Srishti Khanda Extracted Page 483
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-483
Sanskrit Original
देवकार्य कृतं तेन लंकायां रावणो हतः । पृथिवीराज्य संस्थस्य ऋषयोभ्यागता गृहे ॥१२॥ प्राप्तास्ते तु महात्मानो राघवस्य निवेशनम् । प्रतीहारस्ततो राममगस्त्यवचनाद् द्रुतम् ॥१३॥ आवेदयामास ऋषीन् प्रपतास्तांश्चत्वरान्वितः । दृष्ट्वा रामं द्वारपालः पूर्णचंद्रमिवोदितम्॥९४॥ कौसल्यासुतभद्रं ते सुप्रभाताद्य शर्वरी । द्रष्टुमभ्युदयं तेऽद्य सम्प्राप्तो रघुनंदन ॥१५॥ अगस्त्यो मुनिभिः सार्द्ध द्वारि तिष्ठति ते नृप। श्रुत्वा प्राप्तान् मुनीन् रामस्तान्भास्करसमद्युतीन् ॥१६॥ प्राह वाक्यं तदा द्वास्थं प्रवेशय त्वरान्वितः । किमर्थं तु त्वया द्वारि निरुद्धा मुनिसत्तमाः ॥१७॥ रामवाक्यान्मुनीस्तांस्तु प्रावेशयद्यथासुखम् । दृष्ट्वा तु तान् मुनीन् प्राप्तान् प्रत्युवाच कृतांजलिः॥१८॥ रामोभिवाद्य प्रणत आसनेषु न्यवेशयत् । ते तु कांचनचित्रेषु स्वास्तीर्णेषु सुखेषु च॥९९॥ कुशोत्तरेषु चासीनाः समन्तान्मुर्निपंगवाः । पाद्यमाचमनीयं च ददौ चार्घ्यं पुरोहितः ॥२०॥ रामेण कुशलं पृष्टा ऋषयः सर्व एव ते महर्षयो वेदविद इदं वचनमब्रुवन् ॥२१॥ कुशलं ते महाबाहो सर्वत्र रघुनंदन । त्वां तु दिष्ट्या कुशलिनं पश्यामो हतविद्विषम्॥२२॥ हृता सीतातिपापेन रावणेन दुरात्मना। पत्नी ते रघुशार्दूल तस्या एवौजसा हतः॥२३॥ असहायेन चैकेन त्वया राम रणे हतः । यादृशं ते कृतं कर्म तस्य कर्ता नविद्यते ॥२४॥ इह संभाषितुं प्राप्ता दृष्ट्वा पूताः स्म सांप्रतम् । दर्शनात्तव राजेद्र सर्वे जातास्तपस्विनः ॥२५॥ रावणस्यवधात्तेद्य कृतम्रुप्रमार्जनम् । दत्वा पुण्यामिमां वीर जगत्यभयदक्षिणम् ॥२६॥ में उत्पन्न हुए थे ॥१०॥ जिन श्रीराम को महर्षि अगस्त्य ने प्राचीन इतिहास को सुनाया । पुलस्त्य महर्षि ने कहा-- श्रीराम नामक महाबलवान् राजा रघुवंश में उत्पन्न हुए थे ॥११॥ श्रीराम ने देवताओं का कार्य लङ्का में जाकर रावण का वध करके किया । उसके वाद जब श्रीराम पृथिवी के राजा हुए उस समय ऋषिगण उनके यहाँ आये ॥१२॥ वे सभी महात्मा श्रीराम के घर पधारे । उसके बाद महर्षि अगस्त्य की आज्ञा से प्रतिहार (द्वारपाल) ने ही श्रीराम को॥१३॥। शीघ्रता से जाकर बतलाया कि ऋषिगण आये हुए हैं । उदित हुए पूर्णचन्द्र के समान श्रीराम को देखकर द्वारपाल ने कहा ॥१४॥ हे कौसल्या नन्दन ! आपका कल्याण हो, आज आपके लिए रात्रि का सुप्रभात हुआ है । हे रघुनन्दन ! आपके अभ्युदय को देखने के लिए ॥१५।। मुनियों के साथ महर्षि अगस्त्य आपके द्वार पर आये हुए हैं सूर्य के समान कान्ति वाले मुनियों के आगमन को सुनकर ॥१६॥ श्रीराम ने द्वारपाल से कहा कि शीघ्र मुनियों को लाओ । तुमने मुनियों को द्वार पर ही क्यों रोक दिया ?।१७॥ भगवान् श्रीराम के वाक्यों को सुनकर द्वारपाल उन ऋषयों को सुखपूर्वक प्रवेश कराया । आये हुए महर्षियों को देखकर श्रीराम ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया ॥१८॥ रामचन्द्रजी ने प्रणाम करके भक्ति पूर्वक उन ऋषियों को आसन पर बैठाया । सुवर्णनिर्मित सुन्दर सुखद तथा जिनके ऊपर कुश बिछाया गया था उन आसनों पर मुनिश्रेष्ठो के बैठ जाने पर पुरोहित ने उन महर्षियों को पाद्य, आचमन तथा अर्घ्य प्रदान किया ॥१९-२०॥ श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा कुशल पूछे जाने पर वेदज्ञ सभी ऋषियों ने कहा ॥२१॥ हे महाबाहो ! रघुनन्दन आपके राज्य में सर्वत्र कुशल है । हमलोग अपने सौभाग्यवशात् शत्रु का वध करके कुशली आपका दर्शन कर रहे हैं ॥२२॥ महापापी रावण ने आपकी पत्नी सीता का अपहरण किया और उसी पाप के कारण वह मारा गया ॥२३॥ हे श्रीराम ! आपने बिना किसी की सहायता के अकेले उस रावण को युद्ध में मारा, आपनेजैसा कर्म किया है वैसा कर्म कोई भी नहीं कर सकता है ॥२४॥ हमलोग यहाँ पर आपसे बातें करने के लिए आये है । आपको देखकर ही हमलोग पवित्र हो गये । हे राजेन्द्र ! आपके दर्शन से ही सभी तपस्वी पवित्र हो गये हैं॥२५॥
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