Srishti Khanda Extracted Page 482
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-482
Sanskrit Original
सृष्टिखण्ड * ४५७ पैतीसवाँ अध्याय भीष्म उवाच उक्तंभगवता सर्व॑पुराणाश्रय संयुतम्। तथाश्वेतेन ब्रह्मांडं गुरवे प्रतिपादितम् ॥१॥ श्रुत्वैतत् कौतुकं जातं यथा तेनास्थिलेहनम्। कृतं क्षुधापानोदार्थे अत्नदानाद्विना द्विज ॥२॥ तदहं श्रोतुमिच्छामि पृथिव्यां ये च पार्थिवाः । अन्नदानाद्दिवं प्राप्ताः क्रतवश्चान्नमूलकाः ॥३॥ कथं तस्य 'मतिर्नष्टा श्वेतस्य च महात्मनः । न दत्तं तेनान्नदानमृषिभिर्वा न दर्शितम् ॥४॥ अहोमाहात्म्यमन्रस्य इह दत्तस्य यत्फलम् । परत्र भुज्यते पुंभिः स्वर्गश्चाक्षयतां ब्रजेत् ॥५॥ अन्नदानं परं विप्राः कीर्तयंति सदोत्थिताः । अन्नदानात्सुरेद्रेण त्रैलोक्यमिह भुज्यते ॥६॥ ` शतक्रतुरिति प्रोक्तः सर्वैरेव द्विजोत्तमैः । तेनावस्थां तत्सदृशीं प््राप्तवांस्त्रिदशेश्वरः॥७॥ दानादेव गतः स्वर्ग त्वत्तः सर्व श्रुतं मया । अपरं च पुरावृत्तं निवृत्तं यदि कर्हिचित्॥८॥ भूयोपि श्रोतुमिच्छामि तन्मे वद महामते । पुलस्त्य उवाच एतदाख्यानकं पूर्वमगस्त्येन ` महात्मना ॥९॥ रामाय कथितं राजंस्तव वक्ष्यामिसांप्रतम् Il भीष्म उवाच कस्मिन्वंशे समुत्पन्नो रामोऽसौ नृपसत्तमः ॥१०॥ यस्यागस्त्येन कथितश्चेतिहासः पुरातनः ॥ पुलस्त्य उवाच रघुवंशे समुत्पन्नो रामो नम महाबलः | ॥११॥ अन्नदान का माहात्म्य, श्रीराम कथा, अगस्त्य आदि ऋषियों द्वारा रामराज्य की प्रशंसा तथा श्रीराम द्वारा शम्बूक नामक तपस्वी शूद्र का वध करके ब्राह्मण बालक को जीवित करना श्रीभीष्मजी ने कहा-- हे भगवन् ! आपने पुराणों की कथाओं को कहा तथा राजा श्वेत द्वारा आचार्य को ब्रह्माण्ड दान का वर्णन किया ॥१॥ इस वात को सुनकर मुझे अत्यन्त कौतुक है कि राजा ने हड्डियों को अन्न दान नहीं करने के कारण चाटा ॥२॥ अतएव मैं सुनना चाहता हूँ कि पृथिवी के सभी राजा अन्न मूलक क्रतुओं को करके स्वर्ग लोक गये ॥३॥ उस राजा की बुद्धि क्यों नष्ट हो गयी कि उसने अन्न दान नहीं किया । अथवा ऋषियों ने उसे अन्न दान करने का निर्देश ही नहीं दिया ॥४॥ अन्न का बहुत अधिक महत्त्व है, इस लोक में दिए गये अन्न का जो फल परलोक में भोगा जाता है उन जीवों के लिए स्वर्ग अक्षय बन जाता है ॥५॥ सदा सावधान ब्राह्मण बतलाते है कि अन्नदान श्रेष्ठ दान है । अन्नदान करने के ही कारण इन्द्र त्रैलोक्य के स्वामी हैं ॥६॥ इसीलिए सभी श्रेष्ठ ब्राह्मण इन्द्र को शतक्रतु कहते हैं । उसी के कारण उन्होंने इन्द्रत्व के समान अवस्था प्राप्त किया ॥७॥ आपसे ही मैंने सुना हैं कि दान करने के ही कारण इन्द्र स्वर्ग गये । यदि कोई दूसरा भी इतिहास इस विषयक वचा हो तो उसे में सुनना चाहता हूँ । हे महामते ! उसे आप मुझे सुनाइये । महर्षि पुलस्त्य ने कहा-- इस कथा को पहले अगस्त्य महर्षि ने॥८-९॥ श्रीरामचन्द्र जी को सुनाया था उसे में तुम्हें सुना रहा हूँ भीष्मजी ने कहा-- राजश्रेष्ठ श्रीराम किस वंश
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