमनं कार्यमाश्रमे मे रघूद्रह । एवमुक्त्वा तु ते सर्वे मुनयों तर्हिताभवन्॥२९॥ गतेषु मुनिमुख्येषु रामो धर्मभृतांवरः । चिंतयामास तत्कार्यं किंस्यान्मे मुनिनोदितम् ॥३०॥ | भूयोप्यागमनं कार्यमाश्रमे रघुनंदन । अवश्यमेव गंतव्यं मयागस्त्यस्य सन्निधौ ॥३१॥ श्रोतव्यं देवगुह्यं तु कार्यमन्यच्च यद्वदेत् । एवं चिंतयतस्तस्य रामस्यामिततेजसः ॥३२॥ करिष्ये नियतं धर्म धर्मो हि परमागतिः । स तु वर्ष सहस्राणि दश राज्यकारयत् ॥३३॥ ददतो जुह्ृतश्चैव जग्मुस्तान्येकवर्षवत् । प्रजाः पालयतस्तस्य राघवस्य महात्मन: ॥३४॥ एतस्मिन्नेव दिवसे वृद्धो जानपदो द्विजः । मृतं पुत्रमुपादाय रामद्वारमुपागतः ॥३५॥ उवाच विविधं वाक्यं स्रेहाक्षरसमन्वितम् । दुष्कृतं किंन्नुमे पुत्र पूर्वदेहांतरे कृतम्॥३६॥ । त्वामेकपुत्रं यदहं पश्यामि निधनं गतम् । अप्राप्तयौवनं बालं पंचवर्ष गतायुषम् ॥३७॥ अकाले कालमापन्नं दुःखाय मम पुत्रक । अकृत्वापितृकार्याण गतो वैवस्वतक्षयम् ॥३८॥ रामस्य दुष्कृतं व्यक्तं येन ते मृत्युरागतः । बालवध्या ब्रह्मवध्या स्त्रीवध्या चेव राघवम् ॥३९॥ प्रवेक्ष्यति न सन्देहः सभार्ये तु मृते मयि शुश्राव राघवः सर्व दु:खशोकसमन्वितम् ॥४०॥ निवार्य तं द्विजं रामो वसिष्ठं वाक्यमब्रवीत् । किं मयाद्य च कर्तव्यं कार्यमेवं विधे स्थिते ॥४९॥ हे वीर ! रावण का वध करके आपने सभी तपस्वियों के आँसू को पोंछ कर यह अभय प्रदान रूप पवित्र दक्षिणा उन्हें प्रदान किया है ॥२६॥ हे काकुत्स्थ ! इस विजय के द्वारा भाग्यवशात् आपकी समृद्धि हो रही है । आपका हमलोगों ने दर्शन कर लिया तथा आपसे सम्भाषण भी हमलोगों ने कर लिया । अब हमलोग अपने आश्रमो में जायेंगे।॥ २७॥ हे श्रीरामचन्द्र ! आप जब वन में आये थे उस समय में मैंने आपको इन्द्र का धनुष तथा दो अक्षय तुणीर तथा कवच प्रदान किया था ॥२८॥ हे.प्ररुंतप श्रीराम ! आप पुनः हमारे आश्रम में आइयेगा । इसतरह से कहकर वे सभी मुनिगण वहाँ से अन्तर्धान हो गये ॥२९॥ उन प्रधान मुनियों के चले जाने पर श्रीराम ने विचार किया कि किस काम के लिए मुनियों ने मुझे बुलाया है ?॥३०॥ महर्षियों ने कहा है कि आप हमारे आश्रम में पुन: । अवश्य आइयेगा, अतएव मुझे महर्षि अगस्त्य के आश्रम में अवश्य जाना चाहिए ।।३१।। और देवताओं का रहस्यमय जो कार्य हो उसे सुनना चाहिए । इसतरह से विचार करते हुए अमित तेजस्वी श्रीरामचन्द्र के राज्य करते हुए दश हजार वर्ष बीत गये । वे सोचते थे कि में निश्चित रूप से धर्म का अनुष्ठान करूँगा । धर्म ही परम प्राप्य है॥३२-३३॥ दान करते हुए, होम करते हुए तथा प्रजा का पालन करते हुए यह सारा समय श्रीरामचन्द्र के लिए एक वर्ष के समान शीघ्र ही बीत गया ॥३४। उसी समय एक बृद्ध ब्राह्मण जो राज्य का ही था अपने मरे हुए पुत्र को लेकर श्रीराम के द्वार पर आया ॥३५॥ वह स्नेहपूर्ण अनेक वाक्यों को कह रहा था । उसने कहा-- पुत्र ! ' पूर्वजन्म में मैंने कोई पाप अवश्य किया है जिसके कारण मैं तुम इकलोते पुत्र को मरा हुआ देख रहा हूँ । अभी तो तुम्हारी पाँच वर्ष की अवस्था थी तुम युवक भी नहीं हुए थे ॥३६-३७॥ हे पुत्र ! तुम बिना समय के ही, अपने पिता की और्ध्वदैहिक क्रिया किए बिना ही यमराज के घर चले गये ॥३८॥ इसमें कोई सन्देह नहीं है कि इसमें राम का ही कोई पाप है कि बाल वध्य (जिसका बालक मर गया हो) ब्रह्मवध्या (ब्राह्मण को मारने का पाप) तथा स्रीवध्या शि का वध करने का पाप) मेरे मर जाने पर श्रीराम के पास जायेंगे । श्रीराम ने दुख तथा शोक से युक्त इन सारी

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